क्या देश को बना दिया जाए यात्रियों द्वारा लूटी गई ट्रेन?

लगभग 4 साल तक NDA में रहने के बाद TDP के चंद्रबाबू नायडू की बुद्धि विवेक और अन्तरात्मा की तिकड़ी अचानक जागी.

नायडू को याद आया कि मोदी सरकार आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दे रही. इसीलिए नायडू की TDP ने आज NDA छोड़ दिया.

राजनीति के बहुत शातिर घाघ खिलाड़ी चंद्रबाबू नायडू को क्या यह नहीं मालूम कि किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने का फैसला करने में 4 साल तो छोड़िए, 4 दिन भी नहीं लगते?

मोदी सरकार बहुत पहले ही यह साफ भी कर चुकी थी कि आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता.

स्वयं चंद्रबाबू नायडू को भी यह भलीभांति ज्ञात है कि आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता क्योंकि यह दर्जा पाने की किसी भी कसौटी पर आंध्रप्रदेश खरा नहीं उतरता.

इसीलिए 4 साल तक आंध्रप्रदेश को वह दर्जा नहीं मिलने के बावजूद चंद्रबाबू नायडू NDA में ही बने रहे.

दरअसल NDA से चंद्रबाबू नायडू के जाने का जो कारण है वह भारतीय राजनीति की छाती में पिछले दो-ढाई दशकों में पनपे और बढ़े भ्रष्टाचार के कैंसर की कोख से ही उपजा है.

मोदी सरकार द्वारा पिछले 4 सालों में आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा भले ही नहीं दिया गया हो लेकिन विशेष आर्थिक पैकेज और भरपूर आर्थिक सहायता जमकर दी गयी.

यहां यह उल्लेखनीय है कि किसी भी राज्य को यदि 20 हज़ार करोड़ की आर्थिक सहायता केंद्र देता है तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि वह पूरा रूपया उस राज्य को दे दिया जाएगा.

इसकी एक नियमावली है जिसके तहत वह राज्य अपनी योजनाओं कार्यक्रमों की सूची देता है जिसके अनुसार किस्तों में केंद्र उसे राशि देता है.

जब पहले दी गयी क़िस्त की राशि के खर्च का हिसाब (Utilisation Certificate) राज्य सरकार द्वारा केन्द्र सरकार को दिया जाता है तो उसे राशि की अगली क़िस्त केन्द्र सरकार देती है.

यही वह बिन्दु है जहां पर मोदी सरकार से चंद्रबाबू नायडू की बुरी तरह ठन गई थी.

लगभग 2 वर्ष पूर्व विशेष आर्थिक सहायता कोष से दिए गए 3049 करोड़ रूपये का हिसाब और केंद्र की 13 योजनाओं के लिये दिए गए लगभग 1000 करोड़ रुपयों का हिसाब चंद्रबाबू नायडू सरकार ने आजतक केन्द्र सरकार को नहीं भेजा.

परिणामस्वरूप 2 साल पहले ही उसकी अगली क़िस्त रोक दी गयी थी. केंद्रीय योजनाओं के लिए भी राशि रोक दी गयी थी.

नायडू को लगा था कि थोड़ी नोकझोंक के बाद मामला सुलझ जाएगा. अतः यह खींचातानी दो साल तक चलती रही किन्तु मोदी सरकार टस से मस नहीं हुई.

यही कहानी बहुचर्चित पोलावरम प्रोजेक्ट की भी थी. बिना पिछला हिसाब दिए हुए ही चंद्रबाबू नायडू उस प्रोजेक्ट के लिए एक बहुत मोटी रकम की अगली क़िस्त की मांग भी कर रहे थे जिसे मोदी सरकार द्वारा पूरा नहीं किया जा रहा था.

यहां सवाल यह है कि यदि काम के लिए पैसा आया और उसे खर्च भी किया गया तो उसका हिसाब (Utilisation Certificate) देने से किसी सरकार को क्यों और क्या परेशानी होती है?

इसका उत्तर यह है कि उस राशि की जो बंदरबांट होती है उसकी सच्चाई Utilisation Certificate देने पर उजागर हो जाती है.

मोदी सरकार से पहले राज्य सरकारों से Utilisation Certificate मांगने का नियम केवल सरकारी औपचारिकताओं की फाइलों तक ही सीमित रह गया था.

केन्द्र सरकार में गठबन्धन सहयोगी बनकर शामिल होनेवाले क्षेत्रीय दलों की राज्य सरकारों को उस राशि की बंदरबांट की खुली छूट देकर केन्द्र उनके समर्थन की कीमत चुकाता रहता था.

अर्थात देश की हालत उस ट्रेन सरीखी हो जाती थी जिसपर सवार हर यात्री अपनी अपनी सुविधानुसार सीट की रेक्सीन, गद्दी, पंखा, बल्ब, स्विच बोर्ड, सनमाईका, टोटी आदि यह कह के उखाड़कर अपने साथ ले जाता है कि क्योंकि… रेल हमारी सम्पत्ति है और मैंने अपना हिस्सा ले लिया.

मोदी और नायडू का झगड़ा भी यही है कि नायडू देश की ट्रेन में अपना हिस्सा मांग रहे हैं और मोदी ज़िद पर अड़े हैं कि देश को यात्रियों द्वारा लूटी गई ट्रेन नहीं बनने दिया जाएगा.

फिलहाल तो मोदी की ज़िद ही चलेगी लेकिन 2019 यह तय करेगा कि देश की ट्रेन लुटेगी या बचेगी.

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