कभी दीप जले कहीं दिल

तुम कहते उम्र की चक्की में सारी इच्छाएं पिस जाती है
सांस धौकनी सी चलती है तुम्हारी
ऊपर सुर का गाना नही गा सकती अब
आँखें स्याही से घिरी एक निचाट मनहूस तालाब हो गई हैं
कमर नही रही इतनी पतली की फ़िल्मी गानों पर मटक लो

आप रोज सुनते है ये सब
इससे भी ज्यादा और

पर मन का क्या
वो तो किशोर पतंग सा भिड़ना और कटना चाहता है
गिलहरी की आँखों में मेरे हिस्से का ख्वाब है
उसे मुंडेर पर भागते देखूं तो मन मचल जाता है
नट की रस्सी सा सातवी मंजिल का मुंडेर
मैं खाली पैर चलूँ
तुम हाथ थामे रहो
अंत तक चलना है मुझे

हथेलियाँ घिस कर सपाट हो गई हैं
धीरे से नाम लिखूं चूमूं छुपा लूँ
हाथ न धोने का सोचूं और मुस्कराउं

एक दिन भाग जाऊं
पीछे घर की फ़िक्र छोड़
नहीं जानना कि ताले खुले तो नहीं रह गए
एकदम भागती सड़क की हो जाऊं
गुब्बारे वाले को देखूं तो उचक कर गिन लूँ सारे रंग
बावरी सी लोकल ट्रेन की खिड़की से सट कर भागते स्टेशन को देखूं
बिना डर काट दूँ घर से आता हुआ फोन

मैं अपनी उड़ान पर हूँ
जरा देर लगेगी
आ जाउंगी

देर शाम परिंदों को लौटता देखूं
समन्दर की लहरों को दूर क्षितिज तक जाता

रेत का सन्नाटा असल है
बाकी सब आना जाना

पर्स से निकाल पहन लूँ चूड़ी
चिपका लूँ रूटीन लाल बिंदी
साडी की तहँ सम्भालू
बेजान रिक्शे को आवाज दूँ

घर जाना है
जैसे कोई पाजेब टूट गई
एक एक घुंघुरू
मन्दिर की एक एक घण्टी में लटक गया हो
इतने टुकड़े

ये सोचना एक खौफ है
जीना सजा
अस्सल तो यही न
उम्र की बीत गई चक्की का
चोकर भर बुहारन

इतनी देर से बकवास लिख रही थी
शर्ट में प्रेस ही कर लेती

नंगी पीठ पर आग सी चटक

मन गिलहरी परिंदा पतंग और मुंडेर भर…..

– शैलजा पाठक 

उपेक्षा जान भी ले सकती है

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