खजुराहो : तथ्य और परिकल्पना – 2

गुरुकुल में प्रशिक्षु साधक साधिकाओं को ब्रह्मचर्य व्रत का कठोरता से पालन करना होता था. पुरुष साधक के लिये स्त्री दर्शन, स्पर्श, कामुक रसिक कथाओं का पढ़ना, सुनना, चर्चा करना पूर्णत: वर्जित होता था.

यही नियम स्त्री साधिकाओं के लिये थे. उनके लिये भी पुरुषों के दर्शन, स्पर्श् आदि वर्जित थे. रहस्यमार्गी साधना से जुड़े लोगों के लिये विशेष रूप से ब्रह्मचर्य व्रत का कठोरता से पालन अनिवार्य था.

प्रशिक्षु साधक वयस्क होने तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुये, यौगिक क्रियाओँ के द्वारा शारीरिक मानसिक शुद्धि एवं पुष्टि करण करते हुये, विद्याध्ययन करते थे. तदुपरांत गुरूजन चक्रानुष्ठान के योग्य साधकों का चयन करते थे.

चक्रानुष्ठान की प्रक्रिया सर्वाधिक जोखिम भरी होती है. जरा सी भूल चूक बहुत घातक होती है. अतः विशेष परीक्षण के द्वारा योग्य साधक का चयन होता था. जिन साधकों को इस अनुष्ठान के लिये चयन नहीं हो पाता था, उनको गृहस्थ आश्रम में प्रवेश की अनुमति दे कर समाज में वापस भेज दिया जाता था.

खजुराहो के मंदिर ऊँचे प्लेटफार्म पर बने हैं. सीढ़ीयों पर तीन जगह अर्ध चंद्राकार आकृतियाँ बनी हैं. सबसे निचली सीढ़ी पर बीच की सीढ़ी पर और ऊपर की सीढ़ी पर.

ये तीन ठहराव हैं. जहाँ आगुन्तक चयनित प्रतिभागियों का मंत्रोंच्चार के बीच जल पुष्प अक्षत सुगंधित द्रव्यों से अभिषेक किया जाता था.

नंदी की मूर्ति मंदिर के बाहर है. मंदिर के अंदर दो कक्ष हैं पहले कक्ष मेँ बीच मेँ छोटे चबूतरे पर चार स्तंभों के सहारे मंडप सा बना है. चबूतरे पर स्थान रिक्त है.

उक्त स्थान का उपयोग अनुष्ठानादि के लिये किया जाता था. इसी कक्ष में दोनों तरफ दो बड़ी खिड़कियाँ हैं, जिनमें कुछ लोगों के बैठने की जगह है. संभवतः उनमें वादक वाद्य यंत्रोँ के साथ बैठते होंगे. मंदिर का दूसरा कक्ष गर्भग्रह है, जिसमेँ शिवलिंग विराजमान है.

– शत्रुघ्न सिंह

खजुराहो : तथ्य और परिकल्पना – 1

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