फ़िदायीन जीन और सेल्फिश जीन : जानिए हम कौन हैं

भगत सिंह क्यों मर गए थे ब्रॉउन दिखने वाले अपने देशवासियों के लिए? वे तो आर्मी में भी नहीं थे.

क्यों लोग आत्मघाती हो जाते हैं अपने समूह की सुरक्षा अथवा विस्तार के लिए? फिदायीन हों या देशभक्त.

क्या मनुष्य का यह व्यवहार मात्र राजनीतिक, धार्मिक, क्षेत्रीय समूहों की वजह से है?

समझने के लिए हमें समझना होगा हम हैं कौन? और हम हैं क्यों?

पृथ्वी की उत्पत्ति 14 अरब वर्षों पूर्व हुई और लगभग 9 अरब बरस यूँ ही निकल गए. एक वृहद चट्टान के.

किन्तु पृथ्वी पर मौजूद समुद्र की गहराइयों में बेहद दबाव, केमिकल जनित गर्मी, चट्टानों में मौजूद मिनरल्स ने कुछ अजीब एवं नए कुछ जटिल रसायनों जैसे एमिनो एसिड्स का निर्माण प्रारम्भ किया.

एमिनो एसिड जो कि किसी भी जीव के प्रोटीन, आवरण, डीएनए को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

और यूँ यह प्रक्रिया, होते-होते अगले कुछ करोड़ बरसों में कुछ बेहद दुर्लभ संयोगों के बाद एक बेहद अद्भुत रसायन का निर्माण हो पाया, जिसे डीएनए कहते हैं.

इस रसायन में, प्रकृति में मौजूद अन्य रसायनों से एक अलग, एक अज़ीब क्षमता थी. वह थी अपनी हूबहू प्रतिलिपि का निर्माण करते चले जाना.

इस जटिल रसायन की इस अंतर्निहित क्षमता एवं प्रवृत्ति ने इसकी अनेकों कॉपी का निर्माण करना शुरू किया था.

हूबहू कॉपी बना सकने के अतिरिक्त इनमें क्षमता एवं प्रवृत्ति थी स्वयं की सुरक्षा की भी. जिसके लिए इस रसायन के समूह ने अपने इर्द गिर्द एक सुरक्षा कवच का निर्माण भी कर लिया था.

और यूँ विश्व की पहली जीवित कोशिका बनी थी. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि पहली कोशिका निर्माण में करोड़ों बरसों का समय काल लगा है. किंतु हम यह तर्क देते हुए कि ‘आज क्यों जीवित कोशिका नहीं बना ली जाती’, में समयकाल के कारक को भूल जाते हैं.

इस एक कोशिका को भी न तो पता था, न ही कोई योजना थी कि, अगले 4 अरब बरसों में क्या क्या और नहीं रचा जाना था. जिनमें से कुछ अद्भुत प्राणी आज 4 अरब बरसों बाद उस पैतृक कोशिका के विषय में लिख रहे हैं और पढ़ रहे हैं. लेकिन आज भी अपनी संख्या में इज़ाफ़ा करने, अपने डीएनए की सुरक्षा करने की वही 4 अरब बरस पूर्व की अभिलाषा और प्रवृत्ति रखे हुए.

उस वक्त पृथ्वी पर ऑक्सीजन नहीं थी. एवं समुद्र की गहराइयों में बिना सूरज की रोशनी के वे पैतृक कोशिकाएं बिना ऑक्सीजन के अनेरोबिक़ मेटाबोलिज़्म से गतिशील, जीवित एवं विभाजित हो स्वयं की कॉपी बना पाती थीं.

लेकिन डीएनए की हूबहू कॉपी के बीच कभी कभार अचानक उनके एमिनो एसिड सीक्वेंस में मामूली परिवर्तन भी हो जाते थे.

अधिकतर ये परिवर्तन उन जीवित कोशिकाओं के लिए गलत साबित होते थे जिनसे उनकी ज़ल्द मृत्यु होती थी.

