सिनेमा और रंगमंच की आपसदारी और नाटकों पर बनी फ़िल्में

भारत में इन दिनों थिएटर ओलिम्पिक की धूम है. इसके समर्थन और विरोध दोनों ही के कारण कला की बिरादरी में गहमागहमी है. सबके अपने-अपने तर्क और वजहें हैं. विरोध, प्रतिरोध, समर्थन, पहुँच के कारण कलाओं में सिनेमा और रंगमंच से दर्शक का ‘कनेक्ट’ सबसे ज़्यादा है.

बात अगर इन दोनों की करें तो वैसे भी सिनेमा और थिएटर का नाता है ही और एक लंबी लिस्ट थिएटर से सिनेमा में या दोनों में काम करने वालों की बनती है. मार्च महीने की सत्ताईस तारीख को वर्ल्ड थिएटर डे भी मनाया जाता है.

बहरहाल, रंगमंच का अपना व्यापक फ़लक और सरोकार हैं और उसमें जीवटता से काम करने वाले सिनेमा और थिएटर दोनों को अलग-अलग असर करने वाले माध्यम मानते हैं. इसलिए थिएटर और सिनेमा की तुलना या लेन-देन को ठीक नहीं समझा जाता.

मगर, थिएटर की ‘नाटकीयता’ और कथ्य के साहित्यिक महत्व के कारण सिनेमा ने रंगमंच से बहुत कुछ लिया है. दुनिया भर में इन दो कलाओं को बारीक़ी से जानने-समझने वाले लेखक-निर्देशक-फ़िल्मकार कुछ न कुछ संतुलन या आपसदारी को खोज ही लेते हैं. मुख्य रूप से यह लेन-देन लेखक के कारण रहा.

सिनेमा मुख्य रूप से दृश्यों का माध्यम माना जाता है इसलिए कोई भी कथा परदे यानि स्क्रीन पर दिखाये जाने के लिए विज़ुअल (दृश्य/सीन) की मांग करती है.

रंगमंच पर पुरातन काल से चली आ रही सबसे सशक्त किरदार सूत्रधार की परंपरा सिनेमा माध्यम में सबसे कमजोर मानी जाती है. और यहीं से सिनेमा और रंगमंच के माध्यम में फ़र्क की शुरुआत होती है.

बहरहाल, इसीलिए दोनों ही माध्यमों में दिखाई जाने वाली कहानी रूपान्तरण की मांग करती है. हालांकि, यहाँ लेखक और निर्देशक के रूप में दो बहुत महत्त्वपूर्ण कारक उभरते हैं जिनके कारण दोनों माध्यम भिन्नता और स्तरीयता का दर्जा पाते हैं. यह बहस रंगमंच और सिनेमा की श्रेष्ठता या भिन्नता के लिए नहीं बल्कि उस आधार को बना देने की है जिस पर इस आलेख का मंतव्य टिका है अन्यथा यह बात दूसरी दिशा में जा सकती है.

हॉलीवुड ने लेखन की महत्ता को स्वीकारा है और इसलिए वहाँ के एकेडमी अवार्ड्स में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लेखन पुरस्कार में दो कैटेगरी हैं – बेस्ट ओरिजिनल स्क्रीनप्ले और बेस्ट एडप्टेड स्क्रीनप्ले. 1956 तक इसे कहानी का ही अवार्ड माना जाता था जिसे फिर इन दो कैटेगरी में विभाजित किया गया.

हालांकि, मतभेद इधर भी बहुत से हैं पर यह एडप्टेशन या रूपान्तरण लेखक और निर्देशक के कौशल को ही टटोलता है. साहित्य की कई विधाएँ कहानी, उपन्यास, जीवनी, यात्रा वृत्तान्त, आत्मकथा, कविता, नाटक आदि या तो सिनेमा के मूल विचार या उसके आधार रहे जिस पर बहुत कुछ लिखा, पढ़ा जा चुका है.

केवल नाटकों पर बनी फ़िल्मों की बात की जाये तो यह संख्या भले कम हो पर रोचक ज़रूर है. शेक्सपीयर की लेखकीय उपस्थिति और साहित्यिक क़द आज भी अपने पूरे सम्मोहन के साथ मौजूद है. यही कारण है कि सिनेमा में शेक्सपीयर का जम कर उपयोग हुआ.

यूरोप में जन्मे शेक्सपीयर नाटकों के साथ जीवन की जिस क्रान्ति को उद्घाटित करते हैं उसने देश काल, भूगोल को तोड़ते हुए पूरी दुनिया को एक किया है. सिनेमाई इतिहास में शेक्सपीयर जितनी तरह आते हैं उतना कोई और लेखक नहीं.

बीते कुछ सालों में नाटक आधारित फ़िल्मों में मेरी देखी बेहतरीन फ़िल्मों में ‘एमेड्यूअस’ एक बेहतरीन फिल्म रही है. रशियन नाटककार एलेक्ज़ैन्डर पुश्किन के 1830 में लिखे नाटक ‘मोज़ार्ट एंड सैलियरी’ पर आधारित मिलोस फ़ोरमैन की यह फ़िल्म 1984 में बनी थी.

पीटर शैफर के रूपान्तरण पर यह पहले नाटक ‘एमैड्यूअस’ और फिर बाद में इसी नाम से फ़िल्म के रूप में बना. ऑस्ट्रिया के वियना में बूढ़े संगीतकार सैलियरी के मोज़ार्ट को ज़हर देकर मार देने की स्वीकारोक्ति से कहानी शुरू होती है जिसका कारण उसकी ईश्वर से वह ईर्ष्या है जब उसने सारी सांगीतिक प्रतिभा मोज़ार्ट को दे दी.

