मूर्खों, तुमने इतिहास से अब तक कोई सबक क्यों नहीं सीखा?

मोसुल में जो 39 भारतीयों का कत्लेआम हुआ और उनमें 31 सिक्खों के होने की जो अफवाहें उड़ाई जा रही हैं यह ज़रूर संघियों की साज़िश हैं, जो कि सिक्ख-मोमिन भाई-भाई के रूहानी रिश्तों पर ईर्ष्या से जले भुने बैठे रहते हैं.

ऐसा कैसे हो सकता हैं कि 39 भारतीयों में से 31 सिक्खों को भी मार दिया गया हो? या तो उन सिक्खों ने दाढ़ी पगड़ी नहीं रखी होगी, या फिर एक सम्भावना यह भी हो सकती कि मारने वाले ज़रूर यहूदी होंगे जो इस्लाम को बदनाम करने का कोई ना कोई मौका बना ही लेते हैं.

क्योंकि अगर वह इस्लामिक आंतकी होते तो उन्हें यह ज़रूर याद रहता कि कैसे अभी हमने रोहिंग्या भाईजानों के लिए लंगर सेवा की थी, कैसे हम लोगों ने सीरिया में ‘सेव सीरिया’ की टीशर्ट पहने लंगर सेवा दी थी?

कैसे हम कश्मीर के अलग होने को और वह खालिस्तान को बनाने में मिल जुल कर दुःख दर्द आपस में बाँट लेते हैं.

उन्होंने गिलानी, सिमरनजीत सिंह के गले लगते हुए फोटो पर भी तरस नहीं खाया?

फिर यह सब कैसे हो सकता है? इतने भी अहसानफरामोश थोड़े ही है मुहम्मद की उम्मत, कि जहाँ जिस थाली में खाना खाते उसी में छेद करते फिरते हैं.

हालांकि इसके कश्मीर के छत्तीसिंहपोरा में भी ऐसे ही चालीस के लगभग सिक्खों को लाइन से खड़े कर भून दिया गया था और भरसक कोशिश की थी आरोप सेना पर डालने की.

लेकिन अंत पंत पता चला कि यह तो कश्मीरी जिहादियों का काम है, तो हमने घर का मामला समझ कर बात को वही खत्म कर दिया.

हमारे लिए यह उदारता दिखाना कोई नई बात भी नहीं थी, हमने तो कांग्रेस को ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार कर लिया 84 भुला कर. फिर यह तीस चालीस लोगों की हत्या को कितने दिन सीने से चिपकाएं?

वैसे कोई बता रहा था कि मारने वालों ने मारने से पहले नाम या धर्म का भी पूछा था…

हो सकता है किसी मेरे जैसे ने उम्मीद से उन्हें यह भी बताया हो कि भाईजान, हमारे वाले लोग तुम्हारे वाले लोगों को लंगर भी खिलाते हैं तो कम से कम नमक का फ़र्ज़ ही अदा कर दो.

फिर यह सोच कर दिल बैठ जाता कि कहीं सामने वाले गौरी और पृथ्वीराज चौहान की कहानी ना सुना दी हो यह कह कर, कि मूर्खों, तुमने इतिहास से अब तक कोई सबक क्यों नहीं सीखा?

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