लोकसभा चुनाव 2019 : फेसबुक से ज़्यादा प्रभावी होगा व्हाट्स एप

क्या वाकई व्हाट्स एप, मैसेंजर या फेसबुक के ग्रुप्स उतने कोफ़्त भरे होते है जैसे कि आमतौर पर फेसबुक पर लोग बाग़ अक्सर शिकायतें करते रहते हैं?

या यह सिर्फ अभिजात्य वर्ग सा नकचढ़ापन है जो अक्सर मध्यम वर्ग की हरकतों को देख कर नाक भौ सिकोड़ता है?

जबकि सोशल मीडिया का सामाजिक करण किया जाए तो ट्विटर किसी शहर की अभिजात्य कॉलोनी सा, फेसबुक या उसके ग्रुप्स किसी मध्यम शहर के मुहल्ले सा और मैसेंजर या व्हाट्स एप किसी चाल टाइप सा बर्ताव करते है.

ट्विटर पर आमतौर पर सेलिब्रेटि की आवाज़ सुनी जाती है, वहां फेसबुक के परम योद्धा सिर्फ इसलिए जाते हैं ताकि किसी सेलिब्रेटि के ट्वीट का जबर रिप्लाय का स्क्रीन शॉट दिखा कर अपनी फेसबुक पोस्ट पर वाह वाही लूट सकें.

लेकिन यह कवायद सिर्फ खुद के प्रभाव के लिए होती है. उन्हें ट्विटर पर भाव नहीं मिलता इसलिए उन्हें अपने ट्विटर पर होने की अपील बार बार दोहराना पड़ती है.

व्हाटस एप कुछ कुछ महानगरो के चोर बाज़ार की तरह होता है. जहाँ आपको आपकी ही चोरी की हुई पोस्ट या जोक्स इस ताकीद के संग मिलती है कि यह मार्केट में नया है फ़ौरन फॉरवर्ड करो. या वहाँ कुछ ऐसा छांटा हुआ रॉ मैटेरियल मिल सकता है जो फेसबुक पर आपकी नजरों से चूक गया हो.

मुझे सोशल मीडिया के किसी भी प्रारूप से कोई परहेज़ या शिकायत नहीं हैं. क्योकि इन्हें मैं अपनी पसंद या शर्तो पर इस्तेमाल करता हूँ.

मसलन व्हाट्स एप पर अधिकतर वास्तविक जीवन से जुड़े लोगों को ही जोड़ा है कुछ अपवाद छोड़कर. और वास्तविक जीवन के लोगों को फेसबुक से नहीं ऐड किया.

मैं फेसबुक की हर पोस्ट नहीं पढ़ सकता लेकिन बहुत कुछ अच्छी पोस्ट मुझे व्हाट्सएप पर सजग मित्रों के माध्यम से मिल जाती हैं.

मैं फेसबुक की अच्छी, चेतना फैलाने वाली पोस्ट को अपने वास्तविक जीवन के जुड़े लोगों तक व्हाट्स एप के माध्यम से ही पहुंचाता हूँ, कुछ काट छांट मात्र अशुद्धियों को दूर कर के.

जरुरी नहीं है कि व्हाट्सएप पर सिर्फ उटपटांग मैसेज ही मिले, यह आपके व्यक्तित्व पर है कि लोग आपको कैसे मैसेज भेजेन. आप अपनी पसंद उन्हें बताते रहिये, वह उसमे बदलाव लाते जायेगे. यूँ भी क्या फेसबुक के सभी मैसेज बेहद सारगर्भित होते हैं?

व्हाट्स एप की सामर्थ्य फेसबुक से कहीं ज्यादा है और वह लोग उसे आसानी से इस्तेमाल करते हैं जो फेसबुक पर शर्माते हैं. मैंने ऐसे कई लोगों में बदलाव होते देखा है और कई में बदलाव भी लाया है, जो पहले भारत की बदलती राजनैतिक, सामाजिक या धार्मिक परिस्थितियों पर उदासीन रहते थे, लेकिन अब खुल कर अपना मत रखने लगे और उसे समझने लगे हैं.

अगर वाकई बदलाव लाना चाहते हों तो लड़ाई को हर स्तर पर छोटे छोटे समूह बना कर लड़ना होगी, उनसे बचने के बजाये, चिढने के बजाये उन्हें अपना मत बनाने में मदद कीजिये. ताकि जब वह व्हाट्स एप से फेसबुक पर आये तो अच्छा या बुरा लिखने पढने में फर्क समझने लगे.

एक आम इंसान फेसबुक की तुलना में व्हाट्स एप के संदेशों को जल्दी ग्रहण करता है. और इस बात को बखूबी समझा है कांग्रेस साइबर सेल ने.

मुझे व्हाट्स एप पर हर तीसरा चौथा मैसेज मोदी सरकार के खिलाफ मिलता है जिसे लोग पढ़ते और आगे फॉरवर्ड करते हैं. फेसबुक की व्यापकता के परे यह निजी संपर्क सा होता है.

और अगर 2019 के चुनाव में गंभीरता से प्रयास करना है तो व्हाट्स एप या फेसबुक ग्रुप्स के प्रति पूर्वाग्रह निकाल दीजिये, भले ज्यादा एक्टिव ना रहे, फीडबैक ही लेते रहे. इससे भी रुझान पता चलता रहता है.

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