डिजिटल कठपुतलियां : दिस इज़ योर डिजिटल लाइफ

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हम सभी ने इस तरह के क्विज़ देखें हैं. इसमें आपके आईक्यू को टेस्ट करने की बात कही जाती है, आपके अंदरूनी व्यक्तित्व को बताने की बात कही जाती है या आपको ये दिखाने की बात कही जाती है कि आप एक एक्टर के तौर पर कैसे नज़र आएंगे?

कहने को ये एक फ़ेसबुक क्विज़ है पर असल मायनों में ये आपकी डिज़िटल ज़िंदगी है. इसी तरह के फेसबुक क्विज़ों से कैम्ब्रिज एनालिटिका ने करोड़ों लोगों के डेटा हासिल कर लिए.

ऐसे कई क्विज़ में आपको ये भरोसा दिलाया जाता है कि आपका डेटा सुरक्षित है. ऐसे गेम और क्विज़, फेसबुक यूज़र्स को लुभाने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं, लेकिन इसका असल मक़सद डेटा इकठ्ठा करना होता है.

डेटा चोरी कैसे हुए

आपको कौन मारना चाहता है, आपका सबसे अच्छा मित्र कौन है, आपके सबसे अच्छे 10 मित्र कौन है, पिछले जन्म में आप कौन थे, आपके ऊपर कौन सा डायलॉग अच्छा लगेगा… आपके पास भी फेसबुक के माध्यम से ऐसे तमाम दिलचस्प ऐप के रिक्वेस्ट आते होंगे.

इनको डाउनलोड करने या इनमें आगे बढ़ने के लिए आपके पर्सनल डेटा एक्सेस की इजाज़त मांगी जाती है. ऐसे में आपको अपने डेटा एक्सेस देने में सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि डेटा चुराने का पूरा खेल यहीं से चल रहा है.

कैम्ब्रि‍ज एनालिटिका (सीए) ने एक दूसरी कंपनी ग्लोबल साइंस रिसर्च (GSR) द्वारा विकसित एक एप्लीकेशन का इस्तेमाल करते हुए आसानी से ये डेटा हासिल किए थे.

साल 2014 में जीएसआर ने एक पर्सनॉलिटी क्विज ऐप ‘दिस इज़ योर डिजिटल लाइफ’ शुरू किया, इसे कुछ ‘मनोवैज्ञानिकों’ द्वारा किए जाने वाला प्रयोग बताया गया.

फेसबुक के माध्यम से सामने आने वाले इस एप्लीकेशन को 2 लाख 70 हज़ार लोगों ने डाउनलोड किया. डाउनलोड करने वाले ग्राहकों का फेसबुक डेटा सीए के पास पहुंच गया.

यह एप्लीकेशन वास्तव में फेसबुक की डेवलपर नीति के पूरी तरह से खिलाफ था. लेकिन फेसबुक ने इसे रोका नहीं और इसके द्वारा लोगों के डेटा चुराने और उसे दूसरों को बेचने का सिलसिला जारी रहा.

इस तरह सिर्फ 2 लाख 70 हज़ार लोगों के डाउनलोड से सीए ने उनकी पूरी फ्रेंडलिस्ट में पहुंच बनाकर करीब 5 करोड़ यूज़र्स के बारे में जानकारी बिना उनकी इजाज़त के हासिल कर ली.

डेटा का इस्तेमाल कैसे होगा

कंपनी का दावा है कि वह जो राजनीतिक अभियान चलाती है, वह वैधानिक रूप से हासिल लोगों के व्यक्तिगत डेटा पर आधारित होती है. हम अमेरिकी चुनाव के उदाहरण को लेकर चलते हैं, कंपनी सीए का दावा है कि अमेरिका के 23 करोड़ वोटर्स के बीच उसने 5,000 डेटा पॉइट का इस्तेमाल किया और उनके बिल्कुल उपयुक्त प्रोफाइल तैयार किए ताकि बाद में लक्ष‍ित विज्ञापनों के द्वारा उन तक पहुंचा जा सके.

कंपनी किसी यूज़र के डेटा के जरिए साइकोलॉजिकल प्रोफाइलिंग करती है. इसके आधार पर क्लाइंट के समर्थन में और विरोधी के खिलाफ सूचनाएं प्लांट की जाती हैं. इसकी वजह से चुनाव में ज़्यादातर लोगों का मन बदल जाता है और वह अपने वोट को बदल देते हैं.

भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यहां 20 करोड़ लोग फेसबुक इस्तेमाल करते हैं जिसमें ज्यादातर 18 से 35 साल की उम्र में है. यह लोग राजनीतिक दलों द्वारा फैलाई गई बातों को सच समझकर अपनी राय बना लेते हैं.

Cambridge Analytica ने फेसबुक के इस सारे डेटा, जो इन एप्पलीकेशन से प्राप्त किये गए थे, को बिना अनुमति के पढ़ना शुरू कर दिया. जैसे आप कहां गए, आपने किस पेज, ग्रुप, या शख्स को लाइक किया.

इसे नाम दिया गया डेटा हारवेस्टिंग. यानी जिस प्राइवेसी की बात फेसबुक करता रहा है उन सारे नियमों की Cambridge Analytica ने धज्जियां उड़ा दीं.

अब जरा सोचिए कि Cambridge Analytica को ये पता है कि कितने लोगों ने नरेंद्र मोदी का पेज एक महीने में लाइक किया और कितनों ने अनलाइक किया.

उसे ये भी पता है कि राहुल गांधी के समर्थन वाले पोस्टों पर कितने लाइक आ रहे हैं और पहले कितने आते थे. कंपनी को ये भी पता है कि किस शहर में किस पार्टी के प्रति रूख क्या है और कितने शख्स किस पार्टी के लिए कट्टर हैं या कितने हवा के साथ चलते हैं.

ये सारा डेटा इन कंपनियों के पास इकट्ठा हो जाता है. इसी हिसाब से पार्टियां अपनी रणनीति तय कर सकती हैं.

सिर्फ इतना ही नहीं, इन कंपनियों के पास हर व्यक्ति की एक पर्सनेलिटी प्रोफाइल तैयार हो जाती है. वो भी ईमेल और फोन नंबर के साथ. ऐसे में चुनाव से पहले असमंजस में पड़े लोगों को किसी खास पार्टी से जुड़े संदेश फोन और ईमेल के जरिए भेजा जा सकता है.

यानी कंपनियां फेसबुक इस्तेमाल करने वाले के विचार को प्रभावित करने की ताकत रखती हैं. बताया जा रहा है कि इसी के सहारे अमेरिका में ट्रंप को राष्ट्रपति चुनाव तक जितवा दिया गया .

एक उदाहरण से समझें

समाजवादी पार्टी के नरेश अग्रवाल बीजेपी में सम्मिलित हुए जिनका विरोध इस बात पर हुआ कि उन्होंने प्रभु श्री राम के लिए अमर्यादित टिप्पणी की थी.

इसे सोशल मीडिया में प्लांट किया गया और कुछ ऐसे की बहुत से लोगों का नजरिया बीजेपी के लिए नेगेटिव हो गया.

ये न्यूज ऐसे ही प्लांट की जाती है. आप खुद को सोचते हैं कि आप सही हैं लेकिन आप की सोच को मनोवैज्ञानिक तरीके से बदल दिया जाता है. इसलिए मैं बोलता हूँ हम डिजिटल कठपुतली हैं सत्ता की…

फ़ेसबुक के लिए डेटा, ईंधन की तरह है – ये विज्ञापनदाताओं को एक प्लेटफार्म देता है, जिसके बदले में फ़ेसबुक पैसा बनाता है.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि फ़ेसबुक के पास अपने यूज़र्स के लाइक्स, डिसलाइक्स, लाइफस्टाइल और राजनीतिक झुकाव की विस्तृत प्रोफाइल तैयार करने की क्षमता है.

बचाव

फ़ेसबुक पर लॉग इन करें और ऐप सेटिंग पेज पर जाएं. एप्स, वेबसाइट्स और प्लगइन के नीचे नज़र आ रहे एडिट बटन पर क्लिक करें. अब प्लेटफार्म को डिसेबल कर दें.

ऊपर दिए गए तरीके को अपनाने के बाद आप फ़ेसबुक पर किसी थर्ड पार्टी साइट का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. अगर ये तरीका आपको पसंद नहीं आया तो ऐप इस्तेमाल करने के बावजूद अपनी निजी जानकारी तक दूसरों की पहुंच को सीमित करने का एक और तरीका है.