किन्तु बरसों बरस निकलते जाने पर कुछ अचानक हुए परिवर्तन इन कोशिकाओं के लिए जीवित रहने, संख्या बढ़ा सकने के नए गुण धर्म लेकर आते थे और ये नए गुण उन जैसी ही नए गुणधर्म वाली कोशिकाओं की संख्या में तेज इज़ाफ़ा करते थे.

इन परिवर्तनों को मनुष्य नाम के डीएनए के एक गुच्छे ने म्युटेशन का नाम दिया था. और जीव के जीवन एवं प्रजनन में मदद करने वाले म्युटेशन डीएनए कोडिंग के अगली पीढ़ी में स्थानांतरित होते रहने से उस जीवित प्रजाति के गुणधर्म बने.

इसे ही डार्विन ने नेचुरल सिलेक्शन कहा. डार्विन की पत्नी बेहद समर्पित क्रिस्टियन थीं, एवं ‘ईश्वर ने सब निर्मित किया’ को मानती थीं.

मैं कल्पना करता हूँ जब वे डार्विन की चिड़ियों की चोंच और किताबों से भरी टेबल पर कॉफी मग पटक कहती होंगी, ‘आप पगला गए हो. जब सब गॉड ने बनाया बिल्कुल वैसे ही जैसे बाइबिल में कहा गया, तो क्यों झूठे सबूत इकट्ठे कर रहे हो.’

कहते हैं, डार्विन ने अपना कार्य 20 बरसों तक धार्मिक विरोध के डर से ही प्रकाशित नहीं किया था.

और यूँ उन कोशिकाओं का निर्माण हुआ जो समुद्र की सतह एवं चट्टानों पर भी जीवित रह सकती थीं. क्योंकि उनमें सूरज की रोशनी से ऊर्जा ले फोटोसिंथेसिस करने की क्षमता विकसित हो चुकी थी.

और इस तरह पृथ्वी न सिर्फ नए जीवन का निर्माण कर रही थी वरन, नए छोटे छोटे, अदृश्य जीवन पृथ्वी को पूर्णतः बदल रहे थे.

कैसे?…

क्योंकि प्रकाश संश्लेषण से एक नई गैस का निर्माण पृथ्वी पर हो रहा था तेज़ी से. वह चमत्कारिक गैस थी ऑक्सीजन.

साथ ही ऑक्सीजन की उपस्थिति ने आयरन के महीन टुकड़ों को oxydise कर जंग लगाना शुरू कर दिया था. जिससे पृथ्वी लाल दिखने लगी थी.

ऑक्सीजन की उपस्थिति ने डीएनए को नई संरचनाओं में ढल स्वयं की सुरक्षा करने की अद्भुत गतिशीलता प्रदान कर दी थी.

डीएनए म्युटेशन का वही सिद्धांत पहली कोशिका से ऑक्सीजन बनाने वाली कोशिका के निर्माण से लेकर अलग अलग जीव प्रजातियों में दिखने वाला था.

यही तो वजह है कि मनुष्य का डीएनए मक्खी से 50 प्रतिशत तक मेल खाता है तो चिंपाजी से 98.5 प्रतिशत तक.

तो कुल मिला कर डीएनए की सुरक्षा एवं प्रजनन का अधिक से अधिक नई कॉपी का निर्माण एवं उन नई कॉपियों (संतानों) के स्वावलंबी बनने तक उनकी सुरक्षा एवं उनके लिए मर जाने का भाव तक विकसित हुआ.

लेकिन नेचुरल सिलेक्शन के सिद्धांत में डीएनए समूहों (जीवों) के एक बर्ताव ने डार्विन को एवं बाद में आज तक के evolutionary biologist को बेहद असमंजस में डाल दिया था.

और वह था कुछ जीवों का अपने समूह के लिए जान दे देना. क्योंकि यह स्वयं के डीएनए एवं प्रजनन करने की ज़िम्मेदारी के विपरीत स्वभाव था.

