लिंगायत और सनातन : जाति बाँटो वोट बटोरो

धर्म के नाम पर सबसे पहले देश की अखंडता पर दुष्प्रहार कर टुकड़े-टुकड़े किये और सत्तर वर्षों तक मनमानी चलाई.

आदिधर्म सनातन के प्रति उत्थान के कार्य का मुहूर्त ही आया था कि हिन्दू-धर्म को टुकड़े-टुकड़े कर बाँटने की दुसह्य कोशिश की जाने लगी. जैन-मत को धर्म घोषित करना, कर्नाटक को अलग ध्वज मिलना, नमाज़ के लिये विशेष अवकाश घोषित होने जैसे कितने ही उदाहरण भरे पड़े हैं.

‘देश बाँटो-वोट बटोरो’ की नीतियां धर्म की जड़ों पर हमला कर निज लाभ की सियासी चालें हैं. और इनके मुहरे सामूहिक जाति के सत्तामदांध मंझले मुहरे हैं.

इस देश को जितना नुकसान अंग्रेजों, मुगलों, शक, हूण, डच और तमाम विदेशी ताक़तों ने पहुंचाया, उससे कहीं ज्यादा नुकसान देश राजनैतिक दल पहुंचाने लगे हैं. जीत हासिल करने के लिये हर हथकंडे अपनाने की कोशिशें की जाने लगी हैं.

जी हाँ! इस बार लिंगायत के जरिये सनातन पर मारक प्रहार करने की कोशिशें हैं-

“लिंगमायतिर्यस्य स लिंगायत्:” से व्युत्पन्न

लिंगायत शब्द ‘लिंग और् ‘आयत’ का संयुक्त शब्द है, जिसका विग्रह करने पर ‘लिंगेन आयत्: लिंगायत्’ अर्थात इसका अर्थ होता है लिंग के साथ सदा युक्त रहनेवाला ठीक उसी तरह जैसे सनातनी सन्त रुद्राक्ष से युक्त रहता है.

लिंगायत का प्रथमांश अर्थात उपसर्ग लिंग अर्थात प्रतीक सगुण साकार ईश्वर का; और मान्यता मूर्तिपूजा के विरोध में?

आश्चर्य में पूर्णतः घुला हुआ प्रश्नवाचक उवाच!

लिंगायत धर्म; जिसका गुरुमन्त्र ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप है.
लिंगायत का भोजन पूर्णतः शाकाहारी है.
लिंगायत का आदेशकर्ता पुरोहित, अनुसरक ‘स्वामी’ कह कर पुकारते हैं.

तब कहाँ से इनमें वैदिकधर्म विभेदीकरण की सम्भावना है???

सारा का सारा दस्तावेज़ ही सनातन की प्रतिलिपि है.

सिख जिनका प्रतीकचिन्ह पृथक, उपासनास्थल पृथक, उपास्य पृथक किन्तु वे दिग्भृमित नहीं. मातारानी के परमभक्त जिनका “एक ओंकार’ एक सतनाम” है. सिख धर्म सनातन ही है किंतु पंथ सिख. वे कभी डाल से न टूटे न जड़ से छिटके. क्योंकि उनका मूल सनातन है.

बारहवीं सदी के समाजसुधारक बसबन्ना को ‘भगवान वासवेश्वरा’ की उपाधि से अलंकृत कर् देना मूर्तिपूजा से किस तरह भिन्न है?

लिंगायत की कौन सी परम्पराएं और मान्यताएं लिंगायत को सनातन से अलग करती हैं?

बासवन्ना के अनुसार जन्म के आधार पर नहीं बल्कि कर्म के आधार पर वर्गीकृत करना; क्या यह वर्ण व्यवस्था से प्रतिलिपी नहीं है?

भगवान शंकर के प्रतीकचिन्ह शिवलिंग की तरह इष्टलिंग धारण करना, क्या भारत में बहती हुई नदियों के पत्थर शिवलिंग की प्रतीति नहीं? तो इष्टलिंग किस तरह शिवलिंग से पृथक कहलाया?

सनातन के जनेऊ और सूत की तरह कंठी धारण करना किस विधि इनको नवाचार सिद्ध हुआ?

यदि स्थापना के कथित बुनियादी तत्वों पर भी एक दृष्टिपात कर लिया जाए तो लिंगायत की स्थापना बारहवीं सदी के समाजसुधारक बासवन्ना ने की; वह था जातिविहीन समाज की स्थापना.

लेकिन विडंबना तो देखिए कि लिंगायत में ही अंतरजातीय विवाह को मान्यता नहीं मिली अर्थात रोटी-बेटी का कोई सम्बन्ध नहीं. क्या इस बिना पर यह नवोदित स्थापना अपने ही मूल्यों का परिहास करती हुई प्रतीत नहीं हो रही? जबकि अब तक सनातनधर्मियों ने यह पुरातन रीत तोड़ कर अंतर्जातीय विवाह को मान्यता दी और प्रोत्साहन दिया. अब न तो उपजातियाँ कोई बंधन रह गईं न ही जातियाँ.

वर्तमान के संदर्भ में निर्रथक आवेशित एक-एक लिंगायत उद्बोधक के शब्दों पर पर ग़ौर कीजिये… आदिधर्म सनातन नहीं बल्कि ब्राह्मणत्व के विरोध में प्रायोजित यह राजनैतिक उपक्रम कुछ और नहीं बल्कि सामूहिक ब्रेनवॉश है.

धर्म कोई प्रसाद नहीं कि बंट जाए अथवा मनमर्ज़ी पर बाँट दिया जाए. यह तो एक जड़ है जो एकमेव है. और इसकी विभिन्न शाखाएँ अलग-अलग दिशाओं में मतांतर स्वरूप विस्तार पा जाती हैं. जिनकी लचक को साधने का फ़ायदा उठाते हैं राजनीतिज्ञ और पोसते हैं अपने सत्तामोह को.

सनद रहे; राजनीति देश को सुचारू रूप से चलाने की नीति है. देश से इतर राजनीति के अपने कोई व्यक्तिगत अर्थ नहीं, कोई अस्तित्व नहीं. आज यदि निजलाभ के लिये धर्म के एकछत्र को कई फलकों में बाँट दिया जाए और देश को राजनीति के समकक्ष प्रतिस्पर्धा में ला खड़ा किया जाए तो इस प्रायोजित षड्यंत्र राजनीति का एक पक्ष जरूर मत बटोर ले.

किन्तु देश तथा धर्म का पतन सुनिश्चित समझिये साथ ही इस पराजय का काला मुकुट उन ‘धिक्कार-राष्ट्र माथों’ पर मढ़िये जो अंधविवेक के मुहरे हैं, जिन्हें सिवाय चाल में कुछ घर बढ़के बैठ जाने के सिवा कोई विचार नहीं है, वे स्वनिर्णीत नहीं हैं, वे मात्र आदेश के पालनकर्ता हैं उनकी भी यह वृहद अघोषित पराजय है जो देश और धर्म चहुँ ओर से अंधेरे में गस कर कालरात्रि कर देने को आतुर हो उठी है…

 

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