कलम के लुच्चों, लफंगों, आतंकवादियों से आज़ाद होना चाहिए प्रेस क्लब

भूत हो चुके समाजवाद में पाले गये उत्तर प्रदेश की राजधानी… लखनऊ प्रेस क्लब को दस्तरख्वान की बाजारू तर्ज़ पर सरोकारों को मीट-मुर्गा-दारू की कीमत पर तय करने वाले दलालों से मुक्ति कब मिलेगी?

सत्ता की रोटियों पर ऐशो-आराम फ़रमातीं… खबरों की मंडियों के ठेलों पर चाय के कप धोने की पत्रकारिता करने के नाम रोटी कमाती कौमें जब बेरोजगार होती हैं तो कलम और कुर्सी के बीच नाजायज़ संबंधों को न पालने वाली सत्ता के इन्वेस्टर मीट जैसे सार्थक आयोजन में ‘मीडिया दीर्घा’ के न होने की औकात देखती हैं.

“जब इसी राजधानी लखनऊ की आबादी के महा-विपरीत महज कागज़ों में 40 लाख से ज्यादा अखबार बेच लिए जाते हैं”.

“जब यहीं अखबारों के दफ्तरों पर समाजवादी सरकार के कार्यालय होने के चरम तक जाते हुए पोस्टर-बैनर-साइनबोर्ड लगा के कलम की आज़ादी लूटी गई हो”.

“जब यहीं लखनऊ के इंदिरा नगर इलाके के एक भूखंड पर कब्ज़ा करने की नीयत से अखबार दफ्तर के नाम पर तत्कालीन सत्ताधारी गुंडों की अवैध हरकत होती रही हो”.

ये तो महज एक बानगी है दलाली पत्रकारिता की… जिसे सत्ताओं ने पाला… ऐसी नाजायज़ फसलें सूबे में बिखरी पड़ी हैं.

ऐसे में अब राजधानी के उन तमाम खबरी कारोबारियों से लेकर हॉकरों तक में बेचैनी लाज़मी है.

यह बेचैनी तब और बढ़ जाती है जब सरकार, नीतिगत निर्णय लेते हुए राज्य संपत्ति विभाग द्वारा कोटे से आवंटित सरकारी आवासों वाले सभी पत्रकारों से बाज़ार मूल्य (कमर्शियल रेट) पर किराया वसूल करेगी.

सरकारी दामादों की तरह घूमने-चरने-खाने वाली इन जमातों को अपनी पहली बिसात तब पता चली थी जब इनके वाहन एनेक्सी भवन की सड़क के फुटपाथ पर पार्क होने शुरू हुए जो कभी पंचम तल से तिलक हाल तक पार्क होते थे.

साहेब… राजधानी के किसी भौकाली संपादक को प्रतिभा सिनेमा से एनेक्सी के दो नंबर गेट तक ले जाकर, दैनिक पास पर भीतर जाने को बाध्य देखिए… दर्द खुद जान जाइये.

फिर भी साहेब… काम बोलता है, दिया दाम बोलता है. यूपी के दो लोकसभा उपचुनावों के बाद के बोल तो सुन ही रहे होंगे.

साल 2013 से अपने अंतिम 4 साल के समाजवादी सरकार में उत्तर प्रदेश सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के जिस 98 करोड़ सालाना को बढ़ा कर 400 करोड़ सालाना किया गया तब के जिम्मेदार अधिकारी के जरिये… जो रकम कुल 2400 करोड़ की बनती है : इन्ही संपादकों, अखबार-मीडिया मालिकानों को खैरात में बंटे हैं.

आज एक साल होने जा रहे हैं और उत्तर प्रदेश सूचना का बजट पूर्व की भांति सामान्य है, और यही वजह है कि एनेक्सी भवन के तलों की दूकानदारी वाले खबरी सेल्समैनों-कमीशन एजेंटों-ब्लैक मेलरों को अब ज़मीन न मिल रही, न मिलने दी जाएगी.

ज़रूरत हुई तो… लोकसंवाद के इस लोकमीडिया… सोशल मीडिया के जरिये से लेकर सड़कों तक.. हलक से जवाब खींचेंगे : कलम के लुच्चों, लफंगों, आतंकवादियों से कब्जाया प्रेस क्लब आज़ाद होना चाहिए.

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