उपेक्षा जान भी ले सकती है

कहने वाले कहते
वो अमावस की रात में पैदा हुई
अँधेरे में खड़ी हो जाए तो दिखती नहीं
जले तवे को उल्टा कर दे बस
वही रंग उसका

अँधेरी रात में
तवे के रंग वाली लड़की ने
सुई में धागा डाला
फ़टे पर्दे सीले

माँ की ब्लाउज में बटन लगाये
बड़े दिनों से सेफ्टीपिन लगा कर पहन रही थी
छाती में चुभ न जाए पिन

ठीक उस चुभन से उसकी छाती में रोज दर्द टीसता
उसे उस सुई धागे से उठने वाली जुबान में टांका लगा देना चाहिए

ये इतनी काली थी की मेहंदी नही चढ़ती इन पर
इतनी काली कि इनके कटे पर खून नहीं दीखता
इतनी की ब्याह की मण्डी में बड़े अनुनय विनय से स्वीकार की गई

दहेज में बाइक लेने वाले मर्द ने इन्हें कभी अपने पीछे नहीं बिठाया
ये रात में ही बीमार पड़ी
रात में ही त्युहार मने इनके साथ

इनकी आँख से सुफेद मोतीयों ने टूट कर जान दे दी
ये ख्वाब सी सफ़ेद गरम तवे पर आश्चर्य सी फूली
और बेईमानी से कई थालियों में बाँट दी गई
ये कढ़ाई के पेंदे में राख चढ़ाती
राख हुई जा रही

कुछ ज्यादा पैसा दे कर भार उतारा गया
स्टूडियो के फोटो में भी इनके चेहरे से घूँघट नहीं उतरा

ये हमेशा सबकी नज़र से उतरी रही
एक लड़की थी ललिता शर्मा
उसके काले रंग ने बचपन से तैयारी कर ली थी
उसके हिस्से दुनिया की सारी अलाय बलाय ही आएगी

फ़्रॉक के पीछे लगा सेफ्टिपिन ब्लाउज के बीच लगा खुल जाता है कभी कभी

कभी कभी उठती है हूक

– शैलजा पाठक

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