भला कैसे रुकेगा भारत के विभाजन की अंतहीन फ़ेहरिस्त का सिलसिला

एक बूढ़ा आदमी था जिसके चार बेटे थे. चारों आपस में लड़ते रहते थे और इस कारण वो बूढ़ा बड़ा व्यथित रहता था.

जब उसका अंतिम वक़्त करीब आया तो अनायास उसे अपने बचपन में सुनी ‘लकड़ी की गट्ठर और एकता’ वाली कहानी याद आ गई और उसने भी अपने बच्चों को सुधारने के लिये यही ‘ट्रिक’ अपनाने की सोची.

लकड़ियां मंगवाई और अपने बच्चों को बुलाया. उस अशक्त बूढ़े के लिये कष्ट से अपनी आँखे खोले रखना मुश्किल हो रहा था. उसने अपनी आँखें बंद कर ली और किसी तरह अपने बेटों के हाथ में लकड़ी का एक-एक टुकड़ा पकड़ाया और कहा, इसे तोड़ कर दिखाओ.

उसके ये कहते ही बेटों ने एक झटके में ही लकड़ी के टुकड़ों को तोड़ दिया. बूढ़ा जब मुतमईन हो गया कि उसके बेटों ने लकड़ियाँ तोड़ दी है तो उसने पास रखे लकड़ियों का एक पूरा बण्डल उठाया और एक बेटे को उसे थमाते हुये कहा कि अब इसे तोड़ कर दिखाओ.

यहाँ तक की कहानी बिलकुल उसी रूप में घटित हुई जैसी उस बूढ़े ने अपने बचपन में सुन रखी थी पर इसके बाद ऐसा नहीं हुआ. उस बेटे ने एक झटके में ही उस बण्डल को तोड़ डाला.

आँखे बंद किया वो बूढ़ा उसी पुरानी कहानी के जैसा कुछ घटित होने की कल्पना कर रहा था इसलिये उसने आँखे बंद किये ही पूछा, मेरे प्यारे बच्चों! इस ‘लकड़ी के बंडल’ से तुमने क्या सीखा?

बड़ा बेटा तुरंत बोल पड़ा, पिताजी! अगर हम अलग रहे तो एक-एक कर मरेंगे पर अगर साथ रहने लगे तो एक बार में ही ख़त्म हो जायेंगे.

बूढ़े और उसके बेटों से जुड़ी ये कहानी मेरी गढ़ी हुई है यानि काल्पनिक है पर इसे गढ़ते हुये मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई क्योंकि मेरा हिन्दू समाज उस बूढ़े के बच्चों की तरह ही है.

इसे भी उस बूढ़े के बेटों की तरह यही लगता है कि हम सारे हिन्दू एक रहें तो एकसाथ नष्ट हो जायेंगे इसलिये वो अलग-अलग होकर अपने अस्तित्व को बचाने में जुटा है. हालांकि यहाँ अस्तित्व बचाने से अधिक चिंता अपने स्वार्थ सिद्ध करने की है.

कर्नाटक में लिंगायत समुदाय के लोगों के द्वारा खुद को हिन्दू धर्म से पृथक दिखाने की घटना हमारे अपने लोगों की पहली मूढ़ता नहीं है. अपने स्वार्थ में नीचे जाते हुये हमने अपने मूल से खुद को अलग करने की गलतियां पहले भी की हैं और विनाश के पथ पर बढ़ते गये हैं.

अपने अज्ञातवास में पांडव पूर्वोत्तर की यात्रा पर थे और इसी क्रम में वो मणिपुर भी गये थे. अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा मणिपुर से थी और उन दोनों के पुत्र बभ्रुवाहन मणिपुर राज्य के संस्थापक माने जाते हैं.

कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी स्यमंतक मणि की कथा भी मणिपुर से ही जुड़ी हुई है और इसी स्यमंतक मणि के नाम पर मणिपुर को उसका नाम मिला.

महाभारत काल से ही पूरा मणिपुरी समाज कृष्ण और वैष्णव भक्ति का बहुत बड़ा केंद्र रहा है और इंफाल में तो सदियों से कृष्ण-जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता रहा है.

जब यहाँ कुछ मिशनरी आये तो वो इस सुदूर क्षेत्र में हिन्दू-धर्म का ऐसा प्रभाव देखकर चकित रह गये और उन्होंने कुछ मूर्ख हिन्दू नेताओं को भारत के संविधान के द्वारा अल्पसंख्यकों को प्रदत अधिकारों का लालच दिखाया और और कुछ लोग उनके इस झांसे में आ गये.