ढाई घंटे से भी अधिक की यह फ़िल्म अपने फैलाव में नाटकीयता, भव्यता और मोज़ार्ट की धुनों के कारण कमाल का अनुभव देती है. हॉलीवुड रॉम-कॉम के स्टार माने जाने वाले वूडी एलन के लिखे नाटक ‘प्ले इट अगेन सैम’ पर इसी नाम से बनी फ़िल्म जिसमें मुख्य किरदार भी वूडी ने निभाया है, मज़ेदार फ़िल्म है. दार्शनिकता से इतर ज़िंदगी की सच्चाई को हल्के-फुल्के मनोरंजन के साथ ट्रीट करना साहित्य में स्वीकार्य नहीं. सिनेमा फ़िल्म इसी मिथक को तोड़ता है.

तलाक़शुदा सैम जो कि एक फ़िल्म समीक्षक है फ़िल्म ‘कासाब्लांका’ के किरदार रिक (ह्ंफ़्री बोगर्ट) से प्रभावित है. तलाक के बाद की निराशा से उबरते हुए सैम अपने दोस्त के फिर से ज़िंदगी शुरू करने और स्त्रियों से मिलने की सलाह के बाद उसी की पत्नी से दिल लगा बैठता है.

उसके दिमाग में चल रही कई परिस्थितियाँ और रिक का किरदार जो फ़िल्म ‘कासाब्लांका’ में अपनी प्रेमिका को उसके पति के साथ जाने देता है, को स्वीकार न करते हुए सैम की यह कहानी गुदगुदी पैदा करती है.

इसके इतर जर्मन निर्देशक रेने वर्नर फास्बेंडर लिखित नाटक ‘द बिटर टिअर्स ऑफ पेट्रा वॉन कांट’ पर इसी नाम की जर्मन फ़िल्म फैशन डिज़ाइनर पेट्रा वॉन कांट के जीवन के उन पहलुओं को उभारती हैं जब पुरुष प्रेमी पति के मर जाने या शादी के बाद तलाक हो जाने के कारण उसे पुरुषों के प्रति घृणा हो जाती है. यही उसका स्त्रियॉं के प्रति आकर्षण भी पैदा होता है.

फिर भीतर की कई ग्रंथियों के कारण उसके अवचेतन की कई परतें खुलती हैं. 1972 में बनी यह एक कमाल की एक्सपेरिमेंटल फ़िल्म है जो आज के समाज की हक़ीक़त भी दर्शाती है.

इटैलियन फ़िल्मकार पिएरे पाओलो पसोलिनी साहित्यिक कृतियों पर अपनी तरह की फ़िल्में बनाते रहे हैं जिसमें सेक्स, न्यूडिटी के ज़रिये ज़िंदगी की सच्चाईयों पर तीखा व्यंग्य होता है. सोफ़ोक्लीज़ के नाटक ‘ईडीपस रेक्स’ पर आधारित इटैलियन फ़िल्म ‘इडिपो रे’ में उनकी यही शैली दिखती है. हालांकि, पसोलिनी इसके बाद की फ़िल्मों में अपनी स्टाइल अलग तरह से उभारते हैं.

मगर अपनी देखी फ़िल्मों में पसोलिनी मुझे अलग (अजीब) तरह के फ़िल्मकार लगते हैं. और इस नाते भी उनकी फ़िल्में देखे जाने की मांग करती हैं. हिन्दी फ़िल्मों में शूद्रक के नाटक ‘मृच्छटिकम’ पर गिरीश कर्नाड निर्देशित फ़िल्म ‘उत्सव’, शेक्सपीयर के नाटकों पर आधारित विशाल भारद्वाज की फ़िल्मों ‘मक़बूल’, ‘ओमकारा’ और ‘हैदर’ चर्चित हैं ही. कई और हिन्दी फ़िल्में ‘रोमियो जूलियट’ की कहानी पर आज भी बन ही रही हैं.

‘क़यामत से क़यामत तक’, ‘इशकज़ादे, ‘रामलीला’ आदि तक एक लंबी लिस्ट बनती है. मणि कौल ने मोहन राकेश के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर इसी नाम से अ-नाटकीय फ़िल्म बनाई है. जो उनका सिग्नेचर मिनिमलिज़्म स्टाइल भी है.

मराठी नाटक ‘कटयार कालजात घुसली’ पर साल 2015 में सुबोध भावे की इसी नाम से बनी फ़िल्म आई थी जिसमें मशहूर गायक शंकर महादेवन ने अभिनय भी किया था. दो सांगीतिक घरानों और गुरुओं की लड़ाई को दर्शाती यह बेहद चर्चित फ़िल्म थी.

प्रसिद्ध मलयाली फ़िल्मकार जी अरविंदन की ‘कांचन सीता’ इसी नाम के नाटक पर आधारित भारतीय सिनेमा की बेहतरीन फ़िल्मों में से है जो राम के जीवन की उत्तर कथा पर आधारित है. हालांकि ऐसी फ़िल्मों को कथा के आधार पर केवल वर्गीकृत कर उन पर बात नहीं की जा सकती. पर आलेख की सीमाओं में उन्हें चिन्हित कर यह फ़िल्में देखी जा सकें तब भी उसकी सार्थकता बनी रह सकेगी.

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