अम्बानी-अडानी और सूटबूट का इल्ज़ाम झेलती सरकार का असली सच

पिछले दिनों करीब 30 हज़ार किसानों ने लाल झंडे के तले मुम्बई मार्च किया. उनकी प्रमुख मांग क़र्ज़ माफ़ी की थी.

पर क्या क़र्ज़ माफ़ी ही किसानों की समस्याओं का हल है. आखिर क्यों आजादी के 70 साल बाद भी किसान बदहाल है.

इसी पर मेरा 5 नवम्बर 2016 को लिखा एक लेख –

किसानों की आत्महत्या कुछ सालों से सुर्खियों में रही है. यूँ भी उनकी दुर्दशा किसी से छुपी नहीं है. कुछ दिन पहले की ही बात है जब किसानों को प्याज एक-डेढ़ रुपया बेचने पर मजबूर होना पड़ा था.

लगातार ये खबरें आती रही हैं कि किसानों को उनकी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिलता है. किसान कर्ज तले दबे हैं. और मजबूरी में आत्म हत्या कर रहे हैं.

पिछले साल मोदी जी ने अपने एक भाषण में 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की बात कही थी.

उनके इस भाषण का कथित बुद्धिजीवी अभी तक मज़ाक बनाते हैं. मीडिया और विपक्षी पार्टी पूछते हैं कि ये कैसे संभव है. अगर किसानों की आय डबल हुई तो महंगाई कितनी बढ़ेगी क्योंकि कृषि उपज का दाम भी उसी अनुपात में बढ़ेगा. सवाल तो है ये.

लेकिन पहला सवाल ये है कि किसानों की आय इतनी कम कैसे है? विकसित देशों में कृषि एक अच्छा सफल बिजनेस माना जाता है. फिर हमारे देश में किसान होना मजबूरी, बेचारगी दया का पर्याय क्यों है?

आज़ादी के पहले देश में ज़मींदारी प्रथा थी. किसानों से उनकी उपज का आधे से अधिक हिस्सा लगान के रूप में वसूल लिया जाता था. किसान जिस खेत को जोतते थे उसी के मालिक नहीं थे.

आज़ादी के बाद पाक और पवित्र कांग्रेस सरकार आयी. उसने ज़मींदारी प्रथा ख़त्म की. भूमि सुधार कानून बनाये. फिर किसानों की तो हालत बेहतर होनी चाहिए थी. क्योंकि जैसा हम सभी जानते हैं कि भारत में कृषि आय पर इनकम टैक्स भी नहीं है.

इतनी सुविधाओं के बाद भी किसान की हालत इतनी बदतर क्यों है. लगभग हर दशक में सरकारें खासतौर पर कांग्रेस सरकार किसानों के क़र्ज़ माफ़ करती आयी हैं.

अंग्रेज़ जो नहरें बनाते थे उसके पानी को सिंचाई पर देने के लिए किसानों से टैक्स लेते थे. अब नहर के पानी पर टैक्स नहीं है. अक्सर बिजली भी मुफ्त कर दी जाती है. किसान क्रेडिट कार्ड मिलते हैं.

फिर दिक्कत कहाँ है? क्या है?

इस साल जून के महीने में महाराष्ट्र सरकार ने एक पुराने कानून को ख़त्म किया. ये कानून 1963 में बना था. महाराष्ट्र एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्किट कमेटी एक्ट 1963 (APMC एक्ट).

[Freedom for the farmer]

इस कानून में किसानों की फसल बिक्री के लिए मंडी बनाने का फैसला हुआ. सरकार इस मंडी में व्यापारियों लाइसेंस देती. लाइसेंस प्राप्त व्यापारी ही फसल खरीद सकते थे. लाइसेंस परमिट राज की याद तो है ही.

और इसके अलावा एक प्रावधान और था. किसान अपनी फसल को सिर्फ इसी मंडी में बेच सकते थे. इस कानून से किसानों को ज़मींदारों से बचाकर व्यापारियों के हवाले कर दिया गया. किसानों की फसल पर पहले ज़मींदारों का नियंत्रण था अब व्यापारियों का हो गया. व्यापारियों ने अपना संगठन बना लिया. और उसके बाद शोषण की शुरुआत हुई.

किसान जब अपनी उपज लेकर मंडी आते तो उनपर तरह तरह के टैक्स लगने लगे. कुछ सरकारी. कुछ मंडी के. एंट्री टैक्स, लोडिंग टैक्स, टर्नओवर टैक्स. किसानों को जो दाम मिलता उसका करीब 10% इन टैक्स में चला जाता.

और इन सबके अलावा किसान उस व्यापारी को कमीशन भी देते जो उनकी उपज खरीदता था.

सोचिये एक बार. फिर कैसे किसान हालत सुधरती.

और अत्यंत न्यूनतम कीमत पर उपज खरीदने के बाद इसे बेहद महंगे दाम पर जनता को बेचा जाता है. इन मंहगी कीमतों का फायदा कभी किसान को नहीं मिला. प्याज की बढ़ती कीमतों और एक-डेढ़ रुपया बिकने की खबरों में आपने नासिक मंडी का बहुत नाम सुना होगा.

महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार ने इस कानून को ख़त्म कर दिया. इसके विरोध में व्यापारियों ने लंबी हड़ताल की लेकिन सरकार नहीं झुकी.

[Maharashtra farmers can sell produce in open market now]

दरअसल मोदी सरकार ने पिछले साल सभी राज्यों को दिशा निर्देश दिए कि ऐसे मंडी कानून बदले जाएँ जहाँ किसानों को व्यापारियों के हाथों मजबूर होना होता है.

