क्या भविष्य देखा जा सकता है?

हर व्यक्ति में यह संभावना छिपी पड़ी है कि वह अपनी अन्तर्प्रज्ञा को जगाकर भविष्य काल को वर्तमान की तरह दर्पण में देख ले. और यदि मनुष्य समय के पैटर्न को समझ ले तो सब संभव है वो आसानी से भविष्य देख सकता है, और मजे की बात ये कि इसके लिए हमे पश्चिम की तरफ देखने की जरूरत नही है.

इसे हमारे वैदिक ऋषि मुनियों ने सदियों पहले ही लिख के सिर्फ छोड़ा ही नहीं अपितु वो इसका इस्तेमाल भी जानते थे, अब वक्त है उन विधाओं पर थोड़ा प्रकाश डाला जाए और उन्हें पुनर्जीवित किया जाए ..

भविष्य में घटने वाली हलचलें वर्तमान में मानव मस्तिष्क में एक प्रकार की तरंगें पैदा करती हैं, जिन्हें साइट्रॉनिक वेवफ्रंट कहा जा सकता है. इन तरंगों की स्फुरणाओं को मानव मस्तिष्क के स्नायुकोष (न्यूरान्स) पकड़ लेते हैं.

The 6th sence (छठी इंद्रिय) इसे ही कहते हैं, और हम भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान लगा लेते हैं, हालांकि ऐसा बहुत सूक्ष्म स्तर पर होता है लेकिन यदि हम समय के पैटर्न को समझ ले तो भविष्य को हम वर्तमान की तरह देख सकते हैं और ये संभव है ..

अच्छा एक प्रयोग कीजिये खुद के साथ –

क्या आपको कभी ये नहीं लगता कि आपके साथ जो हो रहा है उसे आप पहले ही देख चुके है या महसूस कर चुके हैं (आपको शायद ये भी लग सकता है कि इसे तो मैं सपने में भी देख चुका हूँ).

आपका जवाब मुझे पता है हाँ ही होगा क्योंकि ऐसा होता ही है और सबके साथ होता है, बेहद कम समय के लिए ऐसा होता है लोग याद नहीं रख पाते हैं जो पूर्व में घटित हुआ है वही वापस घटित होगा बस थोड़ा सा हेर फेर के साथ लेकिन होगा वही.

अच्छा आपने 6th सेंस का नाम सुना ही होगा वो भी एक पूर्वानुमान ही तो है, लेकिन सिर्फ एक-तिहाई लोगों की छठी इंद्रिय ही उस स्तर की सक्रिय होती है जिससे उन्हें घटनाओं का पूर्वाभास हो जाता है.

यदि लगातार ध्यान किया जाए और अपनी भाविनाओं या आभासों और संकेतों की ओर ध्यान दिया जाए तो भविष्य में होने वाली घटनाओं को जानकर टाला जा सकता है..

आने वाले समय में विज्ञान शायद इतनी प्रगति कर ले कि वो भविष्य देखने की मशीन बना ले जिससे हम भविष्य में होने वाली घटनाओं को आसानी से देख सके, लेकिन होगा क्या – इसका भी श्रेय कोई पश्चिमी वैज्ञानिक ही ले जाएगा, क्योंकि हम देख ही नहीं पा रहे है कि जो चीज़ अभी ढूंढी ही नहीं गयी है वो भी सनातन वैदिक साहित्य में उपलब्ध है. शायद आपको ये जानकर हैरानी हो कि भविष्य देखने की विधा वैदिक साहित्य में उपलब्ध है..

हालांकि कुछ बाते मैं आपको अभी नहीं बता सकता क्योंकि वो अभी रिसर्च का हिस्सा है लेकिन कुछ उदाहरण दे रहा हूँ जिससे आपको समझने में आसानी होगी और गर्व होगा कि जिसके लिए विज्ञान परेशान है वो चीज़े हमारे पूर्वज पहले ही लिख चुके है बस डर है कि पश्चिमी देशों के लालची और धूर्त वैज्ञानिक इसपे भी अपना अधिकार न कर ले –

“क्षण तत्क्रमयोः संयमाद् विवेकजं ज्ञानम्.” (3152)
महर्षि पातंजलि के योगदर्शन से

अर्थात्-समय के अत्यंत छोटे टुकड़े क्षण के क्रम में चित्त-संयम करने से संसार की सही स्थिति का निरीक्षण किया जा सकता है.

