गणेश तुम सच में नृत्य के आचार्य हो

पहली बार उस लड़की ने उसे ममता कुलकर्णी के साथ डांस करते हुए देखा था…
मारा रे तेरी आँखों ने मुझे मारा रे…

उसे लगा शायद कोई सह कलाकार होगा… लेकिन जो भी था उसने अपनी अदाकारी, प्रस्तुति और आँखों की गहराई से सच में उस लड़की को घायल किया था…

21-22 साल की लड़की को किसी गीत में हिरोइन के साथ नाचता हुआ एक काला और मोटा सा सह कलाकार पसंद आया है ये सुनकर उसकी सखियों ने उसका खूब मज़ाक बनाया था…

लेकिन उस लड़की की पसंद हमेशा से सबसे जुदा रही… हीरो की खान में भी वो उस कोयले को ढूंढ निकालती है जिसमें सबसे चमकदार हीरा बनने की संभावना हो…

उस ज़माने में गोविंदा के डांस का बोलबाला था… उसका डांस देखकर उस लड़की को लगता था गोविंदा के डांस स्टेप्स ज़रूर गोविंदा के अपने होते होंगे… तभी तो सबसे अलग होते हैं… जिसे सच में डांस कहते हैं, आजकल की डांस की तरह जिम्नास्टिक नहीं…

इस बीच उस सह कलाकार को कई अन्य फिल्मों में भी डांस करते हुए देखा… फिर पता चला वो तो सच में कोरियोग्राफर है… आज भी वो काला मोटा सा लड़का उसके पसंदीदा काले रंग के कपड़ों में ही परदे पर दिखता है… और वो आज भी उसे देखकर उतनी ही मुग्ध हो जाती है…

आज वही लड़की चालीस पार की उम्र में जब अपने बच्चों को मल्हारी गाने पर नृत्य करते देखती है तो उसी तरह घायल हो जाती है, जैसे उस दिन पहली बार उसे देखकर हुई थी….

फिर एक दिन अचानक उसके बच्चे Making of Malhari गाने का वीडियो देख रहे थे… और वो वहां पहुँच जाती है… अरे ये क्या इस गाने को तो उसी लड़के ने कोरियोग्राफ किया है…

वोइच तो… उसकी स्टाइल अलग ही है, सरोज खान का नृत्य जैसे अलग ही पहचान में आ जाता है, वैसे ही वो भी इस लड़के का डांस हमेशा पहचान लेती थी… कन्धों और गर्दन की लचक का सबसे अधिक उपयोग, आँखों से टपकती कामुक शरारतें, और सबसे जुदा आइटम सॉंग की प्रस्तुति का माहिर… कलाकार जब उसकी डांसिंग स्टेप्स पर डांस करता है तो लगता है जैसे गुरुत्वाकर्षण बल उन पर काम ही नहीं करता… वो ज़मीन से दो इंच ऊपर नृत्य करते नज़र आते हैं…

फिर तो नेट पर उसके सारे गाने खोज मारे… चिकनी चमेली!!! अरे हाँ उसके अलावा इस गाने को इतना फिसलता हुआ और कौन बना सकता था… और गोविंदा के जिन स्टेप्स की वो कायल थी वो भी इसी महाशय की देन है… ये भी उसे आज ही पता चला… और भी बहुत सारे गानों की जानकारी खोजी तो उसकी और मुरीद होती गयी… और अंत में “हवन कुण्ड, मस्तों का झुण्ड”… का वो फेमस स्टेप तो उसके करियर के हवन कुण्ड में सबसे महत्वपूर्ण समिधा है…

नौ साल की उम्र में जब कोरियोग्राफर पिता अपने डांस की विरासत उसे सौंप कर इस दुनिया में संघर्ष करने के लिए अकेला छोड़ गए तो अपनी मेहनत, लगन और कला के बल पर वह 12 वर्ष की उम्र में ही डांस का आचार्य बन गया, और आज 46 की उम्र तक आते आते, वो National Film Award For Best Choreography और National Film Awards for “Hawan Kund” जीतकर साबित कर देता है कि वो सच में नृत्य का आचार्य है…

और कला के पारखी की पहली फिल्म “स्वामी”का जब वो खुद निर्माता बना तो ना उस फिल्म में न कोई गाना था, ना ही उस पर कोई नृत्य. लेकिन उस फिल्म की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि फिल्म बनाने पहले ही उसका पार्श्व संगीत तैयार कर दिया गया था…. गरीबी, जीवन के संघर्षों और मानवीय संवेदनाओं को प्रस्तुत करने में वही अधिक कामयाब हो पाता है जो इन सबसे गुज़रा हो… इसलिए उसकी यह पहली फिल्म भी उसी तरह की कहानी पर थी…

बहुत दिनों से सोच रही थी तुम पर कुछ लिखना है… कहाँ से शुरू करूं समझ नहीं आ रहा था… शुरू वहीं से किया जब पहली बार तुम्हें देखा था… लेख का समापन भी उसी पर करूंगी क्योंकि यह लड़की आज भी तुम्हारा नृत्य देखकर उस 21-22 साल की उम्र में पहुँच जाती है… जब तुम्हें पहली बार नाचते हुए देखा था… मारा रे तेरी आँखों ने मुझे मारा रे…

गणेश तुम सच में नृत्य के वास्तविक आचार्य हो… और यह लड़की तुम्हारी मुरीद…

– माँ जीवन शैफाली

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