मोदी सरकार ने इन कानूनों की वजह से किसानों की बुरी हालत को रेखांकित करते हुए मॉडल कानून का ड्राफ्ट जारी किया है और राज्य सरकारों से कहा कि इसकी तर्ज पर वो कानून बनाये.

सिर्फ सात राज्यों ने अब तक अपने यहाँ कानून बदले हैं (लेख 5 नवम्बर 2016 का है). जिनमें अधिकतर भाजपा शासित प्रदेश हैं. बिहार ने इस मॉडल कानून को ही ख़ारिज कर दिया है.

हालाँकि मोदी सरकार समझती है कि मात्र कानून बदलने से समस्या का हल नहीं होने वाली. सबसे बड़ी ज़रूरत तो उपज खरीदने के लिए ढेरों विकल्प बनाने की है.

जब तक मार्किट में कंपीटिशन नहीं होगा… व्यापारी, थोक विक्रेता, फ़ूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, बड़ी रिटेल चेन, ई-कॉमर्स चैनल, सरकारी फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया, सरकारी प्रोक्योरमेंट एजेंसीस, कॉर्पोरेटिव संस्थाएं.

जब ये सभी होंगी तभी किसानों को फेयर प्राइस मिल सकेगा. तब किसान अपनी उपज का बादशाह होगा. इसीलिए सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक मंडी की शुरुआत की है. जहाँ किसान सिर्फ एक मंडी तक सीमित नहीं है. उसके सामने अब ई-नेशनल एग्रीकल्चर मार्किट का विकल्प है.

इसके अलावा किसान को सस्ते कर्ज की जरूरत है. अभी तक किसान इस कर्जे को इन्ही व्यापारियों से हासिल कर रहा था.

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस सरकार के समय ऐसी मांग नहीं उठी. लेकिन कांग्रेस सरकार का कहना था कि इन व्यापारियों की वजह से किसानों को अपनी उपज के दाम मिलने की गारंटी है. नए लोग इंडस्ट्री में आएंगे तो किसानों को ठग लेंगे. ये कांग्रेस सरकार की स्टेटमेंट है विधानसभा में.

यही अंतर है भाजपा और कांग्रेस सरकार में. अम्बानी-अडानी और सूटबूट का इल्ज़ाम झेलती सरकार का असली सच.

यूपी में समाजवादी सरकार है (लेख 5 नवम्बर 2016 का है). समाजवादी माने लोगों की… जनता की सरकार. यूपी में सन 1953 में एक कानून बना था U.P. Sugarcane Regulation of Supply and Purchase Act. 1953.

इसे कांग्रेस की महान सरकार ने बनाया था जो बहुत भारी जनहित वाली थी. ऐसे तो ये कानून किसानों की सुरक्षा और उनके हितों के लिए था. लेकिन फिर कानून का दुरुपयोग भी तो किया जाना है.

इसमें एक प्रावधान किया गया कि यदि शुगर मिल किसानों का गन्ना खरीदने के 15 दिन के अंदर भुगतान नहीं करती तो उसे किसानों को बकाया राशि पर ब्याज देना होगा. लेकिन साथ में एक पैरा और जोड़ा गया कि अगर गन्ना कमिश्नर चाहे तो इस ब्याज को माफ़ कर सकता है या ब्याज दर कम कर सकता है.

आपको याद ही होगा यूपी में गन्ना किसानों का हज़ारों करोड़ रुपया इन मिलों पर बाकी है. हमेशा से रहा है.

ये रकम इतनी है कि दो साल पहले यूपी की महान समाजवादी सरकार ने गन्ना किसानों को मिलने वाली 2000 करोड़ की ब्याज राशि इस 1953 के कानून के तहत माफ़ कर दी थी.

[Protest against UP govt for waiving 2,000 cr. that industrialists owe farmers]

पिछले साल फिर 1500 करोड़ की रकम माफ़ की गयी. और इस साल फिर पिछले साल की बकाया राशि पर ब्याज माफ़ कर दिया गया.

जिन किसानों ने इस रकम के भरोसे ऋण लिया होगा, क्या साहूकारों, बैंक ने उनका ब्याज माफ़ कर दिया होगा?

और अखिलेश सरकार ने कहा कि किसानों के अपने हित को (लॉन्ग टर्म) ध्यान में रखते हुए ये ब्याज राशि माफ़ की गयी है.

ऐसा काम पिछले साल मोदी सरकार ने भी किया था. मोदी सरकार ने पिछले साल शुगर इंडस्ट्री को बचाने के लिए, 6000 करोड़ की राशि मंजूर की. ये राशि यूपी की शुगर मिलों को किसानों को देनी थी. सालों की बकाया रकम.

मोदी सरकार ने ये रकम मिलों को नहीं दी. किसानों के आधार कार्ड के आधार पर उनके बैंक अकाउंट में डायरेक्ट ट्रांसफर की.

ये अंतर होते हैं सरकार चलाने में. पिछले साल जब मोदी सरकार ने ये फैसला लिया था तब भी बुद्धिजीवियों ने बहुत कोसा था. अम्बानी-अडानी की सरकार बताया था.

और बाज़ लोग तो कहते ही हैं कि भाजपा आधार कार्ड का पहले विरोध करती थी, जब सत्ता में आयी तो खुद उसे प्रमोट करने लगी. लोग सरकारी नीतियों में अंतर नहीं समझते. इसीलिए फर्क नहीं कर पाते.

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