देश को कैसे ‘दक्खिन लगाया जाता है’

आइये आंध्र प्रदेश से समझते हैं. आह… वहाँ क्या हो रहा है?

कुछ नहीं, जब आप एक रुपया किलो के भाव से चावल देंगे तो कभी न कभी उसकी असली कीमत चुकानी ही पड़ेगी.

आज 35 वर्षों बाद भुगतान का नहीं, भुगतने का समय आया है.

फरवरी 2018 में आंध्र प्रदेश के सरकारी दफ्तरों में ठेकेदारों के रूपए 3000 करोड़ के बिल पेंडिंग थे क्योंकि राज्य सरकार के पास उन्हें चुकाने के पैसे नहीं थे.

आंध्र प्रदेश सरकार के पास आय का एक ही तगड़ा स्रोत है, वो है शराब पर आबकारी कर. कल अगर वहाँ के शराबी गांधीवादी हो जाये तो सरकार नहीं रहेगी.

इस कैंसर को बोया NTR ने. उन्होंने चुनावों में एक रुपया किलो चावल देने का वादा किया और जबर्दस्त जीत पायी.

पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में एमजीआर ने शालाओं में दोपहर भोजन की योजना चालू की और भारत के विध्वंस की शुरुआत हुई.

खेल बहुत सरल है – यही समाजवाद है. जिनके पास है उनसे छीनो, जिनके पास नहीं है उनको बांटो. आंध्र ही क्या, लगभग हर जगह यही खेल चल रहा है, क्या नहीं?

कट्टर वामियों का अंदाज़ ज़रा सा अलग होता है. क्रांति से सरकार पर कब्जा करो, मीडिया पर सम्पूर्ण पाबंदी लगाओ और सभी नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रताएँ छीन लो ताकि कोई आवाज ही न उठा पाये कि यह लुटेरों के राज्य का तो दीवाला निकाल गया है, चावल भी गायब हुआ है और लोगों से छीने हुए पैसे भी.

भारत जैसे लोकतन्त्र में इनका खेल जरा अलग होता है. मुफ्तखोरी को हक़ बना दो, मुफ्तखोरी की आदत डालो, राज्य में लोकसभा की पर्याप्त सीटें जीतो ताकि जब यह मुफ्तखोरी आप के राज्य को दिवालिया बना देगी तो आप केंद्र सरकार पर आप को और बड़े-बड़े पैकेज देने के लिए दबाव डालो.

केंद्र सरकार को कर्जा लेने की कोई ऊपरी मर्यादा नहीं होती तो वो अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से कर्जा उठाती जाती है. आप के राज्य सरकार को पैकेज मिल जाता है और आप ढ़ोल नगाड़े बजाकर कहते हैं कि आप की योजना तो सफल है.

और अगर इस तरह आप की सत्ता का दायरा बढ़ता है तो आप को कोष की चाभियां भी मिल जाती हैं. पुलिस आप की पर्सनल सेना बन जाती है और कानून प्रक्रिया आप का मुन्सफ़.

मीडिया और अन्य प्रोफेशनल्स को टुकड़े फेंकते रहिए और वे आप की लूट, चोरी और बंदरबांट ‘योजनाओं’ के गुण गाते रहेंगे. और दूसरी ओर आप अपनी संतति के लिए दिल्ली के छत्तरपुर जैसे एरिया में फार्म हाउस खरीदेंगे. नोएडा और नवी मुंबई में उनके फ्लैट्स की भरमार हो जाएगी.

पश्चिम बंगाल की सरकार अपने आय का 95% अपने कर्मचारियों की तनख्वाह पर खर्च करती है. उत्तर प्रदेश सरकार अपनी आय का 75% इसी मद पर खर्च करती है.

