भोजन : देह ही नहीं, देता है आत्मा को पोषण, रिश्तों को गर्माहट और निकटता

Ma Ki Rasoi Se

कार्यालय से आने के बाद हम पति-पत्नी रात्रि का भोजन बनाने में जुट जाते हैं. दिन भर काम करने के बावजूद खाना पकाने में कोई शॉर्ट कट नहीं लिया जाता.

लाल मिर्च, धनिया या हल्दी पाउडर का प्रयोग नहीं किया जाता. इसके लिए कुछ तैयारी कई बार शनिवार-रविवार को कर ली जाती है…

जैसे भिंडी या फिर मेथी को धोकर, छांटकर सूखने के लिए रख देना; हल्दी की गांठो को लहसुन, अदरख, और साबुत लाल मिर्च के साथ मिक्सर में पीस कर उसके पेस्ट को फ्रिज में रख देना.

साबुत धनिये का बीज और लाल मिर्च का पाउडर एक हफ्ते की आवश्यकता के अनुसार 7-8 चम्मच पीस के रख लिया जाता है.

पत्नी दाल-चावल, सब्जी को धोने-भिगोने में लग जाती है और मैं प्याज-लहसुन (अगर आवश्यकता हुई तो), अदरख, हरी मिर्च को बारीक चॉप करना, भिंडी, गुआर-लोबिया-सेम की फली, बैंगन, गोभी, आलू, करेला, परवल, टमाटर, हरी प्याज इत्यादि को काटने में.

साथ ही एक बर्नर पर कच्चे लोहे का पैन, दूसरे पर प्रेशर कुकर में दाल और एक अन्य बर्नर पर चावल चढ़ा दिया जाता है.

पैन में सरसो का तेल गरम करने के लिए उड़ेल दिया जाता है. दाल में हल्दी का पेस्ट, नमक और खटास के लिए कोकुम डाल दी जाती है और कुकर का ढक्कन बंद.

गरम सरसों के तेल में सब्जी के अनुसार तेज पत्ता, साबुत लाल मिर्च, पांच फोरन या जीरा डालकर उसके उछलने का इंतज़ार करना, उन मसालों की महक नाक में घुसाने के बाद बारीक कटी प्याज, लहसुन, अदरख, हल्दी पेस्ट को भूनना, फिर ताज़ा पिसा धनिया और लाल मिर्च पाउडर, नमक के साथ उस पेस्ट में मिलाना, और फिर कटी सब्जी को उस कंपकंपाते हुए मिश्रण में डाल देना.

जब तक सब्जी पकने में समय लगता है, कुकर में सीटियां आ जाती है, चावल पक जाता है और उनका बर्नर बंद कर दिया जाता है. चौथे बर्नर पर कच्चे लोहे की छौंके के पैन पर देशी घी डालकर चढ़ा दिया जाता है.

अब शुरू होती है आर्ट.

दमदमाते, लहराते गर्म घी में साबुत लाल मिर्च, जीरा, हींग को उछलने दिया जाता है. पुनः कतरी लहसुन, फिर पिसी लाल मिर्च और अंत में बारीक कटा टमाटर डाल दिया जाता है.

तब तक कुकर का ढक्कन या तो खुल जाता है या ठन्डे पानी में खोल दिया जाता है. इस मिश्रण को दाल में छौंक कर सब्जी की तरफ ध्यान दिया जाता है, जो तब तक पक जाती है. छौंक लगाने का कार्य मेरा है क्योकि पत्नी घी में कंजूसी कर जाती है.

अगर चावल की जगह रोटी खाने का मन हुआ, तो घर में गेंहू, बेसन, मक्का, बाजरे और ज्वार के आटे में से किसी एक को मैं मढ़ता हूँ और फिर पत्नी रोटी बनाकर उसमे देशी घी चुपड़ती है.

तब तक मैं गमले से हरा धनिया कुतरता हूँ, उसे दाल और सब्जी में छिड़कता हूँ और कच्ची प्याज और हरी मिर्च अपनी प्लेट में सजाता हूँ.

फिर शुरू होता है भोजन.

दाल, चावल, सब्जी या फिर दाल, रोटी, सब्जी. और साथ में कच्ची प्याज और हरी मिर्च. बिल्कुल देव लोक का आनंद होता है. ऐसा आनंद जिसको शब्दों में नहीं ढाला जा सकता.

हमारे प्रतिदिन की मेहनत और प्रसन्नता के साथ भोजन बनाने का परिणाम यह हुआ कि मेरे बेटे को ऐसे खाना खाने की आदत लग गई.

वह प्रतिदिन खुली हुई रसोई में हमें खाना बनाते हुए देखता था. उसे अब रेस्तरां का खाना पसंद नहीं आता. अब वह विश्वविद्यालय में पढ़ रहा है और छात्रावास के बाहर कुछ छात्रों के साथ अपने फ्लैट में रहता है.

भारी कोर्स और व्यस्तता के बावजूद वह अपने फ्लैट में हर दो दिन में एक बार खाना बनाता है. इसमें दाल-सब्जी, चावल, राजमा-चावल या फिर बहुत बढ़िया तरीके का पास्ता और सूप. हर चीज में एकदम ताज़ी सामग्री.

महीने में एक या दो बार मैं जापान, चीन या थाईलैंड का भोजन बनाता हूं. या फिर पिज़्ज़ा या ब्रेड. इसमें भी उन व्यंजनों की पूरी सामग्री जैसे कि गालंगल, लेमन ग्रास, सूखी मूली, मशरूम, टोफू, बाजार से ताज़ा आता है और पूरा का पूरा घर उन सामग्रियों की खुशबू से भर जाता है.

इन व्यंजनों को भुने तिल या मूंगफली के तेल या नारियल के तेल में पकाया जाता है. और पके व्यंजन मे आवश्यकता अनुसार सोया सॉस, वसाबी.

अगले महीने से वसंत ऋतु और गर्मी के मौसम में बाहर लॉन में महीने में दो बार लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाना शुरू हो जाएगा. शनिवार-रविवार को पेड़ के नीचे भोजन करना और ऊंघना.

मेरा हमेशा से यह मानना है कि भोजन से हमारा पेट नहीं भरता; बल्कि भोजन से हमारी आत्मा का पोषण होता है, पुष्टि होती है. अच्छे भोजन से रिश्तों में गर्माहट आती है और संबंधों में निकटता.

तभी हम भोजन को देवतुल्य समझते हैं और भगवान को उसका भोग चढ़ाते हैं; नाते-रिश्तेदारों, मित्रों और गरीबों के साथ मिल-बांटकर खाते है.

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