गौरेया कहीं नहीं गई है

यदि आज आपकी सुबह किसी गांव या शहर के बाहरी इलाके में होती तो निश्चित रूप से आप गौरया को न केवल देख सकते थे बल्कि उसकी चहचहाट भी सुन सकते थे. किसी ग्रामीण के लिए विश्व गौरैया दिवस कोई मायने नहीं रखता है.

दिल्ली जैसे महानगर में ये पक्षी भले ही विलुप्त हो गया हो लेकिन देश के ग्रामीण क्षेत्र आज भी गौरेया की चहचहाट से आबाद हैं. इंदौर जैसे शहरों के बाहरी क्षेत्रों में ये आज भी मौजूद हैं. गौरेया कहीं नहीं गई, बस हम शहर वालों ने उसे दिल से निकाल दिया है.

मैंने अपने पत्रकारिता दौर में अख़बारों को तीन महा अभियान दिए थे. चिड़ियों को दाना-पानी देना उनमे से एक अभियान था. ये अभियान मैंने दैनिक भास्कर को सन 2008 में दिया था. जब तक मैं इस अभियान को चलाता रहा, इसे वैज्ञानिक ढंग से आगे बढ़ाया गया लेकिन बाद में तो ये अभियान लोगों के फोटो अखबार में छपने का साधन बन गया था. चिड़ियों को दाना-पानी देना भारतीय परंपरा का हिस्सा रहा है.

मेरे अभियान ने इंदौर में एक नव-जागरण का काम किया. आज गौरेया को लेकर कई बातें चल रही हैं. ये बात सही है कि इसकी आबादी में पचास प्रतिशत की गिरावट आई है लेकिन ये विलुप्त नहीं हुई है. और न ही मोबाइल रेडिएशन इनकी विलुप्ति का कारण है. मोबाइल इनकी विलुप्ति का कारण होता तो ये शत-प्रतिशत ख़त्म हो गई होती. मोबाइल की तरंगे तो चहुँ ओर विद्यमान है तो फिर हर सुबह गौरेया मेरे घर कैसे आ जाती है.

गौरेया खुद नहीं गई बल्कि हमने उसे घर से निकाल दिया. उसके घोंसले के कारण होता कचरा भी हम सह नहीं सके. जब वह घोंसला बनाती, हम उसे साफ़ कर देते. तंग आकर वह हमें छोड़ गई.

सिर्फ यहीं नहीं, ये प्यारा जीव काँटों के पेड़ों पर अधिक पाया जाता है. वे बुश शहरी इलाकों से साफ़ हुए, तो गौरेया और दूर चली गई. हमने अपने बगीचे में रासायनिक कीट नाशक इस्तेमाल करना शुरू कर दिया और गौरेया के आशीर्वाद से खुद को दूर कर लिया. दिल्ली के गौरेया विहीन होने का मुख्य कारण यही है.

जो लोग पक्षियों के लिए घर की छत पर या बगीचे में पानी रखते हैं, उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए. मैं कई दिन से इस पर एक शोध कर रहा हूँ, जिसमे आंशिक सफलता मिली है. क्या आपने कभी पक्षी का झूठा फल खाकर देखा है. जिन लोगों ने खाया है, वे जानते हैं कि पक्षी के झूठा करने के बाद वह फल असाधारण रूप से मीठा हो जाता है. इसी बात ने मुझे और सोचने के लिए प्रेरित किया.

मेरे यहाँ पक्षियों के लिए रखे मिट्टी के सकोरों में सुबह जो पानी बचता था, उसे मैं उन पौधों में डालने लगा, जो बीमार हो रहे थे. मेरे घर की तुलसी नहीं पनप रही थी. मैंने पक्षियों का झूठा पानी तुलसी जी में डालना शुरू कर दिया. मात्र चार दिन बाद ही तुलसी में नई कोंपले फूँट आई.

ये प्रयोग पाम वृक्ष के साथ भी सफल रहा. पक्षी आपके घर आता है तो ये मत सोचिये कि आपने पुण्य कमा लिया. यथार्थ में पुण्य तो वे पक्षी कमाते हैं, आपको कुछ देकर ही जाते हैं लेकिन अब उस सौगात को पहचानने वाला ज्ञान ही खो गया.

प्लास्टिक के बर्तन में पक्षियों के लिए पानी कभी न रखें. यदि आपके घर के बाहर या छत पर कोई नल है तो उसे इतना खोलें कि हर चार सेकंड में एक बूंद टपक जाए. पक्षी पचास फ़ीट की ऊंचाई से भी वह बूंद देख सकते हैं. पानी ऊंचाई पर रखें ताकि पक्षियों को बिल्ली का डर न हो. जब आप पक्षियों के लिए दाना डालने की शुरुआत करेंगे तो पहले के एक दो हफ्ते एक एक या दो पक्षी ही आएँगे. उनका कम्युनिकेशन धीमी गति से होता है इसलिए उनके झुण्ड को आने में कुछ दिन लग सकते हैं.

गौरेया अब भी आती है लेकिन यदि आपके घर में कोई पेड़ नहीं है, बगीचा नहीं है तो वह क्यों आएगी. शहरों से दूर रहकर वह खुश है. उसको खाना-पानी बराबर मिल रहा है. गांव ने अब तक उसको दिल से नहीं निकाला है. यदि कोई तथाकथित विशेषज्ञ साथ चलना चाहे तो मुझे उनकी तथाकथित रिसर्च के चिंदे करने में अत्याधिक प्रसन्नता होगी. स्वागत है.

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