स्त्री : कुछ कविताएँ

ma jivan shaifaly poem uttejna making india

(१)

काम जब उचक चढ़ बैठता है उसके सर पर
चला आता है
वह, उसी स्त्री के पास
भोगने से पहले
याद करता है आज की अपनी सुबह
और शाम को दी हुई
अपनी आठवीं गाली
तेरी माँ की ***,

सुबह की पहली चाय में शक्कर नहीं थी तब,

सर को हलके से झटक कर
मुस्कुराता है वह
भूलता है सब कुछ

चढ़ बैठता है वह
नंगे नितंब के त्रिकोणी पृष्ठ के ऊपर
और लंबी दौड़ के लिए खींचता है एक गहरी साँस,
खींचता है
अपनी स्त्री को,
और साधता है अपनी थरथराती हुई कमर को,
संधानरत होता वह
उन चौरासी आसनों में सबसे सुगम वाला आसान गांठता है

स्त्री भी भूलती है, वह सब-कुछ
सिर्फ उसी पुरुष के लिए
यह जानते हुए भी,
कि
उस जमे हुए
सर पकड़े गाढ़े तरल के टूट कर उतरने के बाद,
वह पगलाया नशीला ज्वर जब ठंडा होगा
तब वह बकेगा उस दिन की नौंवी गाली,
तब स्त्री, आहिस्ता से थोड़ा सरक कर किनारे हो लेगी

पूरे बिस्तर पर पसरा
दिन की दसवीं गाली बुदबुदाता वह पुरुष,
अंततः अपना सुबह वाला चेहरा पा लेता है
एक ओर सिमटी वह स्त्री
तेज़ी से समेटती है उस पूरे दिन की सबसे राहत भरी साँसे
और खुश रहती है कि
इस पूरे दिन में उसका चेहरा एक बार भी नहीं बदला

(२)

रोनाल्डो के देश में
ईयर फ़ोन कानो में लगाये
किसी अनाम बीच के किनारे छोटे घर में
ब्रूम- ब्रूम चिल्लाती
उछलती है वह चिट्ट गोरी लड़की
नहीं जानती कौन है उसके देश का राष्ट्रपति,

दिन में तीसरी बार नहाती वह अपने भूरे बालों पर खिसियाती है
सुखाती है,
गिनती है अब बस एक महीना और चार दिन बाकी है उसके सोलहवें साल में,

और नापती है अपनी छाती,
फैलती है एक अबूझ टेढ़ी बिजली उसके पतले होंठो पर

वह एक महीना चार दिन बाद उम्र भर जोड़ी गयी सारी सीपियाँ वापस कर देगी उसी समुद्र को,

उसकी माँ ने कहा था
तुम खबर भेजना
दोस्त मछलियाँ सीपियाँ चुग कर बदल जाएँगी
एक सफ़ेद हार्नबिल में,
और उसकी माँ के कान में बोल देंगी
जो तुम्हारी बेटी थी न, अब बड़ी हो गयी है

दिन-भर बौराई लड़की
अब अपना चेहरा बदलती है
और हो जाती है किसी ऊबे हुए भारतीय गाँव की उदास लड़की

वह नहीं चौंकती है
जानती है सुबह का उसका सपना हमेशा झूठा निकलता है

वह पकड़ती है अपनी छाती
और याद करती है
उसके मसले जाने का पहला दिन,
दिन की पहली गाली वह अपने फूफा के नाम करती है
और गिनती है अब बस एक महीना और चार दिन बाकी है उसके सोलहवें साल में,

दिन भर काम में खटने के बाद
वह लड़की रात को फिर बन जायेगी एक ब्राजीली लड़की

(३)

स्त्री

वह संसार देख रहे थे
वह यात्री हुए.

उन्होंने दुख देखा तो कई बार बुद्ध बने.

आकाश देख साधु हुए.
पहाड़ देख कर वह पुरुष हुए.

वह कौतूहल से भरे थे वह बच्चे हुए.
अब एक पूरी पृथ्वी उनके मुँह में समा सकती थी

जब उनकी जिज्ञासा का भूत उतरा
तो उन्होंने इन सभी को फिर से देखा.

उन्होंने फिर से देखा, क्योंकि वह उनके प्रेम में पड़ गए थे.

वह अब चुप हुए
वह इस बार स्त्री हुए!

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY