यह भूत भगाओ, मिल जाएगा पुराना मोदी

मोदीजी ने फिर अजमेर की उर्स में चादर भिजवाया… मोदीजी ने नहीं भिजवाया, प्रधानमंत्री कार्यालय ने भिजवाया…

हमेशा भिजवाते थे, इस साल भी भिजवाया. यह मोदीजी की व्यक्तिगत आस्था को प्रदर्शित नहीं करता… कल यदि कोई दूसरा आएगा तो वह भी भिजवाएगा…

फिर इसपर यह प्रतिक्रियाएं क्यों?

मोदीजी जब काशी विश्वनाथ के मंदिर में जाते हैं, पशुपतिनाथ के मंदिर में जाते हैं तो वे अपनी व्यक्तिगत आस्था से जाते हैं.

कल कोई यदि कोई दूसरा प्रधानमंत्री आ जाये और उसकी व्यक्तिगत आस्था ना हो तब वह काशी विश्वनाथ मंदिर नहीं जाएगा. पर वह अजमेर के उर्स पर चादर भिजवाता रहेगा.

क्योंकि यह जेस्चर एक स्थापित प्रोटोकॉल बन गया है. और मोदीजी को इसे तोड़ने की हिम्मत नहीं है. या इसके सांकेतिक अर्थों का सजग बोध नहीं है जो उन्हें इसका महत्व समझाए और इसे तोड़ने को प्रेरित करे.

दूसरी ओर, मोदीजी पूरी दुनिया घूम घूम कर मंदिरों में मत्था टेकते रहे, यूएई तक में मंदिर बनवा लिया… पर अयोध्या न जा सके. ऐसा नहीं है कि आस्था नहीं है… पर जा न सके. उन्होंने यही आंकलन किया कि इससे कोई मर्यादा भंग होती है.

अब उस प्रक्रिया को समझें जिससे ये मर्यादाएँ स्थापित होती हैं. क्यों बिना व्यक्तिगत आस्था के भी हमारा प्रधानमंत्री अजमेर के उर्स पर चादर भेजता है, दूसरी ओर अयोध्या जाकर अपनी आस्था प्रदर्शित करने की स्वतंत्रता वह नहीं पाता?

क्योंकि मोदीजी की अपनी आस्था जो भी हो, प्रधानमंत्री पद और कार्यालय की अपनी कुछ स्थापित आस्थाएं हैं.

मोदी एक व्यक्ति के रूप में उन्हें ना भी सब्सक्राइब करें, एक प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें तोड़ने और चुनौती देने का व्यक्तिगत साहस और संकल्प नहीं जुटा सके… जुटा सकते थे, नहीं जुटाया.

क्योंकि भीतर कहीं गहरे वे भी इसे स्वीकृति देते हैं. वे अजमेर के उर्स को बिना किसी आस्था के भी एक स्वीकृति देते हैं, अयोध्या में बाबरी ढाँचा तोड़े जाने के आरोपित सामूहिक अपराध बोध को भी झटक नहीं पाए हैं.

वह प्रक्रिया क्या है जो हमें अपनी आस्था के विपरीत या विरुद्ध स्थापित व्यवस्थाओं को स्वीकृति देने को बाध्य करती है?

1920s में एक इतालियन वामपंथी विचारक, पत्रकार, राजनीतिज्ञ हुआ अंतोनियो ग्राम्स्की. उसने एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया जो इस प्रक्रिया का सबसे सही विश्लेषण करता है.

वह सिद्धांत कहलाता है हेजेमनी (Hegemony). यह हमेशा से था, ग्राम्स्की ने सिर्फ इसे पहचाना और इसका उपयोग चिन्हित किया. उसने पहचाना कि लोगों की व्यक्तिगत निष्ठाएँ स्थापित सामाजिक निष्ठाओं के दायरे से बाहर नहीं जातीं.

उन स्थापित सामाजिक निष्ठाओं और सिद्धांतों को स्थापित करने की शक्ति को हेजेमनी कहते हैं. और यही शक्ति राजनीतिक सत्ता और सम्पूर्ण समाज को संचालित करने की शक्ति है… यही असली पावर है.

ग्राम्स्की को मुसोलिनी ने वर्षों जेल में डाले रखा… वहाँ उसने अपनी प्रिज़न नोटबुक लिखी… जो बाद में स्मगल करके जेल से बाहर लाई गई.

ग्राम्स्की को जेल में ही टीबी हो गया और जेल से बाहर निकलने के कुछ दिनों बाद वह मर गया. पर वामपंथियों ने ग्राम्स्की को समझा और अपनी पूरी ताकत समाज की स्थापित निष्ठा को बदलने में लगा दी.

उन्होंने समझा कि यही असली शक्ति है जिससे राजसत्ताएँ संचालित होती हैं. उन्होंने अपनी हेजेमनी स्थापित की.

तो समझें… अजमेर को चादर मोदी ने नहीं भेजी… उसी अंतोनियो ग्राम्स्की के भूत ने भेजी है… और वही भूत है जो उन्हें सपने में आता है और उन्हें अयोध्या जाने से रोकता है.

वही भूत है जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट का आशीर्वाद लेकर रोहिंग्या देश भर रहे हैं और 56 इंची गुब्बारे में छेद कर रहे हैं.

यह भूत भगाओ…पुराना मोदी मिल जाएगा जिसे आपने चुना था…

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY