कम से कम मैं तो नहीं फैलाने दूँगा आपको वैचारिक गंदगी

एक महाशय फिलहाल दो बातों की लेकर बड़े चिंतित हैं. उनकी एक चिंता तो ये है कि हमारे प्रधानमंत्री अनपढ़ों जैसी बातें क्यों करतें हैं और दूसरी चिंता है कि विष्णु का पाँव दबाती लक्ष्मी की तस्वीर नारी सम्मान और लैंगिक समानता पर बड़ा आघात है.

मेरे एक मित्र हैं. कुछ महीने पहले उनकी छोटी सी बच्ची ने उनसे पूछा कि पापा! ये आत्मा क्या होती है?

पहले तो इनको समझ में ही नहीं आया कि अपनी छोटी बच्ची को ये बात सहज भाषा में कैसे समझाई जाये पर जल्दी ही उनको अपनी बिटिया को समझाने लायक उदाहरण मिल गया.

उन्होंने सामने छत पे लगे पंखे की ओर संकेत करते हुये बेटी से कहा, देखो अभी ये स्विच बंद है तो पंखे में कोई हरकत नहीं हो रही है पर जैसे ही मैं स्विच ऑन करता हूँ ये पंखा चलने लगता है तो इस पंखे के लिये जो करंट है वो इसकी आत्मा है. इसी तरह हमारे शरीर के साथ भी है. करंट की तरह आत्मा जब हमारे में होती है तो हम खाते हैं, चलते हैं, फिल्म देखते हैं, बोलते हैं, सुनते हैं, सब कुछ करते हैं पर जैसे ही ये करंट निकल जाती है तो हमें मरा हुआ मान लिया जाता है, हममें हरकत तक होनी बंद हो जाती है.

इतनी सहजता से समझाई गई बात उस छोटी बच्ची की समझ में आ गई.

अपना भारतवर्ष भी ऐसा ही रहा है. आदि काल में वेद आये और फिर कालान्तर में वेद-ज्ञान को लगातार सहज किया जाने लगा यहाँ तक कि उपनिषदों और पुराणों तक आते-आते हमने ज्ञान को कहानियों और रूपकों के माध्यम से समझाने लायक पात्रता विकसित कर ली और पूरा भारत एक समान ज्ञान के प्रवाह से चलने लगा.

हमने ज्ञान को इतना सहज कर दिया कि गाँव-देहात में रहने वाली और कभी स्कूल का मुंह तक न देख पाने वाली हमारी दादी-नानी भी उस ज्ञान को जीती हैं.

विवेकानंद शिकागो धर्मसभा में वही बातें बोल रहे थे जिसे हम सबको हमारी दादी-नानी ने बचपन से सिखाया है. प्रकृति भोग्या नहीं है, हरेक प्राणी में ईश्वर निवास करता है, जल-वायु-अग्नि, नदी-पहाड़, वन सबके सब देवत्व को धारण करते हैं.

ये हमारी मूल चिंतना थी जिसे ऋषियों ने वेद में गाया है, पर ये बात सहजता से लोगों में कैसे पहुंचे?

तो किसी ने कह दिया कि तैतीस करोड़ देवी-देवता हमारे यहाँ हैं इसलिये तुम हर चीज़ में ईश्वर को देखो.

ये प्रतीकात्मक था और सबने यही माना.

जनसामान्य को बात समझ में आ गई. इसलिये हमारे प्रधानमंत्री जब बच्चों से मुख़ातिब थे तो उन्होंने तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं के होने की बात इसी कारण कही होगी जिससे इन महाशय को तकलीफ है.

उस ईश्वर को एक मानो, तीन मानो, तैंतीस मानो या फिर तैंतीस करोड़ मानो, कोई फर्क नहीं पड़ता.

हिंदुत्व की सुंदरता इसी में है कि हम कभी जड़ अकीदों में नहीं उलझते. हमने एक ईश्वर को माना तो भी किसी के गले काटने नहीं गये, हमने तीन ईश्वर को माना तो भी किसी से इस बात के लिये झगड़ा नहीं किया कि तू एक को ही क्यों मानता है.

और अगर हमने तैंतीस करोड़ भी मान लिया तो भी इस आधार पर किसी को जहन्नमी घोषित नहीं किया बल्कि अपने सोच को विस्तार देकर और अपने आराध्यों की संख्या बढ़ा कर हमने ईश्वर की हरेक कृति का सम्मान ही किया.

यहाँ तक कि हम गाय, बंदर, भालू और सांप तक में परमात्मा का अंश देखने लगे. मोदी जी तैंतीस करोड़ देवी-देवता कहकर इसी संस्कार से देश के नौनिकालों को संस्कारित कर रहे थे, न कि किसी अज्ञानता का प्रसार कर रहे थे.