फ़ेसबुक के ऐप सेटिंग्स पेज में लॉग इन करें. उस हर कैटेगरी को अनक्लिक कर दें जिसे आप ऐप को दिखाना नहीं चाहते.

इसमें आपका बायो, जन्मदिन, परिवार, धार्मिक विचारधारा, आप ऑनलाइन हैं या नहीं, आपकी टाइमलाइन पर दिखने वाले पोस्ट, आपकी गतिविधियां और रुचियां शामिल हैं.

यदि आपने खेलने का मन बना ही लिया है तो कभी भी किसी उत्पाद के सर्विस पेज के ‘लाइक’ बटन पर क्लिक नहीं करें और अगर आप किसी गेम या क्विज़ को खेलना चाहते हैं तो फ़ेसबुक से लॉगइन करने के बजाए सीधे उसकी साइट पर जाएं.

विशेष

डेटा लीक प्रकरण की वजह से ही फेसबुक CEO मार्क जुकरबर्ग को एक दिन में 6.06 अरब डॉलर गंवाने पड़े. इस बीच, यूएस फेडरल ट्रेड कमिशन यह जांच कर रहा है कि क्या पर्सनल डेटा के इस्तेमाल को लेकर फेसबुक ने नियमों का उल्लंघन किया है?

डेटा से छेड़छाड़ की संभावनाओं के बीच ही मार्क जुकरबर्ग को अमेरिका और ब्रिटेन संसदीय समिति की ओर से तलब किया जा चुका है.

कैंब्रिज एनालिटिका ब्रिटिश डेटा एनालिटिक्स फर्म है. इस फर्म पर 5 करोड़ फेसबुक यूजर्स के डेटा को चुराने का आरोप हैं. 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को सर्विस दे चुकी है. ये खुलासा अमेरिका और ब्रिटेन के कुछ बड़े मीडिया हाउसेज ने किया है. चुराए गए डाटा का इस्तेमाल चुनाव प्रचार में किया गया.

रिपोर्ट्स के मुताबिक 2013 में अमेरिकी चुनावों को ध्यान में रखकर ये कंपनी बनाई गई. कंपनी पर फेसबुक के साथ मिलकर 5 करोड़ लोगों का डेटा चुराने का आरोप है. जबकि फेसबुक ने कहा है कि उसे डेटा चोरी की जानकारी नहीं थी.

फेसबुक ने कैंब्रिज एनालिटिका और एक यूके बेस्ड प्रोफेसर अलेक्जेंडर कोगन को बैन कर दिया है. कोगन ने पर्सनैलिटी प्रेडिक्टर ऐप तैयार कर उसके जरिए जानकारियां चुराई थी.

यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के प्रोफेसर कोगन ने फेसबुक आधारित एक पर्सनैलिटी प्रेडिक्टर ऐप तैयार किया. फेसबुक के मुताबिक ‘दिस इज योर डिजिटल लाइफ’ को करीब 2 लाख 70 हज़ार लोगों ने डाउनलोड किया. इस ऐप के जरिए लोगों की जानकारियां चुराई गई. साथ ही इन प्रोफाइल्स से जुड़े हुए फेसबुक फ्रेन्ड्स की भी निजी जानकारियां चोरी की गई.

हालांकि इस ऐप को इस तरह से तैयार किया गया था कि इस्तेमाल करने वाले यूज़र्स को भी इसकी भनक नहीं लगी. यानी उनकी बिना जानकारी के ही ऐप से उनकी जानकारियां चोरी की जा रही थी.

फेसबुक ने कहा कि इस तरह जब कोगन ने इन जानकारियों को कैंब्रिज एनालिटिका तक पहुंचाया तो उन्होंने प्लेटफॉर्म की नीतियों का उल्लंघन किया है. ये जानकारी सामने आने के बाद मैसाचुसेट्स की अटार्नी जनरल ने कहा कि उनके कार्यालय ने जांच शुरू कर दी है.

आपका नाम, पता, सेक्स, पॉलिटिकल इंटरेस्ट, हर एक जानकारी फेसबुक पर मौजूद है. यानी आपकी सारी निजी जानकारी फेसबुक के पास है. ऐसे में प्राइवेसी की आज़ादी चाहने वाले इस दौर में आपका फेसबुक डेटा कहां तक सुरक्षित है?

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