ई है बम्बई नगरिया तू देख बबुआ

कुछ शहर अनाथ होते हैं, लेकिन अपने हौसलों और काबिलियत के बल पर वो सारे संघर्षों से जूझते हुए सफलता का वो मकाम हासिल कर लेते हैं कि उनकी तंग गलियों में हुए गुनाह भी भुला दिए जाते हैं.

यही गुनाह लाल बत्ती वाले एरिया में अपना अड्डा बना लेते हैं, तो जो समंदर किनारे का नमक नहीं खा सकते वो देह का नमक खाने वहां चले जाते हैं.

गरीबी रात में सड़क की बत्ती के नीचे स्वप्न शिशु को जन्म देती है और सुबह वही स्वप्न – शिशु अपनी पूरी जीजिविषा के साथ धारावी जैसी कॉलोनी के रूप में वयस्क हो साकार हो जाता है.

ये शहर जब बड़े हो जाते हैं तो उन अनाथ बच्चों को पालने लगते हैं जो सिनेमा के चमचमाते परदे का सपना लेकर आते हैं और जूते चमचमाने का बक्सा रखने जितनी हकीकत ही जुटा पाते हैं.

यहाँ का मध्यम वर्ग सुबह रेल की पटरियों के साथ दौड़ता है और शाम को मेट्रो बस की पिछली सीट पर हाथ में हाथ डाले दो दीवाने शहर में आबो दाना ढूँढते हैं…

यहाँ कोई अमीर नहीं है, पैसों और प्रसिद्धि की चाह में लपलपाती जीभें हैं, जिन पर न जाने कितने ही अनुभवों के छाले उग आये हैं कि वो जब बोलते हैं तो उनके मुंह से सिर्फ दर्द ही रिसता है…

यहाँ ज़िंदगी की खुली पीठ की इबारतें पेज थ्री पर काले धुंए की कलम बनाकर कत्थई स्याही में डूबोकर लिखी जाती है… और जिस्म के उभारों से नियत ऐसे फिसलती हैं कि फिर उस पर सम्मान का मुलम्मा नहीं चढ़ पाता तो मेकअप की परतें चढ़ जाती हैं…

लेकिन ये शहर किसी को भूखा नहीं मरने देता… इसलिए वड़ा पाव के साथ छोले टिक्की बहुत कम दामों पर मिल जाते हैं, जिसे मेक डॉनल्ड के बंद शटर के ओटले पर बैठकर खाते हुए कई लोग आज भी गाते नज़र आते हैं… ई है बम्बई नगरिया तू देख बबुआ…

और यही बम्बई है जहां का बादशाह लालबाग में विराजित होता है ये सन्देश देते हुए कि कुछ शहर भी बादशाह की तरह होते हैं जहाँ से हर शुभ काम की शुरुआत होती है…

– माँ जीवन शैफाली

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