योगी सरकार का पहला साल : पास या फेल?

आज लखनऊ में योगी सरकार ने अपना एक वर्ष का कार्यकाल पूर्ण कर लिया.

ज्यादा साक्ष्यों की आवश्यकता नहीं. केवल 2-3 तथ्य पर्याप्त हैं यह तय करने के लिए कि योगी सरकार का यह कार्यकाल कैसा रहा.

कानून व्यवस्था के मोर्चे पर अपराधियों में मचा हाहाकार बहुत कुछ स्वयं ही कह देता है.

अपने कार्यकाल के पहले वर्ष अप्रैल 2017 से जुलाई 2017 के मध्य में ही योगी सरकार ने किसानों का 38 लाख टन गेंहूं खरीदकर पैसा सीधे उनके खातों में पहुंचा दिया.

लेकिन कमाल देखिए कि 2016 में किसानों का केवल 7.5 लाख टन समेत अपने 5 वर्ष के पूरे कार्यकाल में भी किसानों का 38 लाख टन गेंहूं नहीं खरीद सकी अखिलेश सरकार के मुखिया अखिलेश यादव का आरोप है कि योगी सरकार किसान विरोधी है, उसने किसानों के लिए कोई काम नहीं किया.

इसी प्रकार वर्ष 2017 में योगी सरकार ने सीधे किसानों से 42.54 लाख टन धान खरीदा और पैसा सीधे उनके खाते में पहुंचाया.

योगी सरकार द्वारा की गयी धान की यह खरीद, अखिलेश सरकार द्वारा अपने 5 वर्ष के पूरे कार्यकाल में किसानों से खरीदे गए कुल धान से भी कई लाख टन ज्यादा थी.

लेकिन कमाल देखिए कि अपने 5 वर्ष के पूरे कार्यकाल में भी जो अखिलेश सरकार किसानों का 42.54 लाख टन धान नहीं खरीद सकी थी उस अखिलेश सरकार के मुखिया अखिलेश यादव का आरोप है कि योगी सरकार किसान विरोधी है, उसने किसानों के लिए कोई काम नहीं किया.

इसी तरह माया और अखिलेश सरकारों के कार्यकाल से बकाया चले रहे गन्ना किसानों के लगभग 27 हज़ार करोड़ रूपयों का भुगतान सीधे उनके खाते में योगी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में ही करवा दिया.

लेकिन कमाल देखिए कि 10 वर्षों तक प्रदेश में राज करती रहीं बसपा की माया व सपा की अखिलेश सरकार के मुखिया मायावती और अखिलेश यादव का आरोप है कि योगी सरकार किसान विरोधी है. उसने किसानों के लिए कोई काम नहीं किया.

योगी सरकार ने अपने कार्यकाल के प्रथम वर्ष में किसानों का लगभग 26 हज़ार करोड़ कर्ज़ माफ किया जबकि अखिलेश सरकार ने अपने 5 वर्ष के पूरे कार्यकाल में किसानों का केवल 1475 करोड़ रूपए कर्ज़ माफ किया था.

लेकिन कमाल देखिए कि उसी अखिलेश सरकार के मुखिया अखिलेश यादव का आरोप है कि योगी सरकार किसान विरोधी है. उसने किसानों के लिए कोई काम नहीं किया.

यहां उल्लेखनीय यह भी है कि बसपा की माया सरकार में किसानों से गेंहू खरीद का आंकड़ा अखिलेश सरकार से भी बदतर रहा था. और उन आंकड़ों को भी पाने के लिए दोनों सरकारें आढ़तियों की मदद भी लेती थीं.

अखिलेश और मायावती तो खैर विरोधी दलों के नेता हैं इसलिए उन्हें यही भाषा बोलनी है लेकिन आश्चर्य तब होता है जब राजधानी लखनऊ के 5 स्टार होटलों में आधा दर्जन न्यूज़ चैनलों ने योगी सरकार की समीक्षा के बड़े बड़े कार्यक्रम आयोजित किये और उन कार्यक्रमों में जब अखिलेश यादव और बसपा के नेताओं ने यही आरोप दोहराया कि योगी सरकार किसान विरोधी है, उसने किसानों के लिए कोई काम नहीं किया. तो अखिलेश समेत सभी विपक्षी नेताओं से किसी भी न्यूज़ चैनल के बड़े बड़े सम्पादकों/ पत्रकारों ने यह तुलनात्मक प्रश्न कर के नहीं पूछा कि “आखिर किसी सरकार के किसान विरोधी होने, किसानों के लिए कोई काम नहीं करने के मापदण्ड क्या हैं?”

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