आशु उवाच : वासुदेव कृष्ण – 5

Ashutosh Rana

मेरा अनुभव है कृष्ण, कि दुर्भाग्य व्यक्ति को अपने पास बुलाता है, किंतु सौभाग्य व्यक्ति तक स्वयं ही पहुँच जाता है.

कंस मधुर हास्य से हँसते हुए बोला- देखो ना, मैं कंस भयंकर आसुरी निद्रा में मग्न था, मेरे भीषण कर्मों के बाद भी सौभाग्यरूपी सच्चिदानंद श्रीकृष्ण स्वयं ही चलकर मेरे पास मथुरा आ गए थे, और मेरे ना चाहते हुए भी कृष्ण ने मुझे मेरे सारे क्लेशों से मुक्त कर दिया था.

कृष्ण के जन्म को संसार कंस का दुर्भाग्य मानता है, किंतु कंस, कृष्ण के हाथों मारे जाने को स्वयं का सौभाग्य मानता है. क्योंकि जिसे कृष्ण मार दे वह मरता नहीं है, तरता है. तुमसे मिलने से पहले मैं जीवित होते हुए भी मरा हुआ था, किंतु तुमसे मिल जाने के बाद मैं मरके भी जी उठा.

कृष्ण को कंस से हो रहा यह वार्तालाप अत्यंत रोचक लग रहा था. हम सदैव अपने चरित्र को अपने मित्रों की दृष्टि से देखते हैं, इसलिए उसका विकास अवरूद्ध हो जाता है. किंतु व्यक्तित्व के विकास के लिए शत्रु दृष्टि का सत्य जानना भी आवश्यक होता है.

श्रीकृष्ण सोचने लगे- कंस, कालिया, कालयवन, जरासंध, शिशुपाल, नरकासुर, दुर्योधन, आदि शत्रु भाव से भरी हुई ये समस्त चेतनाएँ यदि मेरे सामने चुनौती के रूप में आकार ना खड़ी होतीं तो क्या इस नश्वर शरीर को धारण करने के बाद भी कृष्ण ईश्वरत्व को उपलब्ध हो सकता था?

श्रीकृष्ण को लगा के जैसे उनका अहंकार उनके हृदय में गुंजित हुआ हो, किंतु अगले ही पल उस दिव्य चेतना ने जो प्रतिपल उनकी सहायक रही है क्षण भर में उपलब्धियों से उत्पन्न होने वाले उस विकार को समाप्त कर दिया- हाँ, जो नश्वर शरीर को साधकर उसमें प्रकाशित होने वाली अनश्वर चेतना को समझ ले वही तो ईश्वर होता है कृष्ण.

ये सत्य तुम्हारे मुख से तो उद्भाषित हुआ था.. कि ना कोई मुझे मार सकता है, ना जला सकता है.. सत्य ही तो है, ऊर्जा का ना क्षरण सम्भव है, ना मरण.. वह तो रूपांतरित होती है कभी राम के रूप में तो कभी कृष्ण के रूप में. तभी तो तुमने इस सूत्र को मोहग्रस्त अर्जुन से कहा था जिसने अपने ताऊ, चाचा, भाइयों, पुत्रों, मित्रों के शरीर को ही सत्य मान लिया था, कि शरीर तो आत्मा के वस्त्र की भाँति होता है.

निराकार जब साकार होता है तो वह नश्वर कहलाता है, और साकार जब निराकार हो जाता है तो वह ईश्वर हो जाता है. अवतार क्या है कृष्ण? मनुष्य के चित्त में उस अनश्वर ऊर्जा के ज्ञान का अवतरण ही तो अवतार है.