जहाँ तक लक्ष्मी के द्वारा शेषशायी विष्णु के चरण दबाने की बात है तो उसी विष्णु के अवतार भगवान राम के द्वारा शक्ति की आराधना करने के वर्णनों से हमारे शास्त्र भरे हुये हैं और ये कथा भारत के गाँव-गाँव में प्रचलित है.

मधु और कैटभ के साथ युद्ध के अवसर पर विष्णु के द्वारा आदिशक्ति से आशीर्वाद मांगने की बात शास्त्रों में आई है, कई जगह ब्रह्मा, शिव और इंद्र को जगत्जननी की उपासना करते दिखाया गया है.

शास्त्रों में ‘सुलभा’ नाम की तेजस्विनी नारी का वर्णन है जिसके बारे में कजहा जाता है कि कोई भी पुरुष उसे शास्त्रार्थ में परास्त नहीं कर सकता था.

राजा जनक के दरबार में गार्गी और ऋषि याज्ञवल्क्य ने आपस में शास्त्रार्थ किया था यानि दोनों की विद्वता समान स्तर की थी. मंडन मिश्र की पत्नी से शास्त्रार्थ में शंकराचार्य की पराजय की बात भी हमारे ग्रंथों में छिपाई नहीं गई है.

लोपामुद्रा, श्रद्धा, सरसा, अपाला, यमी और घोषा जैसी नारियों को वेद-मन्त्रों की द्रष्टा माना गया है और नारियों को मिले स्वयंवर के अधिकार वाले आख्यानों से तो हमारे ग्रन्थ भरे हुये हैं.

मगर इन महाशय को इन सबसे कोई मतलब नहीं है, उनको केवल वही देखना है जिसे देखने के लिये उनको उपकृत किया गया है. परिवार में सामंजस्य रहे, प्रेम रहे, एक-दूसरे के लिये आदर भाव रहे ऐसी बातें इन महाशय को तकलीफ देती हैं.

भगवान न करे इन महाशय को अगर कोई बीमारी हो जाये या कार्यक्षेत्र से थके-हारे लौटे तो इनकी पत्नी को इनकी सेवा-सुश्रुषा नहीं करनी चाहिये, इनके सर या पैर नहीं दाबने चाहिये क्योंकि ऐसा करके वो तो दासी का काम करेंगी.

स्पष्ट है कि सोच में आई ऐसी विकृति सनातन की देन नहीं हो सकती. ये महाशय जिनसे उपकृत होकर ये सब अनर्गल लिखते हैं उनके यहाँ स्त्रियों की स्थिति क्या है, ये कभी लिखूंगा तो पसीने छूटने लगेंगे.

आपके संस्कार विकृत हैं, आपको सेमेटिक वाले उपकृत कर रहे हैं और उसके दम पर आप शायद दो-चार अच्छे काम कर रहे हैं (शायद) तो इसका मतलब ये थोड़े है कि आपको जहालत और विद्वेष प्रचार का हक़ मिल गया है. कम से कम मैं तो आपको वैचारिक गंदगी फैलाने नहीं दूंगा.

इन साहब को बौद्धों से बड़ा प्रेम है, बुद्ध से भी है. बुद्ध से तो खैर मुझे भी प्रेम है पर इनकी तरह अनपढ़ या किसी से उपकृत नहीं हूँ और न ही इतना गया-गुज़रा हूँ कि महिला अधिकार पर चिंतित हो रहे महाशय को थोड़ा ज्ञान भी न दे सकूं.

महाशय, बौद्ध-पुस्तक ‘चूल-वग्ग’ में एक आख्यान मिलता है. उसमें कहा गया है कि बुद्ध की माता जी ने तीन बार बौद्ध संघ में प्रविष्ट होने की आज्ञा माँगी थी और तीनों ही बार उनकी प्रार्थना अस्वीकृत कर दी गई.

जानते हैं क्यों? क्योंकि स्त्री के होते उन भिक्षुओं की साधना नहीं हो सकती थी, क्योंकि उनको लगता था कि स्त्री की उपस्थिति ही कामवेग का प्रवाह तेज कर देती है और साधना करनी असंभव हो जाती है.

बाद में संघ में स्त्रियों को प्रवेश के अधिकार मिले पर आठ कड़े नियम का पालन करने की प्रतिज्ञा करने के बाद, कभी पढ़िये उन आठ-नियमों के बारे में, आपकी गलतफहमियां दूर हो जायेगी.

और हाँ, लक्ष्मी के द्वारा विष्णु के चरण दबाने से तकलीफ़ ज्यादा न हो रही तो ये भी जान लीजिये कि उन बौद्ध-संघों का नियम था कि भिक्षुणी सौ साल की हो तो भी उसे नव-मूंछ-मुंडे चौदह साल के भिक्षु का चरण स्पर्श करना पड़ेगा.

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