आसान शब्दो में जीवन एक एक स्लाइड करके बना है सभी स्लाइड निश्चित जगह लगी हुई है भविष्य देखना है तो हमें बस स्लाइड को थोड़ा आगे तेज बढ़ा देना है.

“चित्तकाला हि येऽन्तस्तु, द्वय कालाश्च ये बहिः. कल्पिता एवं ते सर्वे विशेषो नान्यहेतुकः॥” (2914)
मांडूक्य-कारिका से

अर्थात्-यह विश्व वास्तव में चित्त की अनुभूति-सम्वेदना और घटनाओं की सापेक्षता मात्र है. दृश्य जगत में इसके अतिरिक्त अन्य कोई विशेषता नहीं है.

आसान शब्दो में यहाँ डायमेंशन की बात हो रही है भौतिकविज्ञानियों का मानना है कि हमारा अतीत, हमारा वर्तमान और हमारा भविष्य सभी वास्तविक रूप से इस स्पेसटाइम में मौजूद है यदि आप भौतिक विज्ञान के नियमों पर विश्वास करते हैं तो भविष्य और अतीत उतना ही वास्तविक है जितना वर्तमान एक क्षण के रूप में है.

सरल शब्दों में कहे तो हमारा भूत, वर्तमान और भविष्य कहीं नहीं जानेवाला है और कभी आनेवाला भी नहीं है सबकुछ सिर्फ स्पेसटाइम की स्लाइड्स में ही मौजूद है.

समय एक आकस्मिक अवधारणा है. वह हमारे जीवन में सतत परिवर्तित होने वाली वास्तविक घटना है. समय को समझने के लिये हमें इस सतत परिवर्तन को निर्मित करने वाली प्रक्रिया को समझना होगा जिससे समय के प्रवाह का भ्रम उत्पन्न होता है.

समय गति से दृष्टिगोचर होता है और उसका मापन अन्य गति से तुलना के द्वारा होता है. सूर्योदय, सूर्यास्त, रात और दिन, बदलते मौसम, खगोलीय पिंडो की गति यह सभी सतत परिवर्तन के प्रमाण हैं.

उम्र बढ़ने की प्रक्रिया भी हमारी आण्विक गति तथा प्रक्रिया भी गति का प्रभाव है और समय का ही भाग है. इसके अतिरिक्त समय की उपस्थिति का एक महत्वपूर्ण पहलू फोटोन और परमाण्विक स्तर पर कणो की गति भी है और मनुष्य को सिर्फ उस पैटर्न को समझने भर की देर है.

विशेष –

हमें बस समय के पैटर्न को समझना है और समझने का तरीका हमारे ऋषियों ने सदियों पहले लिख छोड़ा है.

कई बार व्यक्ति के अवचेतन मन का तार कुछ पलों के लिए समष्टि के प्रवाह से अनायास भी जुड़ जाता है. सामान्य लोगों में ऐसा किसी अनजान क्षण में ही घटित हो उठता है. उस क्षण में ही उन्हें भूत या भविष्य की प्रत्यक्ष झाँकी दिखाई पड़ जाती है, जिसे लोग चमत्कार मान बैठते हैं.

वस्तुतः इसमें चमत्कार जैसा कुछ है नहीं. मनुष्य के भीतर ऐसी विशिष्ट क्षमताएँ स्वाभाविक रूप में विद्यमान है, जिनका समुचित विकास कर वह काल की मानव-निर्मित सीमाओं को भेदकर अतीत-अनागत की प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त कर सकता है.

योग-साधनाओं द्वारा यह विकास सहज रूप में हो जाता है और तब व्यक्ति को अपनी उस अनन्त विस्तृत आत्म-चेतना का बोध होता है, जिसे वह विस्मृत किये रहता है.

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