देवासुर संग्राम : वर्तमान संदर्भ में

पुराणों मेँ देवासुर संग्राम की कथा है. यह संग्राम सनातन है सदा चलता रहता है. यह शुभ अशुभ का द्वंद है. अंधेरे उजाले की लड़ाई है. विशेष कारणों से दोनों ही पक्ष मनुष्य पर निर्भर हैं.

अतः मनुष्यों को अधिक से अधिक अपने पाले में करने की कोशिश दोनों तरफ से चलती रहती है. दोनों एक दूसरे के पक्ष के लोगों को मारने मिटाने में लगे रहते हैं.

दैवीय और आसुरी संपदा का गीता में भी वर्णन है. दैवीय संपदा वाले निरपेक्ष लोगों को भी पसंद करते हैं. तथा उनसे सहयोग पाने में सफल हो जाते हैं . वहीं असुरी संपदा वाले दूसरों से सहज सहयोग नहीं ले पाते अतः वे निरपेक्ष लोगों को भी मार देते हैं.

दैवीय और आसुरी संपदा वालों को उनके आचरण संस्कारों की भिन्नता से सहज पहचाना जा सकता हैँ. दोनों की रुचियां भिन्न, यहाँ तक कि दोनों को ध्वनियाँ भी भिन्न पसंद हैं.

दैवीय संपदा वाले प्रकाश पूजक, प्रकाश से संबंधित राग और ध्वनियों का प्रयोग करते हैं . वहीं आसुरी संपदा वाले अँधेरे के उपासक अँधेरे से संबंधित राग और ध्वनियों का उपयोग करते हैं.

आसुरी संपदा वालों को ही निशाचर भी कहा गया. तमराज शैतान के उपासक होते हैं, आसुरी संपदा वाले. दैवीय संपदा वाले प्रकाश के उपासक दिनचर दिव्य स्वभाव के होते हैं .

महाभारत में दोनों पक्षों के महारथियों के झंडों का वर्णन है. पांडव पक्ष के अधिकतर महारथियों के ध्वज का रंग सतोगुणी था. जैसे पीला, लाल, भगवा आदि.

कुछ महारथियों के तामसी रंग काले, नीले, बैंगनी रंग के भी ध्वज थे. जैसे बर्बरीक, घटोत्कच आदि. पर ये पांडव पक्ष में बहुत कम थे.

हालाँकि युद्ध में वे सभी मारे गये थे. कौरव पक्ष में अधिकतर महारथियों के ध्वज तामसी रंग के थे. कुछ थोड़े से सतोगुणी रंग वाले भी थे. पर वे आसुरी संपदा वालों के पक्ष में लड़ रहे थे. अतः उनका नाश भी निश्चित था. जो प्रतीकों की भाषा समझ पायें समझ लें.

– शत्रुघ्न सिंह

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