ध्यान ही जीवन : सामान जितना कम होगा, यात्रा उतनी सहज होगी

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हम जब भी कुछ लिखते हैं, वो हमारे द्वारा पढ़ी और जानी गयी जानकारी के परिपेक्ष्य में हमारा विचार और अनुभव होता है, जो कई बार स्थापित धारणा और ज्ञात सत्य से सर्वथा भिन्न भी हो सकता है.

ऐसे में आप कहीं भी ये दावा करने का हक़ नहीं रखते कि आपने जो कुछ भी लिखा है वही सत्य है. सत्य बहुआयामी है उसको सिर्फ आपने अपनी नज़र से देखा और समझा है. जो गलत नहीं भी है तो पूर्ण तो हो ही नहीं सकता.

जो आपने अनुभव किया वो आपकी कल्पना, संस्कार और अध्ययन के परिणाम स्वरूप होता है. आपने भी उसे कहीं पढ़ा है, आप सीख कर पैदा नहीं हुए हैं… और इस ज्ञान पर जब अहंकार हावी हो जाता है तो प्राप्त ज्ञान के साथ मिला सम्मान भी साथ छोड़ देता है.

मुझसे ध्यान के बारे में जानकारी मांगने वालों से मैं यही कहूंगी जो कुछ भी मैंने “जाना” है वो मेरे देखने का नज़रिया है. उसके सार्वभौमिक सत्य होने का दावा मैं कर ही नहीं सकती. सत्य इतना छोटा नहीं होता कि किसी एक व्यक्ति के अनुभव को ही धारण कर ले.

इसलिए जिसे मैं जादू कहती हूँ उसे कोई शक्ति कणों की लीला कहेगा, तो कोई अन्य उसे विज्ञान के आधार पर Theory of relativity या Quantum Physics का कोई सूत्र कहकर मेरे कहे या लिखे को hocus pocus कहकर हंस भी सकता है.

मैंने तो वेद उपनिषद को कभी पढ़ा तक नहीं है… मैं क्या जानूं ज्ञान क्या होता है या ध्यान क्या होता होता है. जो कुछ कह सकती हूँ वो सिर्फ और सिर्फ मेरा अनुभव है जो आपको मेरे लिखने के तरीके से आकर्षित कर सकता है, लेकिन आवश्यक नहीं कि वैसा ही अनुभव आपको भी हो.

यह एक तरीका है अपने अनुभव बांटने का कि देखिये… ऐसा भी अनुभव होता है… या.. ऐसा भी… ऐसा भी और ऐसा भी… आपका अनुभव मिलता जुलता हो सकता है बिलकुल समान तो असंभव ही है… मेरी यात्रा मेरी अपनी है जो मेरे पिछले जन्मों के कर्मों और इस जन्मों से मिली परिस्थिति और ज्ञान का मिला जुला रूप है… वैसे ही आपकी अपनी यात्रा है…

इसलिए अपने ज्ञान का बोझा मैं अपने सर पर लादती ही नहीं… उसे लिखकर भारमुक्त हो जाती हूँ… कोई हज़ारों में से एक होता है जिसके तार मेरे लिखे से नहीं लेकिन जिस भावना से मैंने लिखा है उससे जुड़ जाते हैं और तब उन दोनों के बीच घटित होता हो “जादू”.

कई लोग इसे माया कहकर खारिज भी कर देते हैं तो कई इस माया का आनंद लेते हैं… जब आप इस माया का आनंद लेने लगते हैं तो माया अपने और वृहद रूप में आपके सामने प्रकट होती है. आप जितने आनंदित होंगे जितनी अधिक कृतज्ञता से उसे अनुभव करेंगे… वो आपको अपने नए नए स्वरूप के दर्शन कराएगी.

ये जादू आपके अकेले का भी हो सकता है, मेरे साथ मेरी ऊर्जा पर सवार किसी व्यक्ति के साथ साझा भी हो सकता है, या बहुत सारे ऐसे लोग जो उस ऊर्जा क्षेत्र के आसपास जिज्ञासु बनकर घूम रहे होंगे उन्हें वो अपनी ओर आकर्षित भी कर सकता है. जिसे हम आकर्षण का नियम कहते हैं…

तो जब भी ऐसा जादू अनुभव हो तो उसकी ऊर्जा को ऊपर उठाने का प्रयास कीजिये. ये प्रयास व्यक्तिगत साधना के लिए भी हो मात्र तो भी कोई हर्ज़ नहीं. जब आप इस स्तर पर पहुँच जाते हैं तो आपको स्वयं ही ज्ञात हो जाता है कि आपको ब्रह्माण्ड ने किस कार्य के लिए चुना है. सिर्फ अपनी आध्यात्मिक यात्रा को उच्च स्तर पर ले जाने के लिए, उसे करीबी लोगों में बांटने के लिए या सामूहिक स्तर पर उसका लाभ इस यात्रा के राहगीरों को देने के लिए.

मुझे अक्सर ऐसा लगता है मुझे ज्ञात अनुभवों को लोगों को बांटने के लिए चुना गया है… चाहे लिखकर, बोलकर या ध्यान विधि से… जैसे भी सामने वाले की पात्रता हो. एक बार फिर वही बात दोहराऊंगी ये मेरा अहंकार नहीं ऐसा मुझे लगता है… मेरा लगना आपके लगने से भिन्न हो सकता है… लेकिन ऐसे मैं आप मुझे गलत और खुद को सही कहेंगे तब भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन आपकी यात्रा धीमी हो जाएगी…

इसलिए अपने सर पर कभी भी ज्ञान के अहंकार का बोझा लादकर मत घूमिये… सामान जितना कम होगा… यात्रा उतनी सहज होगी.

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