सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी रोज़गार की समस्या का असली चेहरा

मेरे लेख ‘क्या आज के डिजिटल युग का मुकाबला कर सकती है हमारी अर्थव्यवस्था?‘ पर आयी टिप्पणियों पर व्यापक विमर्श की आवश्यकता है.

एक मित्र लिखते है कि “हमारे यहां बैंक व रेलवे में 70% कर्मचारी कम हो गये. काम 50 गुना बढ़ गया जो मशीनीकरण के कारण हो रहा है. जब बेरोजगारी बढ़ेगी तो क्रय शक्ति कैसे बढ़ेगी. भारत के बारे लिखे.”

चलिए, देखते है कि भारत में बैंक व रेलवे में रोज़गार बढ़े हैं या घटे.

रेल मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016-17 में रेलवे में कुल 13.08 लाख कर्मचारी है. इन कर्मचारियों की संख्या 2015-16 में 13.30 लाख थी; लेकिन वर्ष 2011-12 और 2012-13 के दौरान रेलवे में केवल 13.06 लाख कर्मचारी थे.

तो, UPA और NDA सरकार के दौरान कर्मचारियो की संख्या एक समान ही रही. हाँ, वर्ष 1991-92 में कुल 16.52 लाख कर्मचारी थे, जो धीरे-धीरे कम हो गयी.

अब आते है बैंकों के कर्मचारियों की संख्या पर.

रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016-17 में सभी बैंको – जिसमे सरकारी, प्राइवेट और विदेशी बैंक शामिल है – में कुल 13 लाख (13,01,703) कर्मचारी थे. वर्ष 2015-16 में कुल 12.56 लाख (12,56,085); वर्ष 2012-13 में 11 लाख (10,96,980) कर्मचारी थे. अतः इनके संख्या बढ़ी ही है.

लेकिन समस्या इनके घटने-बढ़ने की नहीं है. समस्या यह है कि हर महीने भारत में दस लाख युवक और युवतिया एम्प्लॉयमेंट मॉर्केट में आ रहे है. लेकिन सभी बैंकों में कुल रोजगार केवल 13 लाख है. यानि कि एक वर्ष में केवल 40 से 50 हज़ार (एक महीने में लगभग 4000) लोगो को बैंक में जॉब मिलेगा.

एक महीने में दस लाख रोजगार चाहने वालों के लिए बैंक में कुल 4000 नौकरियां.

यह है समस्या का असली चेहरा, जो सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी है.

क्या इतने युवाओं को रोजगार सरकारी नौकरी में मिल जाएगा? क्या सरकारी क्षेत्र हर महीने 10 लाख रोजगार दे सकता है? या, क्या स्वतंत्रता के बाद कभी भी सभी युवाओं को भारत में सौ प्रतिशत रोजगार मुहैया हुवा है?

नहीं.

तब फिर उपाय क्या है?

पहले तो यह समझिये कि सरकारी क्षेत्र में सभी के लिए नौकरियां नहीं है. कृषि में भी नौकरी नहीं है क्योकि भारत अब कृषि प्रधान देश नहीं है. कृषि हमारी अर्थव्यवस्था का 12% है, जब कि 52% लोग कृषि पर आश्रित हैं.

सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण पिछले दो दशकों से यह परिवर्तन रिपोर्ट कर रहे है कि कृषि का रोल, ग्रामीण आय और देश की अर्थव्यवस्था में कम होता जा रहा है. इसलिए कृषि में लगे हुए अधिकतर किसान गरीबी में रहने को अभिशप्त हैं.

तो नौकरी कहाँ से आएगी? वे आएगी उद्यम से, निजी क्षेत्र से, इनोवेशन या नई खोज से.

देखते-देखते डिजिटल इकॉनमी, सॉफ्टवेर इंडस्ट्री, एप्स, सेल फ़ोन, ओला और उबेर टैक्सी, Airbnb, ऑनलाइन शॉपिंग, इलेक्ट्रिक कार, सर्विस सेक्टर (ब्यूटी पार्लर, स्वास्थ्य, वकील, रेस्टोरेंट, ट्रासपोर्ट, mass media, विज्ञापन, प्रॉपर्टी इत्यादि) में वृद्धि हो रही है;

अरबों-खरबों की इकॉनमी हो गई है. तभी प्रधानमत्री मोदी जी का ज़ोर मेक इन इंडिया, डिजिटल इकॉनमी और मुद्रा योजना पर है.

क्योकि अब नए रोजगार इन्ही क्षेत्रो से आयेंगे.

अगर आपको लगता है कि अखिलेश, मायावती, ममता या राहुल के पास रोजगार के लिए बेहतर प्लान है, तो हमें बताइये और उनको अवश्य वोट दीजिये.

लेकिन मेरी राय भी सुनते जाइए. मुझे विश्व में कई नेताओं को करीब से देखने और सुनने का सौभाग्य मिला है. मैं यह कह सकता हूं कि आपको प्रधानमंत्री मोदी जैसा दूरदर्शी नेतृत्व शायद ही कहीं देखने को मिलेगा.

 

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