गौरक्षा – 1 : इतिहास

गौरक्षा इस देश के लिए किस क़दर महत्वपूर्ण है यह समझाने का प्रयास करता हूँ खेती से लेकर औषधि तक हर क्षेत्र में देशी गाय की उपयोगिता उस स्तर पर है जहाँ आज भी आर्टिफ़िशल चीज़ें (खाद रसायन दवाइयाँ इत्यादि) नहीं पहुँच सकीं हैं.

लेकिन अफ़सोस कि मैकाले शिक्षत मानसिक ग़ुलामों का यह देश घर के अमृत को छोड़कर बाहर के विदेशी ज़हर को अपनाना गर्व समझता है उसका परिणाम अनेक तरह की बीमारियों को जन्म देना और ग्राम्य अर्थव्यवस्था का नाश होना है जिसका अधिकार गाय हुआ करती थी.

आज भी हम एक घर दो गाय अपना लें तो ग्राम्य अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाया जा सकता है उसके कुछ उदाहरण देने की कोशिश करता हूँ.

ईसाई (अंग्रेज़) जब इस देश में आए तो उनका उद्देश्य सिर्फ़ ग़ुलाम बनाना व्यापार करना और शासन करना नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत को ईसाई बनाना था उसके हिसाब से उन्होंने षड्यंत्र किए और आज लगभग गोवंश समाप्ति की ओर है.

जब भी मैं गोवंश की बात करता हूँ तो कभी भी फ़िजीयन या जर्सी की बात नहीं करता हूँ मेरे केंद्र में केवल देशी गाय है. अंगरेजो ने षड्यंत्र पूर्वक गाय को काटना और और अपने सिपाहियों को खिलाना शुरू किया.

1813 में हाउस ऑफ़ कामंज़ (ब्रिटिश संसद) में एक बैठक हुई जिसका मूल उद्देश्य था “how to cristanised India” माने भारत को ईसाई कैसे बनाया जाए इसमें उन्होंने यह तय किया जब तक भारत आर्थिक रूप से दरिद्र नहीं होगा तब तक यह सम्भव नही है उन्हें यह पता था की भारतीय कृषि की रीढ़ है गाय और गोवंश जो कि हर भारतीय को आत्मा में बसती है तो उनका नाश किया जाए.

इसलिए सुनियोजित तरीक़े से गोवंश का क़त्ल शुरू हुआ लेकिन उनको सफलता नहीं मिली जिसकी वजह से योजना में बदलाव किया गया कि गाय से अधिक महत्वपूर्ण है नंदी (साँड़) अगर उसको मार दिया जाए तो गाय का उत्पादन रुकेगा और ट्रान्स्पोर्ट खेती हर चीज़ रुकेगी इस योजना के तहत भारत में गोवंश पर रोक लगाने का काम शुरू हुआ.

गोवंश को मारने के लिए पूरे भारत में सुनियोजित तरीक़े से 350-400 से अधिक क़त्लखाने खोले गए उस समय तक लोग जागरूक नहीं थे और यह चलता रहा. अगर आपने 1857 की क्रांति पढ़ी हो तो आपको ज्ञात होगा कि मंगल पांडे जैसे जाँबाज़ गाय की चरबी से बने कारतूस इस्तेमाल न करने के लिए अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी, जो 1857 की क्रांति का आधार बनी उसके बाद देश में गौरक्षा की लहर चल पड़ी.

1873 आते आते भारत में लगभग हर गाँव में एक गौरक्षा समिति का निर्माण हो चुका था जिसमें हिंदू मुसलमान सभी शामिल थे और गौवंश को बचाने के लिए जान तक देने को आमादा थे. यह ख़बर जब ब्रिटिश को पता चली तो उन्होंने पत्र लिखकर अपनी संसद को आगाह किया.

एक ब्रिटिश अधिकारी लेंज़ डाउन ने पत्र लिखकर चिंता ज़ाहिर की जिसके बाद विक्टोरिया ने जवाब देते हुए यह कहा कि गाय का क़त्ल किसी भी तरह रुकना नहीं चाहिए, यह चालू रहना चाहिए.

लेंज़ डाउन ने योजना बनाकर क़त्लखानों में सिर्फ़ मुसलमानों की नियुक्ति की शुरुआत की जिसके परिणाम स्वरूप हिंदू मुस्लिम विरोध और दंगे चालू हो गए इसके लिए मुसलामन युवकों को धन का लोभ या डरा धमकाकर क़त्लखाने में काम करवाया जाने लगा.

मुसलमानों में अनेक बादशाह और जातीय गौरक्ष के लिए किस क़दर प्रतिबद्ध थी इसका उदाहरण आपको इतिहास से मिल सकता है क्यूँकि वह जानते थे कि भारत पर राज करना भारत के हिसाब से ही सम्भव है आज भी राजस्थान में मेवी (मेवात के रहने वाले मुस्लिम ) लोग गौ रक्षा दूध घी बेचकर अपनी आजीविका चला रहे हैं राजस्थान में ही बीकानेर में रहने वाले राट मुस्लिम (राट एक जाति है ) गाय पर ही निर्भर हैं आजीविका के लिए!

लेकिन अफ़सोस की आज वही मुसलमान गाय खाने को मरे जा रहे हैं जो कभी इस षड्यंत्र को समझ नहीं पाए कम से कम उन्हें अपने मुग़ल आकाओं को ही पढ़ लेना चाहिए कि गाय भारत की आत्मा है.

1893 के इस षड्यंत्र के बाद मुस्लिम गौरक्षा से कट गए और हत्यारों में शामिल हो गए पूरी तरह और आज तक वह गाय काटने को ही मुसलमान होना समझते हैं.

1940 में लाहौर में (तब लाहौर भारत में था ) के यंत्रिक क़त्लखाना खुला जिसके विरोध में नेहरु ने आंदोलन किया और बंद भी करवाया उस समय उन्होंने कहा कि जब हम किसी पद पर होंगे तो गौरक्षा के लिए क़ानून बनाएँगे लेकिन अफ़सोस कि उसी नेहरु ने 1955 में एक सांसद द्वारा लाए गए गौरक्षा विधेयक को तुरंत निरस्त करने का आदेश दिया. वामपंथी प्रभाव की कांग्रेस की यह नीति बहुत पुरानी है कि सत्ता में आने से पहले और बाद में वादापरस्ती करना!

ख़ैर मूल पर रहते हैं और आपको बता दूँ कि एक गाय/बैल साल भर में 25000 की खाद और गाय है तो 50000 का दूध पैदा करती है. कम से कम यह आँकड़ा कम से कम है (4 litre) उसके अलावा गाय / बैल के गोबर से किसी भी तरह के असाध्य चर्म रोग ख़त्म होते हैं.

गौ मूत्र से 108 तरह की औषधियाँ बनाई जाती है इसके अलावा लाखों फ़ायदे हैं लेकिन अफ़सोस यह है कि आज के हिंदुओं को गाय काटने के पक्ष में देने वाले तर्क को पढ़ सुन कर आत्मा पर कटार चलने की पीड़ा का अनुभव करता हूँ.

गाय / बैल की उपयोगिता पर आगे के भाग में विस्तृत लिखूँगा. एक एक पक्ष के लिए राजीव भाई दीक्षित जी को आभार प्रकट करते हुए इस लेख को ख़त्म करता हूँ बिना उनके यह सब अमूल्य जानकारी मिलना शायद सम्भव न होता.

क्रमश:

– शैलेंद्र सिंह

गौरक्षा – 2 : जैविक खाद बनाने की विधि

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