सुख और दुःख : एक ही सिक्के के दो पहलू, यदि उसे खड़ा रखने का हौसला और कूवत हो

जब तक जीवन शोक, मोह, भय से मुक्त न हो तब तक आप सुखी नहीं हो सकते, जो खुद सुखी नहीं, वह दूसरो को सुखी कैसे रख सकता है.

दरअसल वो सुख को नीचे दबाये रखता है, ऊपर ऊपर दुख, नीचे सुख. सिक्के के दो पहलू में से दुख ऊपर, सुख नीचे.

दबा हुआ सुख, छिपा हुआ सुख आदमी नहीं दिखाता, दुख दुख दिखाता है और सामने वाले से सुख दिखाने की अपेक्षा रखता है किंतु हम सब सुख को दबाकर रखे हैं. इतना कि भूलने लगे हैं कि सुख भी कोई चीज है या नहीं.

दुख की प्रतियोगिता करते हैं हम, काम्पीटिशन करते हैं. किसीने कहा नहीं कि मेरे सिर में दर्द है तो आप झट से अपने सिर में उठे कभी दर्द को उससे बढ़कर बता देंगे और उसका दर्द नजरंदाज ही कर देंगे.

काम्पीटिशन है .. तेरे दुख से मेरा दुख कितना बड़ा.. सुख का काम्पीटिशन नहीं है … जो है वह है ईर्ष्या का काम्पीटिशन…. ईर्ष्या के चेहरे पर सुख की पॉलिश का प्रदर्शन.

पड़ोसी नया टीवी लाया, तो मैं उससे बड़ा टीवी लेकर आ गया, भले क़र्ज़ से उठाया हो. किंतु दिखावे के इस युग में यह आवश्यक हो जाता है, आखिर प्रतिष्ठा कैसे कायम रह सकेगी?

यकीनन फिर दुख निश्चित है. दुख चूंकि ऊपर है इसलिये उसका विस्तार है. जो चीज ऊपर होती है उसका आवरण होता है. धरती का आवरण आसमान. आसमान पर उठाकर रखा है हमने अपना दुख, जबकि यह निर्विवाद सत्य है कि सुख भी है, उतना ही जितना दुख, उसका ठीक उतना ही पैमाना है, उसका आयतन ठीक उतना ही है जितना दुख का. किंतु दबाकर रखा है. छुपा कर रखा है मानो किसी ने देख लिया तो कम हो जायेगा.

सिक्के के इस पहलू को हमने उल्टा कर रखा है. अंधेरे में रखा है. और इतनी भी हिम्मत नहीं कि दुख को नीचे कर सुख को ऊपर कर दे. हालांकि दबा हुआ दुख अधिक खतरनाक माना जा सकता है.

दबा हुआ दुख, छिपा हुआ दुख ज्वालामुखी की तरह प्रेशर बनाता है और फूट पड़ता है. नतीजतन फिर से दुख ही दुख. सिक्के के दोनों पहलू दुख. एक सुख के रुप में, दूसरा दुख का रूप है ही.

कितनी बड़ी विडम्बना है यह, मानवीय विकार कि हमने दुख का संसार निर्मित कर रखा है. चुन चुन कर-बिन बिन कर सुख की खुद ही हत्या की जा रही है. सुख दिखा नहीं कि उसे हड़पा और हजम कर लिया, ऐसे निगला कि पेट में अपच हो गया. अपच दुख की गैस बनाकर बेचैन रखता है. पूरा का पूरा हाजमा बिगड़ जाता है. शरीर ढीला और कमजोर हो जाता है. फिर प्रदर्शन कि हाय कितना दुख है.

है हिम्मत किसी में, कूवत है कि सिक्के को खड़ा रख सके ताकि उसके दोनो पहलू दिखे. एक ओर दुख, दूसरी तरफ सुख. ऐसा कौन कर सकता है? जो तटस्थ हो, निर्विकार हो. जिसे न दुख से मतलब, न सुख से. उसे दुनिया को दिखाने से मतलब कि ये रहा सिक्का और ये रहा उसके एक पहलू में सुख और दूसरे में दुख.