आंध्र प्रदेश का दिवाला तो दशकों पहले ही निकल चुका होता, लेकिन बीच में आईटी उद्योग ने थोड़ा सहारा दिया, 1991 में उदारीकरण आ गया, हैदराबाद boom हुआ और दिवाला बस पोस्टपोन हुआ. लेकिन तेलंगाना ने अपना अलग गाना गाया और आंध्र प्रदेश को सस्ते चावल के वादे को ले कर लेने के देने पड़ गए हैं.

और तेलंगाना भी क्या कर रहा है… अपनी आय को माइनॉरिटि वोट बैंक पर उड़ा रहा है. ऐसा शायद कोई दिन नहीं जाता जब माइनॉरिटि के लिए तेलंगाना सरकार ने कोई योजना घोषित न की हो.

एक बार मुफ्तखोरी की आदत लगी जनता से यह आदत छुड़ाना किसी भी राजनेता के लिए आत्महत्या से कम नहीं. और राजनीति में कोई आत्महत्या करने के लिए तो आता नहीं.

फिर ये नेतागण होनी को टालने के लिए तरह तरह के हथकंडे आज़माते हैं. लूट के पैसे विदेशी एकाउंट्स में जमा कराते हैं ताकि जब यह मुफ्तखोरी का भंडाफोड़ होगा तो ये शांति से लूट के माल का मज़ा कहीं और बैठकर लेते रहेंगे.

फिर ये चलन का अवमूल्यन करेंगे. दूसरे मुल्क से युद्ध करेंगे. और यह सब होता है तब और जो सत्ता हथियाना चाहते हैं वे और भी अव्यवहारिक मुफ्तखोरी की योजनाओं को घोषित कर देंगे. मुफ्त ये, मुफ्त वो…

मान्यता है कि अमीर आदमी को शिक्षा, घर, बीमारी के खर्चे आदि चिंता खाये नहीं जाती. तो राजनेता ये दिखावा करने की कोशिश करते हैं कि कुछ कानून पास कर के वे गरीब को भी इन चिंताओं से विमुक्त कर देंगे. बस, यहाँ कानून पास हुआ, और यहाँ हो गया न गरीब भी अमीर?

हजारों साल जिन लोगों ने राज किया क्या वे सभी मूर्ख थे जो उन्होने ऐसी योजनाएँ नहीं बनाई? क्या कानून बनाकर कोई बिना मेहनत किए अमीर बन भी सकता है?

यह समाजवाद-कल्याणकारी राज्य नाम के खूबसूरत पर भयानक फ्रॉड को वामपंथियों ने चलाया. उन्होने मीडिया और प्रोफेशनल्स में अपनी हुकूमत बनाई ताकि कोई यह न चिल्ला सके कि “अरे यह राजा तो नंगा है!“ दुख की बात है कि शिक्षित और बुद्धिजीवी लोगों ने भी इस महा भयानक फ्रॉड का साथ दिया है.

देश के बाद देश दिवालिया हुए जा रहे हैं. नसीब अच्छा था कि नरसिंह राव के हस्तक्षेप ने हमें बचा लिया. बाकी बहुत सारे देश चपेट में आ रहे हैं.

लेकिन कोई भी वामियों को इस फ्रॉड के लिए जिम्मेदार नहीं कहता. उदाहरण के तौर पर साठ हज़ार करोड़ का एक वार्षिक स्कैम चल रहा है – नाम है मनरेगा. लेकिन कोई उसे देश की लूट कहने की हिम्मत नहीं करता.

भारत के सभी राज्य दिवालिया हैं क्योंकि मुफ्तखोरी का बिल किसी न किसी को देना ही होता है. अब क्या करें?

इसलिए अब वामपंथी नयी योजना ले आए हैं – भारत का पुनर्विभाजन, दक्षिण उत्तर में. देश को दक्खिन लगा रहे हैं ये…

135 करोड़ देशवासियों की ज़िंदगियाँ दांव पर हैं. लेकिन फिर भी चावल एक रुपया किलो से चाहिए, चाहे तो देश बेच कर ले आओ…

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