GST झमेला : भाजपा का कोर वोटर व्यापारी वर्ग वोट देने जाए या टैक्स का मिलान करे

वर्ल्ड बैंक कुछ बड़े वाले अर्थशास्त्री ढूँढ रहे है… जेटली के जटिल जीएसटी को समझने के लिए… फेसबुक पर संपर्क करें तो एक क्या हजार मिल जाएँगे…

जो अभी जेटली भी नहीं समझ पाएँ होंगे, उसको भी समझा पाने की क्षमता बारहवीं तक इतिहास पढ़ने वालों में भी है… उनमें से एक मैं भी हूँ.

एक साल से जीएसटी को समझने का प्रयास करने के बाद वर्ल्ड बैंक ने भी हार मान कर कह दिया… भारत में जीएसटी का सबसे जटिल रूप है.

विश्व के लगभग 200 देश में से 115 देश में जीएसटी लागू है. 115 देश में भारत दूसरे नंबर पर है उच्च टैक्स रेट में…

विश्व के 49 देशों में जीएसटी का एक स्लैब है, 28 देशों में दो टैक्स स्लैब हैं… सिर्फ पाँच देश… इटली, लक्जेमबर्ग, घाना, पाकिस्तान और भारत में पाँच टैक्स स्लैब हैं.

इनमें से चार देशों की अर्थव्यवस्था डाँवाडोल है… पाँचवे का मालिक भगवान ही है.

जहाँ वर्ल्ड बैंक को भारत का जीएसटी समझना जटिल लगा, वहाँ हमारा टैलेंट देखिए… हमने टैक्स बचाने के नए-नए रास्ते भी ढूँढ लिए.

भारत में टैक्स की शुरुआत अंग्रेजों ने भारतीय व्यापार को समाप्त करने के लिए की थी इसलिए 90% तक टैक्स ले लिया करते थे.

उसके पहले राजा, कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार चलते थे और कौटिल्य की नीति थी… राजा को जनता से आटे में नमक के बराबर कर लेना चाहिए.

इसलिए हमारा देश व्यापार के क्षेत्र में शिखर पर था… भारत सोने की चिड़िया किसी खदान से सोने-चाँदी, हीरे-जवाहरात निकाल कर तो बना नहीं था.

विशिष्ट उत्पादन और व्यापार के बल पर भारत की छवि सोने की चिड़िया की थी… जिसको लूटने के लिए ग्यारहवीं शताब्दी से लगातार विदेशी आक्रमणकारी आते रहे… बार-बार लूटते रहे फिर भी हमारी समृद्धि को समाप्त नहीं कर सके.

अंत में अंग्रेजों ने इसको समाप्त करने का उपाय निकाला… उच्च कर दर… इतना ज्यादा टैक्स लगा दिया कि लोगों ने या तो व्यापार करना छोड़ दिया या बेईमानी करने लगे.

बेईमान व्यक्ति में आत्मबल नहीं होता है… उसको दास बनाना बहुत आसान होता है… हमारी दासता की नींव यहीं से पड़ी.

अब अंग्रेज तो नहीं हैं पर जो भी शासक हैं सब उन अंग्रेजों के ही प्रतिनिधि हैं… उनकी बनाई व्यवस्था को जस का तस स्वीकार करके शासन चला रहे हैं.

जैसे न्यायालय के लिए प्रसिद्ध डायलॉग है… तारीख पर तारीख, वैसे ही टैक्स में भी है… टैक्स पर टैक्स…

एक नौकरी करने वाला पहले अपनी आय कर आयकर देता है, फिर उस आय से बचे पैसे का यदि कहीं निवेश कर देता है तब सरकार दुबारा टैक्स माँगने लगती है…

सरकार की मंशा ऐसी लगती है जैसे वो चाहती है कि आम नागरिक अपनी सारी आय उसको ही दे दें.

लोग दे भी देते यदि सरकार उनकी सारी जिम्मेदारी उठा लेती तो परन्तु सरकार ऐसा करेगी ही नहीं.

नानाजी देशमुख कहते थे… “यह आप का खयाल है कि सरकार काम करती है, सरकार के भरोसे कुछ नहीं होता… सरकार के भरोसे अगर कुछ होता तो रूस फ़ेल नहीं होता.”

गहराई से विचार करें तो पाएँगे कि सरकार सिर्फ टैक्स ही लेने का काम करती है… और जनता को बेईमान बनने पर विवश करती है.

भारत में कर प्रणाली थी ही जटिल… उसमें जीएसटी आ गया सरल करने के नाम पर पहले से भी ज्यादा जटिल… कोढ़ पहले से था, खाज और हो गया या ऐसा भी कह सकते हैं… करेला नीम चढ़ गया.

पाँच स्लैब में टैक्स रेट रखने के बाद भी बहुत सी वस्तु और सेवा जीएसटी से बाहर है जैसे अल्कोहल, पेट्रोलियम उत्पाद, बिजली बिल, रियल स्टेट पर लगने वाली स्टाम्प ड्यूटी आदि.

रिटर्न जमा करना, ई-वे बिल, इनपुट टैक्स क्रेडिट और टैक्स रिफण्ड की धीमी चाल आदि परेशानियों से 8 महीने बाद भी व्यापारी जूझ रहे हैं.

ऐसी स्थिति में भाजपा का कोर वोटर (व्यापारी वर्ग) वोट देने जाएगा या इनपुट-आउटपुट टैक्स का मिलान करेगा.

अगले आठ महीनों में यदि जीएसटी के टैक्स रेट कम नहीं हुए, कानूनी प्रक्रियाओं और प्रावधानों को सरल नहीं बनाया गया… उपभोक्ता, कर अधिकारी, सीए और कारोबारियों को सही जानकारी से अवगत नहीं कराया गया… तो जेटली जी सरकार-लूट-ली भी हो जाएँगे.

डिस्क्लेमरमेरी न कोई आय है, न कर देना है इसलिए जीएसटी आए या जाए स्वास्थ्य पर कोई अंतर नहीं आने वाला है… पहले भी दुबले ही थे आगे भी दुबले ही रहेंगे.

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