अभिनेत्रियाँ बनाम नचनिया

वाकया – 01
ज्यादा दिन नहीं हुए जब 25 फरवरी की सुबह खबर आई कि अभिनेत्री ‘श्रीदेवी’ नहीं रही ‘सोशल मीडिया’ हो या ‘अख़बार’ या ‘न्यूज़ चैनल’ सब उस दुखद खबर से ग़मगीन होकर आंसू बहाने लगे उनको अपनी पसंदीदा ही नहीं महानतम अदाकारा बताते हुये अपने संस्मरण साँझा करने लगे मगर, उसके तीन दिन बाद 28 फरवरी को जब उनके अंतिम संस्कार के समय महाराष्ट्र सरकार के द्वारा उनको राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी गयी तो सबके मुखौटे एक साथ उतार गये और अचानक अधिकांश वॉल पर लिखा जाने लगा एक ‘नचनिया’ ही थी तो उसे इतना बड़ा सम्मान देने की जरूरत क्या थी कौन-सी उसने सरहद पर जाकर गोलियां खाई शराब पीकर ही तो मरी थी.

वाकया – 02

11 मार्च की बात हैं सपा नेत्री और भूतपूर्व अभिनेत्री ‘जया प्रदा’ ने कहा कि उन्हें पद्मावती में खिलजी का किरदार देखकर आजम खां याद आ गये क्योंकि उन्होंने चुनाव के समय उनको बेहद परेशान किया था.

तो जवाब में आजम खां साहब बोले, मैं नचनियों के मुंह नहीं लगता.

इसके पूर्व भी ‘पद्मावती’ फिल्म के विवाद में इन्होने कहा था, “फिल्में मजा लेने के लिए होती हैं और हमने “नौ लखा” गाने वाली एक अदाकारा को दो बार रामपुर से सांसद बनाया.

राजा साहब फिल्म में डांस करने वाली नचनियां से इतना डर गये. बड़ी-बड़ी पगडियां लगाकर लोग फिल्म का विरोध कर रहे हैं”.

वाकया – 03

ये तो एकदम ताजातरीन किस्सा हैं जब राज्यसभा सदस्य के रूप में ‘जया बच्च्चन जी’ का नाम दिया गया तो ताजा-ताजा भाजपा में शामिल हुए नरेश अग्रवाल ने कहा कि एक नचनिया के लिए मेरा टिकट काटा गया.

इन सारी घटनाओं में गौरतलब शब्द ‘नचनिया’ हैं और जिस लहजे में वो बोला गया वो कहने वालों की मानसिकता स्पष्ट करता कि नीचे से उपर तक सबकी सोच महिलाओं के प्रति एक जैसी हैं और वे उन्हें किस नजरिये से देखते हैं.

‘नचनिया’ शब्द में केवल अपमान या कमतरी का ही भाव नहीं होता बल्कि, उनको उनकी हैसियत याद दिलाने का अधिक होता जैसा कि वे आंतरिक रूप से उनको भोग्या समझते हैं.

यहाँ ‘नचनिया’ कहने से उनका तात्पर्य महज़ नाचने-गाने वाली नहीं उनको देह वाले खांचे से आंकना और ये दर्शाना कि वे तो पेशेवर धंधे वाली हैं जिनकी उनकी नजरों में कोई इज्जत नहीं.

यह भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि इस तरह के अल्फाज़ विशेष तौर से अभिनेत्री के लिये इस्तेमाल किया जाते और उनके फिल्मों में काम करने को हेय दृष्टि से देखा जाता मतलब कि, जिस व्यवसाय के कारण उन्हें नेत्री बनने के लिये बड़ी-बड़ी पार्टियों के द्वारा न केवल ऑफर दिया जाता बल्कि, उनको मनाने के लिये उनके दरवाजे पर नाक तक रगड़ी जाती और अनेकों चक्कर काटे जाते फिर जब वे आगे बढ़ जाती तो इस तरह से उनकी लकीर को छोटा कर दिया जाता हैं.

यही अभिनेत्रियाँ जब अपनी काबिलियत से अन्तराष्ट्रीय स्तर पर धमाका करती या विदेशों में जाकर देश का नाम करती या परदेस में भारत का परचम लहराती तो गर्व से हमारा सर ऊंचा हो जाता.

