कैसे भूल जाऊं देश की दुर्दशा की ज़िम्मेदार खिचड़ी सरकारों को

1990 तक कांग्रेस के खिलाफ, उसके बाद से भाजपा के खिलाफ देश में भांति-भांति के नाना प्रकार के बड़े-छोटे, खरे-खोटे दल जब इकट्ठा होकर संयुक्त मोर्चा बनाते थे.

एक-दूसरे के प्रति परस्पर स्नेह-सम्मान और विश्वास का उनका प्रदर्शन राम-लक्ष्मण और कृष्ण-बलराम के परस्पर स्नेह-सम्मान की पौराणिक गाथाओं को मात देता था. लेकिन मतदान समाप्त होते ही इन दलों की भाव भंगिमाएं बदलना शुरू होती थीं.

एक-दूसरे को देखकर त्योरियां चढ़ने लगती थीं. बांहें चढ़ाई जाने लगती थीं और चुनाव परिणामों की घोषणाओं के साथ ही हर दल के हाथ में दूसरे दल का कॉलर होता था. तीसरे दल का हाथ चौथे दल के पायजामे का नाड़ा खींच रहा होता था.

सभी दल एक-दूसरे पर कुश्ती के चरखा दांव, जांघिया दांव, कलाजंग दांव, ईरानी दांव आज़माने लगते थे.

याद करिये कि 1977 में तीन चौथाई बहुमत से जीती ऐसे दलों के जमघट वाली जनता पार्टी के मोरारजी देसाई ने इस डर से अकेले ही जाकर प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण कर ली थी कि कहीं अन्तिम समय मे उनके नाम पर कोई बवाल ना कर दे.

जिस समय मोरारजी भाई शपथ ले रहे थे उसी समय जगजीवन राम और चौधरी चरण सिंह प्रेस के सामने उन्हें कोस रहे थे और जनता पार्टी को जन्म देने वाले महानायक जेपी अपने कमरे में रो रहे थे.

तीन चौथाई बहुमत वाला मजबूत किला केवल ढाई साल में ही भरभरा कर ढह गया था. जनता पार्टी की सरकार असमय ही अकाल मौत मर गयी थी.

1989 में नए भेष, नए नाम के साथ उन्हीं दलों का ऐसा जमावड़ा एक-दूसरे के प्रति पुनः परस्पर स्नेह-सम्मान के प्रचण्ड प्रदर्शन के साथ एकबार फिर इकट्ठा हुआ था.

जनता दल नाम का यह जमावड़ा सरकार बनाने का मौका भी पा गया था. लेकिन अपना प्रधानमंत्री चुनते समय तक इस जमावड़े की आंतरिक स्थिति विस्फोटक हो गयी थी.

जिस समय कमरे के अन्दर वीपी सिंह को प्रधानमंत्री चुनने की कोशिशें हो रहीं थी उसी समय प्रधानमंत्री पद के दूसरे प्रबल दावेदार चन्द्रशेखर के समर्थक, वीपी सिंह के तत्कालीन विश्वस्त सहयोगी और सलाहकार राम जेठमलानी को सार्वजनिक रूप से सड़क पर ही लात घूंसों से बुरी तरह पीट रहे थे.

उस पिटाई के तत्काल बाद फोटोग्राफरों के कैमरों में कैद हुईं राम जेठमलानी की तस्वीरों में कुर्ता पायजामा गायब हो चुका था और बदन पर केवल अंडरवियर बनियाइन ही दिखाई दिए थे.

इस अजब गज़ब माहौल में जिन देवीलाल ने वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई थी, वही देवीलाल 9 महीने बाद वीपी सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटाने के लिए दिल्ली में लाखों किसानों की रैली कर रहे थे.

रैली के जवाब में वीपी सिंह ने मण्डल कमीशन का दांव चल दिया था. भाजपा राम रथयात्रा लेकर निकल पड़ी थी. 11 महीने पुरानी वीपी सिंह सरकार ढेर हो गयी थी.

गज़ब की मौकापरस्ती दिखाते हुए कांग्रेस के सहयोग से चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बन गए थे. लेकिन इन 11-12 महीनों में ही देश ने तबाही बरबादी का वह दौर देखा था कि 5 लाख कश्मीरी पंडितों को अपनी जान बचाकर कश्मीर से हमेशा के लिए भागना पड़ा था.

4 महीने के लिए प्रधानमंत्री बने चन्द्रशेखर को देश का दैनिक खर्च चलाने के लिए देश के खज़ाने में जमा सोना विदेश में गिरवी रखना पड़ा था.

1991 में 235 कांग्रेसी सांसदों के बल पर केन्द्र में बनी नरसिंह राव की अल्पसंख्यक सरकार कभी बहुमत में आ ही नहीं पायी और बहुमत जुगाड़ने के चक्कर में शिबू सोरेन, बूटा सिंह सरीखे मंत्री जेल की सैर कर आये थे.

सुखराम और कल्पनाथ राय सरीखे मंत्री भ्रष्टाचार में गिरफ्तार होकर जेल की सैर कर आये थे.

स्वयं प्रधानमंत्री नरसिंह राव को निचली अदालत ने 2 साल की सज़ा सुनायी थी, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था.

सज़ा का फैसला खारिज़ करवाने में CBI के द्वारा अटल जी द्वारा की गयी कृपा किसी से छुपी नहीं रह सकी थी.

लेकिन नरसिंह राव सब खिचड़ी गठबन्धन सरकारों से फिर भी बेहतर सिद्ध हुई थी.

इसके बाद 1996 में भाजपा के खिलाफ ऐसा मोर्चा एक बार पुनः सक्रिय हुआ था. उस मोर्चे की स्थिति यह थी कि शपथ ग्रहण कर के बाहर निकले उस मोर्चा सरकार के गृहमंत्री इंद्रजीत गुप्त ने अपने 146 सांसदों के साथ मोर्चा सरकार को समर्थन दे रही सबसे बड़ी समर्थक पार्टी कांग्रेस को ही सबसे पहले यह कहते हुए धमकी दी थी कि “अगर कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया तो जूतों से मारी जाएगी.”

इसका नतीजा यह निकला था कि मोर्चा सरकार केवल 18 महीने चली थी. इन 18 महीनों में दो प्रधानमंत्री बने थे. अनुमान लगा लीजिये कि देश की क्या दुर्दशा हुई होगी.

1998 में फिर अटल जी की गठबन्धन सरकार बनी थी जो मनमानी छूट नहीं मिलने के चलते जयललिता द्वारा केवल 18 महीने बाद ही ढेर कर दी गयी थी.

1998 से सबक लेकर 1999 में अटल जी ने फिर जो गठबन्धन सरकार बनाई थी उसका परिणाम यह हुआ था कि दस वर्षों तक भाजपा सत्ता से कोसों दूर रही थी. यदि 2014 में मोदी नाम का चमत्कार नहीं हुआ होता तो भाजपा अभी भी सत्ता में नहीं आयी होती.

आजकल यूपीए-1, यूपीए-2 का उदाहरण देकर कांग्रेसी फौज दावा करती है कि गठबन्धन की खिचड़ी सरकार बहुत बढ़िया होती है और चलती है. ऐसा दावा करते समय कांग्रेसी फौज CWG, 2G और कोलगेट सरीखी लगभग 12 लाख करोड़ की लूटों को भूल जाती है.

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