सोचिये गलती किसकी? सर्कस का जानवर बन कर न रह जाए हमारे बच्चे

क्लासरूम में बच्चों को पढ़ाने के पहले ये बेहद जरूरी होता है कि पहले उन्हें सीखने का तरीका सिखाया जाए. बच्चे किताबों से ज्यादा अपने आस पास की चीजो खिलौनों आदि से ज्यादा सीखते हैं.

लेकिन आजकल फर्राटेदार इंग्लिश का चलन है.. teacher पढ़ाते कम परफॉर्म ज्यादा करते हैं. प्राइवेट स्कूलों के बारे में लोग कहते हैं “फलाने स्कूल में बहुत अच्छी पढ़ाई होती है , सारे टीचर केरल से आये हैं”.

कमाल है …! जैसे केरल से आये तो भगवान हो गए.लेकिन वे पांचवी दशवी क्लास तक के असमिया बच्चो को क्या पढ़ाएंगे जिन्है सिर्फ ठीकठाक रूप से असमिया और हिंदी ही आती है.

एक घटना याद आती है. एक बार किसी स्कूल में टीचर ने बच्चों को a से z तक रटा दिया. मसलन a फ़ॉर आपेल, ब फ़ॉर बॉल, c फ़ॉर कैट…..ऐसे z तक.
दूसरे दिन जब एक बच्चे को टीचर ने खड़ा करके उससे a से z तक किताब में पढ़कर सुनाने को कहा . तो बच्चे ने कुछ यूं जवाब दिया –
A फ़ॉर अप्पल
ब फ़ॉर बॉल
C फ़ॉर मेकुरी.

टीचर shocked.

असल मे टीचर उसे किताबी भाषा में C फ़ॉर सीएटी कैट पढ़ा रहे थे लेकिन उसने किताब में मौजूद चित्रों से सीखा… इसलिए उसने आपेल को आपेल , बॉल को बॉल और कैट को मेकुरी (असमिया) बोल दिया.

समस्या ये है कि पांच साल के एक बच्चे को जिसे उसकी मातृभाषा तक ठीक से नहीं आती उसे हम इंग्लिश भाषा मे ट्रेनिंग देने लगते है.. उसका अवचेतन मस्तिष्क उस जानकारी को उसके आसपास की चीज़ों से कनेक्ट नही कर पाता तो वो भूल जाता या उसे समझ नही आता.
स्कूली भाषा मे हम ऐसे बच्चों को low IQ या कमजोर कह देते हैं.. कुछ दिन बाद उसे भरोसा हो जाता है कि वो पढ़ने में उतना काबिल नही.. और एक बच्चा जिस उम्र में उसे बेफिक्र होकर रहना चाहिए वो इंफेरिओरटी काम्प्लेक्स का शिकार हो जाता है.

सोचिये गलती किसकी? सर्कस का जानवर बन कर रह गए हैं हमारे बच्चे.

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