सत्य ही तो कहा था तुमने अर्जुन से.. कि ना कोई हमारा मित्र है और ना ही शत्रु, जो हमें संगठित करते हैं वे हमारे मित्र होते हैं व जो हमें विखंडित करने का प्रयास करते हैं वे शत्रु, जब ऊर्जा खंडित ही नहीं होती तब वह अखंड ही हुई ना? तो जिसका विघटन सम्भव नहीं है उसका संघटन कैसे सम्भव है? हम जब अखंड को खंडित दृष्टि से देखते हैं तब ही यह पाखंड उत्पन्न होता है, मित्र, शत्रु, सम्बंधी, मेरा, तुम्हारा वाला. तो दृष्टि के दोष को सृष्टि का दोष कैसे माना जा सकता है?

इसी जागरण को उपलब्ध होने के कारण ही तो संसार तुम्हें गुड़ाकेश अर्थात निद्रा को जीतने वाला भी कहने लगा, हमारा अज्ञान ही तो निद्रा है.

कंस ने आश्चर्य में डालते हुए श्रीकृष्ण से कहा- तुम गुड़ाकेश हो कृष्ण जिसने मात्र स्वयं के जागरण को ही नहीं साधा, अपितु स्वयं के सम्पर्क में आने वाली सृष्टि की प्रत्येक चेतना को जगाए रखने का उत्कृष्ट कर्म किया है.

कृष्ण हँसते हुए बोले- आप क्या मेरे हृदय में बैठकर मुझे सुन रहे हैं मामा?

कंस भी हँसते हुए बोला- कंस तो सदा ही तुम्हारे हृदय में रहा है, जहाँ कृष्ण है वहाँ कंस है और जहाँ कंस है वहाँ कृष्ण है. कंस की उपस्थिति में संसार कृष्ण का स्मरण करता है, और कृष्ण की उपस्थिति में संसार कंस को विस्मृत कर जाता है, यही संसार की सबसे बड़ी चूक है, क्योंकि कंस की विस्मृति, कंस के ना होने का प्रमाण नहीं है. इसलिए कृष्ण को उपलब्ध हुए लोग भी यदाकदा कंसोचित कार्य कर बैठते हैं.

कृष्ण को साधने वाली चेतनाएँ कंस को अपने स्मरण में अवश्य ही रखती हैं जिससे कंस की पहचान बनी रहे, अन्यथा कंस चुपचाप उनके कृष्णचित्त को कंसचित्त में रूपांतरित कर देगा.

कृष्ण को पहचानो या ना पहचानो किंतु कंस को पहचानना परम आवश्यक है, क्योंकि कृष्ण यदि नटराज हैं तो कंस भी बहुरूपिया है. और बहुरूपिये, नटराज से अधिक घातक होते हैं वे पल भर में कृष्ण के कल्याणकारी रूप को धारण कर लेते हैं.

ये दोनों ही कलायें हैं, किंतु एक स्वाँग है तो दूसरी साधना. बहुरूपिया समय को प्रधानता देता है किंतु नटराज होने के लिए संयम आवश्यक होता है. नटराज, बहुरूपिया हो सकता है माधव, किंतु किसी बहुरूपिया के लिए नटराज हो पाना असम्भव है. कृष्ण होने और कृष्ण बनने में अंतर है वासुदेव, कोई भी बहुरूपिया कृष्ण बन तो सकता है किंतु कृष्ण हो नहीं सकता.

ये कहते हुए कंस ठहाका मारते हुए हँसने लगा, श्रीकृष्ण भी उसे हँसता देख मधुर हास्य से भर गए. श्रीकृष्ण के रंग में पूरी तरह रंगा हुआ कंस बोलने लगा- तभी तो तुम्हे उपलब्ध हुए दिव्य संत संसार को ये सीख देते हैं कि पुण्य का स्मरण रखो या ना रखो, किंतु पाप को सदा ही अपने स्मरण में रखो जिससे उसकी पुनरावृति ना हो.

कंस की उपस्थिति में मनुष्य सदैव कृष्ण का स्मरण करता है और जिस मनुष्य के स्मरण में श्रीकृष्ण सदैव विद्यमान हों उसका ना क्षरण सम्भव है और ना ही मरण सम्भव है. किंतु विसंगती देखो कान्हा, ये संसार कंस को भूल जाने के प्रयास में कृष्ण को ही भुला बैठा!

