गरीबों की सुनो, वो तुम्हारी सुनेगा

जब तक खुद गरीबों में अपनी परिस्थितियों को बदलने की इच्छा ना हो तब तक कोई कुछ नहीं कर सकता.

ऐसे समूहों का ध्येय वाक्य होता है हम गरीब हैं, हमारी कोई नहीं सुनता.

पर आप सुनो और कुछ करने को कहो तो कोई नहीं करेगा कुछ.

मेरी दुकान पर सारे दिन भिखारी आते हैं और शारीरिक रूप से असमर्थ और वृद्धों को मैं ख़ाली हाथ भेजता भी नहीं, पर हट्टे कट्टे सबसे कहता हूँ चाहे आदमी हो या औरत एक रुपया मांग रहे हो, दस दूंगा, पौंछा लगा दो दुकान का.

आज तक एक ने भी नहीं लगाया.

शायद भीख मांगना पौंछा लगाने से ज्यादा सम्मानजनक काम है.

यहाँ करना कोई खुद कुछ नहीं चाहता और बस रोना आता है.

भिक्षा वृति और बाल श्रम को अपराध की श्रेणी से निकाल देना चाहिए मेरी निगाह में.

किसी से कुछ मांगना, जिसको आप जानते ना हो, अपने आत्म सम्मान की हत्या के बाद ही संभव है.

एक बार सड़क पर लिफ्ट मांग के दिखाईये. हाँ एक बार शुरू कर देने के बाद फिर शर्म नहीं रहती.

और भिक्षा वृति सन्यास ले चुके लोगों के लिए जीने का माध्यम रही है सदियों से. बस अब नाकारा और काम चोर भी घुस गए हैं इस क्षेत्र में इसलिए लोगों का भरोसा खत्म हो गया है भिक्षुकों के प्रति.

और बाल श्रम… गलती शिक्षा हीनता की है और धार्मिक सोच की, जो ज्यादा बच्चे होने से रोकती नहीं. वो बच्चा क्या करे जो किसी के खेल खेल में दुनिया में आ गया और अब भूखा है?

दस साल का हुआ …. उस से छोटे 4 भाई बहन और हैं वो भी भूखे हैं. गरीबी ने वक़्त से पहले समझदार बना दिया है और पढ़ना शुरू हुआ ही नहीं

अब क्या करे वो.. काम….. 50 -60 rs रोज मिलते हैं चाय, पंचर, ढाबे पे काम करने वाले बच्चों को. कम से कम चोरी तो नहीं कर रहा. मेहनत से पेट पाल रहा अपना और अपने परिवार का. अब सरकार कहती है कोई बच्चा काम नहीं करेगा.

(सत्यार्थी जी नोबल ले आये इस बात का )

छुड़वा दी नौकरी

अब क्या होगा

खाना कहाँ से खायेगा

काम करने की मनाही है

पर चोरी और उठाईगिरी की नहीं

तो वो सही

अब बताइये क्या विचार है बाल श्रम के बारे में ?

(सत्यार्थी जी ने उन सब बच्चों के पुनर्वास की व्यवस्था करवाई थी जो उन्होंने छुड़वाए थे ऐसा मैंने सुना है, पर उस एक बच्चे की कमाई पर जो 2 और बच्चे निर्भर थे उनको रोटी किसने दी? )

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