हिन्दुओं में से कुछ ऐसे जाहिल बाहर आये जो कहने लगे कि हम हिन्दू नहीं है बल्कि हम ‘मैतेयी’ हैं और उसके बाद इस अभियान को आन्दोलन की शक्ल दे दी गई और फ़ौरन ‘मैतेयी मरुप’ नाम की संस्था बना ली गयी और लगभग आज के कर्नाटक के लिंगायत समुदाय की तर्ज पर वहां हिन्दू विरोध शुरू हो गया.

साठ के दशक में कई बार मणिपुर विधानसभा का घेराव किया गया और एक बार तो वहां ऐसे ही एक जुलूस-प्रदर्शन में भगवत गीता की प्रतियां जलाई गईं.

कहा गया कि हमको हिन्दू से अलग पृथक धर्म की मान्यता दो. गीता की प्रतियां जलाने वाले दुर्भाग्य से हिन्दू थे जो अब खुद को ‘मैतेयी धर्म’ का कह रहे थे.

तब इन मूर्खों को किसी ने ये नहीं समझाया था कि जब समूची हिन्दू जाति का अस्तित्व ही खतरे में है तो फिर जब तुम इससे निकल जाओगे तो तुम एक अकेले को विनष्ट होने में कितना वक़्त लगेगा?

इनको किसी ने ये नहीं समझाया कि जब हम लहरों के थपेड़ों से घिरे हों तो वैसे हालात में एक-दूसरे का हाथ थामकर सहारा बनना ही बचाव का एकमात्र रास्ता होता है, न कि उन लहरों से अकेले-अकेले लड़ना.

मणिपुर के हिन्दू इस बात को नहीं समझे, वो इस बात को नहीं समझ पाये कि हिन्दू भाव ख़त्म हुआ तो खुशहाली, संस्कार, समृद्धि भी उसके साथ ही खत्म हो जाती है और वही हुआ भी. मणिपुर उसके बाद से लगातार अराजकता, बदनसीबी, आर्थिक-विपन्नता, अलगाववाद और उग्रवाद से जूझ रहा है.

ऐसा ही मूढ़ता-पूर्ण विचार लेकर एक बड़े जैन मुनि पूज्य गुरूजी गोलवलकर के पास गये थे ये कहते हुये कि अगली जनगणना में हम जैन स्वयं को ‘हिन्दू’ नहीं लिखवायेंगे.

गुरूजी ने अपना सर पकड़ लिया था और उनसे कहा था “आप आत्मघाती सपने देख रहे हैं. अलगाव का अर्थ है देश का विभाजन और विभाजन का परिणाम होगा आत्मघात! सर्वनाश!!”

दुर्भाग्य से जैन समाज ने पूज्य गुरूजी की बातों को महत्व नहीं दिया और पिछली लोकसभा चुनाव के ठीक पहले स्वयं को हिन्दू धर्म की विशाल परिधि से अलग कर लिया पर ऐसे करते हुये वो भूल गये कि वो केवल स्वयं को ही पृथक नहीं कर रहे बल्कि अपने स्वार्थ में वो भगवान महावीर, ऋषभदेव और न जाने कितने अरिहंतों को भी हिन्दू समाज के लिये पराया कर रहे हैं.

जैन समाज की आबादी ‘शून्य दशमलव कुछ’ में है, हिंदुत्व की विशाल परिधि से निकलने का अपराध जब उन्हें समझ आयेगा तबतक शायद बहुत देर हो चुकी होगी.

दुःख इनसे भी नहीं है क्योंकि हम बदनसीब किस-किस के लिये और किस-किस बात पर रोयें. ऐसी मूर्खता करने वालों की फ़ेहरिस्त में आर्य समाज और रामकृष्ण मिशन तक शामिल हैं.

आज कर्नाटक का लिंगायत समुदाय भी मूर्खतापूर्ण कृत्य करने वालों में अपना नाम लिखवा चुका है. हमारा लालच और स्वार्थ अभी हमको और कितना अपमानित और अभिशप्त करेगा और ये हिन्दू-दुर्भाग्य कहाँ तक जायेगा, कह नहीं सकते, पर राष्ट्रवाद की बात करने वाले राजनीतिक दल की सुस्त-पहल हैरान करती है.

आज भाजपा और विहिप के कई केन्द्रीय और बड़े पदाधिकारी जैन समाज से हैं, भाजपा के नेता जैन मुनियों के कृपापात्र भी हैं पर पिछले चार सालों में जैन समाज को वापस हिन्दू समाज के वर्तुल में लाने का कोई प्रयास नहीं हुआ.

कर्नाटक के लिंगायत मसले पर भी इनकी अगर ऐसी ही सुस्त-चाल रही तो फिर भारत के विभाजन की अंतहीन फ़ेहरिस्त का सिलसिला रुकने वाला नहीं है.

शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर छिपा लेने से अगर तूफ़ान थम जाये तो और बात है.

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