यह व्यवहार नेचुरल सिलेक्शन के सिद्धांत के विपरीत था. क्योंकि हमारे डीएनए एवं जीन दरअसल सेल्फिश जीन होते हैं. जिनकी प्रकृति प्रदत्त जिम्मेदारी स्वयं का एवं अपनी संतति की सुरक्षा ही प्राथमिकता है. एवं ऐसा पहले डीएनए निर्माण के समय से ही इस सेल्फिश प्रवृत्ति की वजह से है.

डीएनए सेल्फिश नहीं होता तो आज असंख्य जीव भी न होते. मनुष्य में आज भी 4 अरब बरसों पूर्व की प्रवृत्ति अपने ही बेटे को राजा, सर्वेसर्वा, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, अमीर इत्यादि बनते देखने के रूप में देखा जा सकता है.

जैसे, कुछ वैम्पायर बैट्स अपने समूह के भूखे रहने पर खून की उल्टी करती हैं. एवं स्वयं मर जाती हैं.

कुछ चींटियाँ किसी शिकारी जीव के खतरे को देख, फट जाती हैं, जिससे उत्पन्न रसायन से शिकारी भाग जाए.

मधुमक्खियों की प्रजातियों में ऐसी मधुमक्खियां जो प्रजनन और संतानोत्पत्ति नहीं करतीं, रानी मक्खी की प्रजा के रूप में मजदूरी, सुरक्षा, पोषण का इंतज़ाम करती हैं..

अन्ततः प्रकृति और जीवों के और करीबी अवलोकन से पता चलता है कि नेचुरल सिलेक्शन के सिद्धांत में कॉमन डीएनए लिए जीव जो कि एक दूजे के कजिन ही हुए कभी कभार जान की बाजी लगा अपने समूह जी सुरक्षा कर डीएनए को बचा पाते हैं..

किन्तु दूसरे के लिए जान का त्याग करने की प्रवृति यदि समूह में हर जीव की रहेगी तो यह भी डीएनए समूह के निरंतर जीवित रह सकने की प्रवृत्ति पर बेहद बुरा असर डालेगी. इसलिए कम ही डीएनए औरों के जीवन लिए आत्मघाती प्रवृत्ति लिए हुए होंगे.

मनुष्यों में हालांकि यह एक चेतन निर्णय होता है जबकि अन्य जीवों में स्वाभाविक.

अधिकांश डीएनए समूह सेल्फिश जीन लिए हुए हों ऐसा पहले डीएनए की मर्ज़ी थी. और एक सफल स्ट्रेटेजी भी अपनी कॉपियों को फैलाने की.

इसलिए भगत सिंह को कितना भी पूजे, कोई मानवीय समूह भगत सिंह बेहद कम संख्या में ही होंगे.

हमारी ढेरों प्रवृत्तियां दुनिया भर के नैतिक भाषणों, संतों, धर्मग्रंथों के बावजूद उस सेल्फिश जीन से संचालित हैं जो बस जीवित रहना और संख्या में वृद्धि चाहता है.

चलिए आप सबके जीवन से अनेक डर, नीचे के वाक्य से ही निकाल देता हूँ. क्योंकि मैं बीमारियों के, आंसुओं के बीच रोज़मर्रा का जीवन निकालता हूँ.

और वाक्य यह है…

कि आप और मैं पिछले 4 अरब बरसों से जी रहे हैं. अमर हैं. ऊपरी खोल, आवरण हमारे जो कि जीन की सुरक्षा और जीन को स्थान्तरित करने वाले मशीन या बक्से के रूप मात्र हैं.

और तो और, आप मात्र आपमें नहीं, आपकी संतानों में, घर के बाहर दिखती चिड़ियों, नदियों में उछलती मछलियों, म्यायूँ बोलती बिल्लियों, फूलों, डराते कॉकरोचों में भी जीवित हैं.

विश्वास करें हम सर्वत्र हैं, अमर हैं.

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