विरासत में मिले विशेषाधिकार के बारे में मैं दोषी क्यों महसूस करूं?

आज के फाइनेंशियल टाइम्स में नाइजीरिया के रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर लामिदो सनूसी का इंटरव्यू छपा है.

वह एक राजपरिवार से हैं और वे पूछते हैं कि “विरासत में मिले विशेषाधिकार के बारे में मैं दोषी क्यों महसूस करूं?”

अफ्रीका में सबसे बड़े तेल उत्पादक देश होने के बावजूद नाइजीरिया की आर्थिक हालत खराब है, बोको हराम जैसे आतंकी संगठन से प्रताड़ित है.

और यह सब अभिजात्य वर्ग के द्वारा प्रयोग किये गए विशेषाधिकारों, जिसने जनता को जानबूझकर गरीब रखा है, के कारण है. कई ऐसे उदहारण मैं दे सकता हूँ.

मैं सनूसी की प्रशंसा करता हूँ कि उनमें यह कहने का साहस है. लेकिन क्या यही बात राहुल गाँधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अखिलेश यादव, गरीब लालू के महाधनाड्य बच्चों में कहने का साहस है?

सरल शब्दों में, स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के शासकों ने एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जिसमें वे जनता की भलाई और सेकुलरिज्म के छद्म नारों के नाम पर अपने आप को, अपने नाते रिश्तेदारों और मित्रों को समृद्ध बना सकें.

अपनी समृद्धि को इन्होंने विकास और सम्पन्नता फैला कर नहीं किया, बल्कि जनता के पैसे को धोखे और भ्रष्टाचार से अपनी ओर लूट कर किया.

आप याद कीजिये कि विजय माल्या (समाजवादी पार्टी और कांग्रेस), अनिल अम्बानी और अमर सिंह (समाजवादी पार्टी), बिड़ला (कांग्रेस), राजकुमार धूत (शिव सेना) इत्यादि किस पार्टी से राज्य सभा में भेजे गए थे.

यही खेल यूपी में समाजवाद और सेकुलरिज्म के नाम पर खेला गया जहाँ एक ही परिवार के 16-17 लोग संसद और विधानसभा के सदस्य बन गए. और यह सब हुआ गरीबी मिटाने के नाम पर, समाजवाद के नाम पर, दलित, पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों की तथाकथित उन्नति के नाम पर.

स्वयं अंग्रेजी स्कूलों और विदेश में पढ़े, लेकिन जनता को आधुनिक शिक्षा से ना केवल वंचित रखा, बल्कि उन्हें नक़ल करने को प्रोत्साहित किया. क्योकि नक़ल से पास किये लोग उन्हें चुनौती नहीं दे सकते; अगर वे किसी बात पर आन्दोलन करेंगे तो उन्हें कुछ नारों और लॉलीपॉप से संतुष्ट कर दिया जाएगा.

ऐसा नहीं है कि यादव परिवार – चाहे यूपी में या बिहार में – या मायावती या केजरीवाल अभिजात्य वर्ग में पैदा हुए थे. लेकिन वह बहुत जल्दी यह समझ लेते हैं कि कैसे सत्ता पर स्लोगनों के द्वारा, बदलाव के नाम पर कब्ज़ा करना है.

एक बार जब सत्ता मिल गयी तो वे स्वयं उसी अभिजात्य वर्ग के सदस्य हो जाते हैं और फिर वह अपनी नयी सामाजिक स्थिति एवं स्टेटस को बनाये रखने में लग जाते है.

आप नोट करिये कि सत्ता में आने के बाद कैसे वे सबसे पहले मीडिया को विज्ञापन, प्लाट, मकान, विदेशी यात्रा, कॉलेज में सदस्यता, ठेके इत्यदि की ‘घूस’ देते है, जिससे वे अपनी दुम हिलायें और उनकी कारगुजारियों को अनदेखा करें.