यही अभिनेत्रियाँ जब इनकम टैक्स भरकर देश के विकास में सहायता करती तो हमें नजर नहीं आता या जब यही अभिनेत्रियाँ अपने अभिनय व नृत्य से सैनिकों का मनोरंजन करती उनका मन बहलाती जिससे कि वो रिफ्रेश होकर कर्तव्य के प्रति सजग हो तो हमें कुछ गलत नहीं लगता.

लेकिन, जब इनको इसी वजह से सरकार की तरफ से राजकीय सम्मान मिलता तो ‘नचनिया’ कहकर इनका मूल्यांकन किया जाता कितनी दोगली सोच से ग्रसित रहते हैं हम. ‘देशभक्ति’ को हमने सिर्फ सरहद पर जाकर गोलियां खाने से जोड़ा रखा जबकि, देश के मान-सम्मान को बढ़ाने में किसी भी क्षेत्र में दिया गया इमानदार योगदान भी इसी श्रेणी में आता हैं.

माना कि कभी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के जनक ‘दादा साहब फालके’ को पहली हिंदी फिल्म के लिये ‘हीरोइन’ ढूंढने ‘रेड लाईट एरिया’ में जाना पड़ा था परंतु, आज संभ्रांत परिवार की पढ़ी-लिखी समझदार लडकियाँ स्वेच्छा से इस कार्यक्षेत्र को चुन रही क्योंकि, यहाँ केवल हूनर की ही पूछ-परख होती और जल्द ही अपने दम पर बड़ा नाम व दाम हासिल होता.

अब वापस आते इस मुद्दे पर जहाँ तीन-तीन शीर्ष अभिनेत्रियों को अंततः ‘नचनिया कहकर संबोधित किया गया जबकि, इन तीनों अभिनेत्रियों ने सिर्फ अपने अभिनय, अपनी प्रतिभा और अपनी कला के दम पर पुरुषों के वर्चस्व वाली फ़िल्मी दुनिया में अपने समय में एक अलग मुकाम हासिल किया.

फ़िल्म इंडस्ट्री में उल्लेखनीय योगदान देकर अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज किया जिसके एवज में सरकार ने भी उनको राष्ट्रीय सम्मानों और पदम् पुरस्कारों से नवाज कर उनकी काबिलियत व कला का सम्मान किया.

यही वजह कि राजनीति में लाने के लिए बड़े-बड़े नेताओं ने उनके हाथ-पैर भी जोड़े क्योंकि जितनी भीड़ ये फिल्मी कलाकार सॉरी ‘नचनिया’ जुटा लेती उतनी किसी नेता के बस की बात नहीं.

मगर, काबिले गौर कि जो ऊपरी तौर पर उनसे अदब से पेश आते वास्तव में वे अंदर से उनको ‘नचनिया’ समझते हैं और जैसे ही उनको खुद से आगे निकलते देखते तो अचानक से सर पर सींग निकल आते और जुबान में नीम घुल जाती जिससे इतने मीठे वचन निकलते.

ऐसे में ये सवाल खड़े होना लाज़िमी…

यदि फिल्मों में काम करना इतना ही घृणास्पद हैं तो फिर चुनाव जीतने के लिये नेताओं द्वारा उनके तलुवे क्यों चाटे जाते?

फ़िल्मी अभिनेत्री होने के कारण उनको नेता लोग तथाकथित वेश्या या चरित्रहीन समझते तो फिर उनको राष्ट्रीय सम्मानों से क्यों सम्मानित किया जाता?

क्या फिल्म में काम करने से उनकी राष्ट्रभक्ति या देशभक्ति अपवित्र हो जाती हैं या फिर सरहद पर जाकर गोली खाकर न मरने से उनके कार्य नगण्य हो जाते?

क्या उनको राजकीय सम्मान देना या उनकी मृत देह को तिरंगे में लपेटना इसलिये गलत क्योंकि, उन्होंने फिल्मों में नाचने-गाने का काम किया?

क्या फिल्मों में काम करने का मतलब कि ये अभिनेत्रियाँ नाचने वालियां हैं और फ़िल्मी पेशा वेश्यावृति?

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