बकरा किश्तों पे

बचपन के दिन और VCR का ज़माना… 20 रुपये प्रति कैसेट के हिसाब से किराया लगता था VCR का… और VCR वाला एक दिन परेशान होकर कहता है आप लोगों को रोज़ ही तो फ़िल्में देखना होती है… आप तो यहीं रख लो मेरा VCR, किसी और को किराए पर देना होगा तो यहीं से उठा ले जाऊंगा…

हम सब मोती तबेला वासी फिल्मों के जितने शौक़ीन… उतने ही बकरा किश्तों पे देखने के… ना ना… यहाँ किसी बकरे के हलाल होने की बात नहीं हो रही, लेकिन फिर भी पति नुमा चीज़ को यहाँ बकरे की तरह हलाल होते हुए ही बताया गया है…

मुझ जैसे VCR पर फ़िल्में देखने वाले इन नामों को बहुत अच्छे से जानते होंगे होंगे… “बकरा किश्तों पे” … “बुड्ढा घर पे है”…

बचपन में जब मैं इसे देखती थी तो लगता था… क्या सच में पाकिस्तान में शौहर अपनी बीवी से या बीवी अपने शौहर से ऐसे ही बात करती है? हमने तो घर में या आसपास इस अंदाज़ में किसी को बात करते नहीं देखा…

अरी मनहूस… या कमबख्त मारे … जैसे शब्द मेरे लिए बहुत अजीब थे उन दिनों… लेकिन लगता था कॉमेडी के लिए ये पुट डाला जाता होगा… कई वर्षों तक मेरे लिए सम्मान केवल शब्दों का ही था… लगता था… पति पत्नी के बीच भाषा का सम्मान होना ही चाहिए…

लेकिन फिर जीवन में ऐसे भी अनुभव हुए कि शब्दों में तो सम्मान रहा लेकिन व्यवहार में नहीं… तब जाकर सम्मान की वास्तविक परिभाषा जानी… फिर तो भाषा ऐसी बदली कि किसी करीबी को प्यार से नालायक कह देने में भी गुरेज़ नहीं किया…

आज कम्प्युटर पर की बोर्ड की टिक टिक के साथ इसी बकरा किश्तों पे पर लेख लिख रही थी तभी स्वामी ध्यान विनय अचानक बोल पड़े… अरी मनहूस… कबसे की बोर्ड पर टिक टिक कर रही हो, कोई अच्छा सा गाना तो सुनवा दे… एक तो मेरा स्पीकर तुम्हारे नालायक बच्चों ने तोड़ दिया और तुम्हारे मारे पसंद का गाना भी नहीं सुन पा रहा…

मैंने तुरंत अचम्भित होकर उनकी तरफ देखा और ज़ोर से हंस पड़ी कहा… – कमबख्त मारे को मेरे लिखने के समय ही गाने सुनना है…

नहीं सुनाती… जाओ…

हाँ तो अब नहीं सुनना….

हुर्र्र्रर्र्रर्रर्र…..

अब याद आया… बकरा किश्तों पे… और उमर शरीफ की अदायगी??

हालांकि उस ज़माने में उसके संवाद मेरी उम्र के हिसाब से समझ के बाहर थे… लेकिन अब स्टैंड अप कॉमेडी ने जो रायता फैलाया है उस हिसाब से ठीक ही थे… बस अफ़सोस इस बात का है कि अब नहीं देखा या झेला जा सकता इसे भी क्योंकि पाकिस्तानी स्टेज नाटक थे तो हिन्दुस्तान पर भी तंज़ कसे जाते थे…

बस कुछ यादें हैं… बचपन की…. नुक्कड़, बुनियाद के साथ ये भी याद आ जाता है कभी कभी…

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