इसी अभिजात्य वर्ग ने जनता को बरगला कर स्वतंत्रता के बाद से कब्ज़ा किया हुआ था. सन 2000 से सिनेमा का टिकट कम से कम पांच गुना बढ़ गया, रेस्टोरेंट में खाने का दाम बढ़ गया, चाय महंगी हो गयी, लेकिन पिछली सरकार के समय रेल का भाड़ा – उपशहरी, लोकल, सामान्य, नॉन-AC का – नहीं बढ़ा.

क्योंकि इन्ही लॉलीपॉप से भ्रष्ट elites ने सत्ता पर कब्ज़ा किया हुआ है, हमारी उन संस्थाओं को extractive (यानि कि, शोषण करने वाली) बना दिया.

हमारी संस्थाओं – जैसे कि, सरकार, उद्योग, ब्यूरोक्रेसी, विधानसभाएं, NGOs इत्यादि को elites – अभिजात्य वर्ग – ने कब्जिया लिया. उन्हें पता है कि स्लोगन, नारेबाज़ी, और सस्ते दामों के नाम पर वो मेजोरिटी को उल्लू बना सकते है. मतदान के द्वारा सत्ता परिवर्तन केवल एक भ्रम था.

शक्तिशाली अभिजात्य वर्ग अक्सर आर्थिक प्रगति के खिलाफ खड़े हो जाते हैं, क्योंकि वह अपने हित को – अपनी constituency – जैसे कि अपनी सीट, अपना उद्योग, अपना NGO – सुरक्षित रखना चाहते हैं.

उन्हें डर है कि आम जनता अगर सशक्त हो गयी तो उनका रचनात्मक विनाश (creative destruction) हो जायेगा. उनकी आर्थिक स्थिति खो जाएगी. उन्हें अपने विशेषाधिकार खोने का डर है. और इसीलिए ‘वे’ ग्रोथ या विकास में बाधा डाल देते हैं, और हमारी आँखों पर पट्टी.

मैं पहले भी लिख चुका हूँ, लेकिन फिर भी दोहराना चाहता हूँ. विश्व के कई विकासशील देशो में सत्ता अभिजात्य वर्ग ने कब्जिया रखी है. भारत में भी स्वतन्त्रता के बाद से यही ग्रुप सत्ता पर काबिज़ था.

अगर बीच में एक देव गौड़ा या वाजपेयी आ भी जाए, तो भी सत्ता उनके एलीट (अभिजात्य वर्ग) ही चलाते थे, जैसे बृजेश मिश्रा, जेठमलानी इत्यादि, जिनके तार अन्य एलीटों से जुड़े होते थे. अतः कांग्रेसी व पत्रकार फलते फूलते रहते थे.

आप पता तो करिये कि प्रियंका को सरकारी कोठी किसके समय में और कैसे मिली, जबकि शहरी विकास मंत्री जगमोहन उनको कोठी देने का घोर विरोध कर रहे थे? क्या प्रधानमंत्री मोदी का परिवार एसपीजी की सुरक्षा के बहाने कई कोठियां दिल्ली में नहीं हथिया सकता था?

मेरा उद्देश्य यह है कि हमें यह समझना चाहिए कि आज भारत में अभिजात्य वर्ग के मध्य घमासान मची हुई है, और यह वर्ग भयंकर तौर से असुक्षित और भ्रमित महसूस कर रहा है.

चूंकि प्रधानमंत्री मोदी इन एलीट्स – अभिजात्य वर्ग के लोगों – की नहीं सुनते हैं, इस वर्ग को अपने विशेषाधिकार खोने की चिंता है, इसीलिए देखिये वे प्रधानमंत्री को रोकने के लिए कैसे ‘रजवाड़ो’ के मध्य गठबंधन करने का प्रयास रहे है? कैसे मीडिया प्रधानमंत्री के खिलाफ बिगुल बजाये हुआ है?

 

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