अध्यात्म की गोद में खेलता विज्ञान

आजकल नया ट्रेंड चला है, वेद इत्यादि शास्त्रों में विज्ञान ढूंढने का. एक पक्ष का मानना है कि शास्त्रों में भरपूर विज्ञान है और इसी अद्भुत विज्ञान की मदद से फिरंगियों ने सभी वैज्ञानिक खोजें की हैं तो वहीं दूसरा पक्ष इस विचार को फ़िज़ूल की ख्यालबाज़ी और शास्त्रों को काल्पनिक गाथाएं कह कर सिरे से खारिज करता है.

और करे भी क्यों ना? आखिर हैं तो ये कहानियां ही.

यदि आप शास्त्रों से अनभिज्ञ भी हैं, वेद पुराण का आपने अध्ययन नहीं भी किया तो भी आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश नाम की ट्रिनिटी से परिचित तो होंगे ही. नारद मुनि का नाम भी आपने सुना ही होगा. देव-असुर संग्राम और समुन्द्र मंथन की कहानियां भी आपने सुनी ही होंगी.

ये सब बेसिक है, हमारी स्मृतियों में वर्षों से अंकित है. और यदि आपकी इन विषयों में थोड़ी भी रुचि हो अथवा आप किसी बड़े ही धार्मिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं, फिर तो कहने ही क्या.

फिर तो आप ना केवल ब्रह्मा विष्णु महेश के नाम से ही परिचित हैं बल्कि कथाओं के माध्यम से आप उनके रूप, गुण, चरित्र और इन सबके आपसी संबंधों से भी भली भांति परिचित हो गए हैं. आखिर ये तीनो (कॉस्मिक ट्रिनिटी) ही तो ब्रह्मांडीय व्यवस्था के तीन मूल स्तंभ (fundamental pillars) हैं.

ये ही तीनों एक परमाणु के अंदर प्रोटोन, न्यूट्रॉन, इलेक्ट्रान के रूप में अभिव्यक्त होते हैं, तो ये ही तीनों बिजली की तारों में phase, neutral और earth के रूप में manifest होते हैं. यदि आप वाकई इन तीनों के रूप, गुण और आपसी संबंधों से परिचित हैं तो एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था में भी ये ही तीनो विधान पालिका, न्याय पालिका और कार्य पालिका के रूप में आपको दिखने चाहिए.

(नोट: मीडिया को चौथा स्तंभ बना कर पेश करना आधुनिक जगत का एक बहुत गंभीर छलावा है). भौतिकी की चार fundamental forces क्या विष्णु के चार हाथों में नहीं दिखती?

क्या कारण है कि ब्रह्मा विष्णु महेश की कहानियां तो आपने बहुत सुनी किन्तु हमारी अर्थव्यवस्था में स्वर्ण, रजत और मुद्रा का महत्व आपको समझ नहीं आया?

गीता में भगवान कृष्ण खुद को ही ब्रह्मा, विष्णु महेश बताते हैं तो गीता पढ़ने वाले एक entrepreneur को भी लगना चाहिए कि अपनी कंपनी (ब्रह्मांड) का CFO, COO और CEO वह स्वयं ही है.

आप प्रकांड पंडित हैं, आप जानते हैं कि ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों बराबर हैं, तीनों के पास अपने अपने क्षेत्र में समान अधिकार हैं, कोई एक दूसरे पर दबाव नहीं बना सकता, किन्तु आपको हमारे राजनेताओं का अफसरशाही पर वर्चस्व आश्चर्य में नहीं डालता?

ऐसे में कैसे आधारशिला रखेंगे हम वेद आधारित शिक्षा प्रणाली की?

वेद हमारा परिचय कराते हैं सृष्टि के मूल सिद्धांतों से जिन से यह ब्रह्मांड संचालित होता है. मानव चूंकि ब्रह्मांडीय चेतना का ही अंश है इसलिए मानव रचित किसी भी व्यवस्था का भी इन्ही मूल सिद्धांतों पर आधारित होना अनिवार्य है.

सागर कभी तालाब में अपना आश्रय नहीं ढूंढता, वेदों को भी विज्ञान में अपना आश्रय नहीं ढूंढना चाहिए.

क्योंकि विज्ञान अध्यात्म की गोद में खेलता है.

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