देखो… ये खड़ा है, पड़ा नहीं है, औंधा नहीं है कि ऊपर कोई एक ही पहलू दिखाई दे. यह खड़ा है ताकि दिखे. पूरा का पूरा दिखे सुख-दुख. इसके लिये कूवत की आवश्यकता है. हौसला चाहिये. निश्चित ही. क्योंकि जो तटस्थ नहीं, जो दूर खड़ा नहीं, जो इन सब से विरक्त नहीं वह सिक्के को खड़ा रख सकने में भी समर्थ नहीं.

जान लीजिये यह मनुष्य दुखी कब है? जब ईश्वर से मन नहीं मिला. नास्तिक ईश्वर को नहीं मानते. किंतु आस्तिक उसे जानते हैं. अफसोस यह है कि इन दोनों को परिभाषित करने वाला स्वयं पूरा का पूरा न आस्तिक होता है न नास्तिक. इसलिये दुविधाएं छोड़ देता है.

भ्रम फैला देता है, अज्ञान में डाल देता है और सामान्य मनुष्य अपने बौद्धिक स्तर से उसे ग्रहण करता है और दुखी ही रहता है क्योंकि वह पूरा है ही नहीं, अधूरा है ..अधूरा आस्तिक, अधूरा नास्तिक.. यह जो भी कुछ अधूरा होता है वही दुख है. यह जान लेना अवश्यम्भावी है कि ईश्वर में मृत्यु नहीं.. दुख नहीं, अज्ञान नहीं. इससे विमुख होना ही हमे अज्ञानी हो जाना है.

विमुख होना ही सिक्के का वह दूसरा पहलू है जहाँ दुख है. हम किससे चिपके बैठे हैं? यह जानना आवश्यक है. चिपकना ही दुख का जन्मदाता है .. दूर रहो .. सिक्के को खड़ा रखो… सुख भी दिखे और दुख भी दिखे ताकि आप अपना मार्ग साधे रह सके.. जान लेना ज़रुरी है..

मैं और मेरा क्या है? यही दुख की उत्पत्ति है. सिक्के को अपने अपना माना तो सुख-दुख दोनों को आपने समान रूप से अपने पास रखा. इसके समान लक्षण तथा विकार के भागी भी आप ही हैं. जबकि सिक्का न तो दुख देता है, न सुख…

मिट्टी किसी को दुःख नहीं देती, ये खेत मेरा है और यह तुम्हारा है… यही मेरा-तेरा दुख है. वैसे तो मृत्यु से भी दुख उत्पन्न नहीं होता, मुर्दा दुख नहीं देता, उसके साथ मेरापन जुड़ा होना दुख देता है.

सिक्के को भी रखो मत, उसे छोड़ो और छोड़ना ही हिम्मत, कूवत का कार्य है. छोड़ा तो वह खड़ा हुआ दिख सकेगा. साफ साफ तभी दिख सकेगा ये दुख है और यह सुख है. तभी हम दिशा पायेंगे सुख की या दुख की. छोडना ही सुख है. किंतु उसे दबा रखा है अपने नीचे, छुपाकर रखा है. उसे भोग बनाकर रखा है. भोग खत्म होता है.

खत्म होना ही दुख को पैदा करना है. हम दुख का भोग नहीं करते., उससे पिंड छुडाना चाहते हैं… थोपने लगते हैं एक दूसरे पर चूंकि हम सब यही किये जा रहे हैं तो निश्चित रूप से सुख का अनुभव नहीं है, है तो वह भी क्षणिक. आनंद तो सिक्के को खड़ा रखने में है ..उसे भोगने में नहीं, न सुख, न दुख …. एकदम तटस्थ और मुश्किल यह कि तटस्थ है कौन?

शायद तभी शैफाली जी का यह कथन मुझे निर्विवाद रूप से तार्किक लगता है कि सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं… लेकिन सिर्फ तब तक जब तक उस सिक्के को खड़ा रखने का हौसला और कूवत हो. आप अगर खड़ा रख सकते हैं यानी आप यह जान सकते हैं कि सुख और दुख आखिर है क्या और खड़ा भी कब तक? जब तक रख सके, ताउम्र भी ताकि जीवन के असल सत्य से परिचय हो सके और हो सके ईश्वर संग मिलाप. क्योकि इसी सिक्के से निकलता है रास्ता ..उसके दर का -अपनी मंजिल का …

– अमिताभ श्रीवास्तव (खबरगली के सम्पादक)

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