अगली पीढ़ी को अपने धर्म के बारे में बताने के लिए आपके घर में कौन सी किताबें हैं?

पुरानी सी कहावत ‘बूढ़ा तोता राम-राम नहीं रटता’ कई अलग रूपों में भारत में प्रचलित है. जैसे मैथिली में इसके लिए ‘सियान कुकुर पोस नै मानै छै’ कहा जाता है, जिसका मतलब होता है कि कुत्ता बड़ा हो जाए तो उसे पालतू नहीं बनाया जा सकता.

ये कहावत भी हिन्दुओं की मूर्खता करने, और कर के फिर उसी पर अड़े रहने की विकट क्षमता दर्शाती है.

बचपन से ही सिखाना होगा, ये जानने के बाद भी ज्यादातर सनातनी परंपरा के लोग अपने धर्म के बारे में अपने बच्चों को कुछ भी सिखाने का प्रयास नहीं करते.

शायद उन्हें लगता होगा कि इस काम के लिए कोई पड़ोसी आएगा, ये उनकी जिम्मेदारी नहीं है.

ऐसी ही वजहों से अगर आज किसी ऐसे आदमी से, जो गर्व से खुद को सनातनी कहता हो, उस से पूछ लें कि अगली पीढ़ी को अपने धर्म के बारे में बताने के लिए आपके घर में कौन सी किताबें हैं? तो वो बगलें झाँकने लगेगा.

नौकरी-काम के सिलसिले में आप चौबीस घंटे बच्चे के लिए उपलब्ध नहीं हैं, दादी-नानी भी दूर कहीं रहती हैं, तो आपको तो सिखाने के लिए कुछ किताबें घर में रखनी चाहिए थीं.

इतने प्रश्न बहुत सरल भाषा में, मधुर वाणी में और मुस्कुराते हुए ही पूछियेगा. क्योंकि इतने सवालों पर आपको सनातनी मूर्खता के बचाव में विकट तर्क सुनाई देने लगेंगे.

वो बताएगा कॉमिक्स पढ़कर बच्चे बिगड़ जाते हैं, महंगी भी होती हैं इसलिए अमर चित्र कथा उसने नहीं ली है. वो ये भी बताएगा कि पञ्चतंत्र के नाम में ही तंत्र है, उसका ऐसी चीज़ों पर विश्वास नहीं, फिर पुराने जमाने कि इस किताब से आज के बच्चे क्या सीखेंगे? इसलिए वो पंचतंत्र जैसी किताबें भी नहीं लाया.

आपको तो पता ही है कि भगवद्गीता पढ़कर पड़ोस के कितने ही लोग साधु हो गए हैं! दस-बीस ऐसे लोग जो पहले पन्ने से आखरी पन्ने तक भगवद्गीता पड़कर साधु हुए हैं, ऐसे सनातनियों को कौन नहीं पहचानता? रोज ही दिख जाते हैं, इसलिए वो भगवद्गीता भी घर में नहीं रखता.

महाभारत घर में रखने से झगड़े होते हैं, रामायण कहाँ ढूंढें पता ही नहीं, कोई चम्मच से मुंह में डाल देता, मेरा मतलब पढ़ा देता तो सीख कर एहसान भी कर देते. अब बच्चों की किताबों में रूचि भी नहीं रही, कोई किताबें नहीं पढ़ता.

ऐसे तमाम तर्क सुनने के बाद आप आक्रमणकारियों की सनातनी से तुलना कर के देखिये.

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डेविड बर्रेट और जेम्स रीप के ‘Seven Hundred plans to Evangelize the world; the rise of a Global Evangilization movement’ के मुताबिक चर्च के पास 1989 में 41 लाख पूर्णकालिक थे जो आत्माओं की फसल काटते थे. Soul Harvesting करते थे, आपका शराफत वाला ‘धर्म-परिवर्तन’ मासूम सा शब्द है.

उनके पास 13,000 बड़े पुस्तकालय थे, 22,000 पत्रिकाएँ छापी जाती थी और 1800 इसाई रेडियो/टीवी चैनल भी वो चला रहे थे.

पिछले तीस साल में ये गिनती कितनी बढ़ी होगी ये सोचने में जितना समय लगे उतने में उसी स्रोत से ये भी बता दें कि उस वक्त 400 मिशन एजेंसी थी जो आत्मा जब्त करने का काम करती थी.

इन आत्मा जब्ती के संस्थानों में 2,62,300 आत्मा के लुटेरे मिशनरी थे और ये 8 बिलियन डॉलर के करीब के खर्च से चलने वाला काम था. सिर्फ आत्मा-खसोट पर साल भर में 10,000 किताबें और लेख आते हैं. ये सब प्रत्यक्ष हो ऐसा जरूरी नहीं, जातिवाद को उभारने, असंतोष भड़काने के लिए जो लेख लिखवाए उसे भी इसमें जोड़िएगा.

जब ये कर चुके हों तो फिर से बता दें कि ये जानकारी तीस साल पुरानी है. इस नव वर्ष पर, नवरात्रि के दौरान, अगर आप एक दो किताबें भी घर नहीं लाये हैं, कुछ पढ़ने की कोशिश भी नहीं की है तो अगली पीढ़ी तक क्या होगा, उसका अंदाजा तो आप लगा ही सकते हैं.

पूरे देश में लागू होने वाले धर्म-परिवर्तन पर नजर रखने लायक कानून तो बने नहीं हैं, जबकि संवैधानिक तौर पर ये केंद्र सरकार का ही विषय है, ये शायद आपने नहीं सोचा होगा.

ध्यान रहे कि इनका निशाना अक्सर गरीब-पिछड़ा तबका होता है तो ये आपके घर काम करने वाली के मोहल्ले में पहले आयेंगे. आपकी काम वाली बाई कहीं गौमांस खाकर आपके पूजा घर के आस पास झाड़ू-पोछा, सफाई तो नहीं कर रही होगी ना?

सोचिये, सोचना चाहिए!

आप-हम किस मुँह से नई पीढ़ी के पुस्तकों से दूर होने का रोना रोते हैं?

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