कृष्ण को भूल जाने के कारण ही आज इस गौरवशाली वंश का अशोभनिय अंत हुआ है. निकृष्ट का ताप ही मनुष्य को उत्कृष्ट की चाह से भरता है वासुदेव, कंस वह उत्प्रेरक है जो मनुष्य को कृष्ण तक पहुँचने के लिए बाध्य करता है.

हृदय (उर) में चलने वाले कृष्ण और कंस के बीच का ये द्वन्द ही तो मथुरा है. मथ-उरा, जो मनुष्य अपने ‘उर’ अर्थात हृदय को मथ देता है वह स्वयं ही मथुरा हो जाता है. अज्ञानवश लोग मथुरा को एक भूखंड मान लेते हैं, किंतु जो ज्ञान को उपलब्ध हो जाते हैं उनके लिए मथुरा एक भावखंड होता है.

श्रीकृष्ण आश्चर्य से भरे हुए कंस के इस अनोखे विश्लेषण पर विचार करने लगे, कितना सत्य कह रहा है कंस- हमारी सकारात्मक वृत्ति और नकारात्मक वृत्ति का घोर घर्षण ही तो आकर्षण को प्रकट करता है, कृष्ण का अर्थ ही आकर्षित करने वाला अर्थात आकर्षक होता है.

कंस बहुत चंचलता से श्रीकृष्ण को देखते हुए बोला- दूध में माखन होता है, इसी माखन के कारण दूध को अमृत कहा जाता है. किंतु दूध में रहने के बाद भी माखन हमें नंगी आँखों से दिखाई नहीं देता, कितना ही शुद्ध दूध क्यों ना हो.. माखन को प्राप्त करने के लिए दूध में विकार का आना आवश्यक होता है.

विकारी, बिगड़े हुए दूध को मथने पर ही माखन की प्राप्ति होती है. ऐसे ही हमारे आत्मा रूपी दूध में परमात्मा रूपी माखन अदृश्य है, हमारे चित्त में व्याप्त विकार हमारी आत्मा को बिगाड़ देते हैं, यदि हम अपने विकारी चित्त को मनोयोग से मथ डालें तो हमारी आत्मा का अव्यक्त परमात्मा हमारे उर में व्यक्त हो जाता है.

किंतु विचित्रता देखो गोविंद, ये संसार सदा ही विकारों का विरोधी रहा है, जबकि विकार को स्वीकार करके ही हम निराकार को साकार कर सकते हैं. यदि हम सावधान रहें तो विकार बाधक नहीं साधक हो जाता है.

इस सृष्टि की प्रत्येक मानव देह मथुरा है, और विकार रूपी कंस, कृष्ण रूपी माखन तक पहुँचाने का साधन. तुम माखन चोर नहीं अपितु स्वयं माखन हो कान्हा, तुमने माखन चोरी के माध्यम से प्रतिपल संसार को यह बताने के प्रयास किया कि मनुष्य का लक्ष्य उसकी आत्मा नहीं परमात्मा होना चाहिए.

जैसे गोप गोपिकाओं की आँख बचाकर तुम चुपचाप सफलतापूर्वक माखन तक पहुँच जाते थे वैसे ही संसार की नज़र बचाकर ही मनुष्य परमात्मा तक पहुँच सकता है. लेकिन तुम्हारे इस उत्कृष्ट कर्म को भी इन लोकतांत्रिक माथुरों ने चोरी जैसे अपकृष्ट कर्म के रूप में प्रचारित करते हुए तुम्हें माखनचोर के नाम से प्रसिद्ध कर दिया.

तो सुनो माखनचोर…

क्रमशः

– आशुतोष राणा

आशु उवाच : वासुदेव कृष्ण – 4

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