अच्छा हुआ कि खुल गई मुट्ठी : भाग-2

फूलपुर गोरखपुर लोकसभा उपचुनावों में सपा-बसपा गठबन्धन की जीत और भाजपा की हार पर 5 लाख से 50 लाख रूपये प्रतिमाह वेतन लेने वाले न्यूज़ चैनली एडिटरों/ एंकरों/ पत्रकारों के अफलातूनी विश्लेषणों को कल दोपहर से देख सुन रहा हूं.

2019 में भाजपाई विजय की संभावनाओं की अग्रिम श्रद्धांजलियां लिख रही इन ‘आसमानी एडिटरों/ एंकरों/ पत्रकारों की तिकड़ी एकमत होकर एकस्वर से मायावती का जयगान यह कहकर करने में जुटी हुई है कि केवल मायावती ही ऐसी करिश्माई नेता हैं जो अपनी पार्टी का वोट किसी भी दूसरी पार्टी में ट्रांसफर करवा सकती हैं.

[अच्छा हुआ कि खुल गई मुट्ठी : भाग-1]

यह तिकड़ी दावा कर रही है कि फूलपुर और गोरखपुर में मायावती ने ऐसा कर के दिखा भी दिया है.

चलिये जानते हैं कि इन ‘आसमानी’ एडिटरों/ एंकरों/ पत्रकारों की तिकड़ी के दावे की जमीनी हकीकत क्या है.

बहुत कम लोगों को यह ज्ञात होगा कि फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव से 3 महीने पहले ही यूपी में सपा-बसपा वोटों का गठबन्धन सामने आ चुका था.

उत्तरप्रदेश के कानपुर देहात जनपद की सिकन्दरा सीट पर लगभग 3 लाख 22 हज़ार वोट हैं. मार्च 2017 में भाजपा के मथुरा पाल उस सीट पर 87 हज़ार 879 वोट पाकर विजयी हुए थे.

बसपा के महेंद्र कटियार 49 हज़ार 776 वोट पाकर दूसरे और सपा की सीमा सचान 42 हज़ार वोट पाकर तीसरे स्थान पर थीं. अर्थात सपा बसपा को मिलाकर कुल वोट मिले थे 91 हज़ार 776 यानि भाजपा से लगभग 4 हज़ार वोट ज्यादा.

यहां उल्लेखनीय यह है कि इसमें कांग्रेस के वोट भी शामिल थे, क्योंकि उसका सपा से गठबन्धन था.

जुलाई 2017 में मथुरा पाल का निधन हो गया था परिणामस्वरूप दिसम्बर 2017 में उपचुनाव हुआ था. जिसमें भाजपा को 73 हज़ार 284, सपा को 61 हज़ार 423 और कांग्रेस को 19 हज़ार 090 वोट मिले थे.

बसपा क्योंकि उपचुनाव नहीं लड़ती इसलिए मैदान में नहीं थी. और कांग्रेस का सपा से गठबन्धन टूट चुका था.

अब समीकरण समझिये.

दिसम्बर 2017 में कांग्रेस को मिले 19 हज़ार मतों में से 4000 मत यदि प्रत्याशी के व्यक्तिगत प्रभाव वाले मत मान लिए जाएं तो भी मार्च 2017 में सपा को मिले 42 हज़ार मतों में कांग्रेस के 15 हज़ार मत तो शामिल ही थे.

अर्थात 42 हज़ार में सपा का मत 27 हज़ार ही था.

क्योंकि दिसम्बर 2017 में बसपा मैदान में नहीं थी तो सपा को मत मिले थे 61 हज़ार 423, सपा को मार्च 2017 की तुलना में दिसम्बर 2017 में लगभग 34000 वोट किस पार्टी के मिले थे?

आखिर यह बढ़े हुए मत किस पार्टी के थे?

क्योंकि मार्च 2017 में कुल 1 लाख 93 हज़ार 753 और दिसम्बर 2017 में कुल 1 लाख 63 हज़ार 443 वोट पड़े थे, अर्थात 30 हज़ार कम.

इसीलिए भाजपा को भी 87 हज़ार से लगभग 14 हज़ार कम वोट मिले थे और बसपा को मिले 49 हज़ार वोटों में से लगभग 34 हज़ार वोट ही सपा को मिले थे.

सपा को नहीं मिले यह 13 हज़ार वोट वो थे जो करोड़ों में बसपा का टिकट खरीदने वाले प्रत्याशी पार्टी के बजाय अपने दमखम पर पाते हैं.

दिसम्बर 2017 में ना तो मायावती ने कोई एलान किया था. ना ही कोई औपचारिक-अनौपचारिक गठबन्धन हुआ था. इसके बजाय मायावती समेत पूरी बसपाई फौज अखिलेश समेत सपाई फौज को तब भी कोस रही थी, गरिया रही थी.

अतः सपा को वोट ट्रांसफर करा देने का करिश्माई जादू कर दिखाने वाली जादूगरनी सिद्ध कर के मायावती के गुणगान में जुटी ‘आसमानी’ एडिटरों/ एंकरों/ पत्रकारों की तिकड़ी चुनावी राजनीति के वोट गणित का ककहरा पहले पढ़े और सीखे.

फिर यह सच स्वीकारने का साहस दिखाए कि सपा-बसपा या फिर ऐसे किसी भी भाजपा विरोधी गठबन्धन के समर्थन में वो मुस्लिम वोट आंख बंद कर के एकजुट/ लामबंद होता है जिसकी संख्या उत्तरप्रदेश में 15 से 20% तक है.

मुस्लिम मतदाताओं के इस घोर कट्टर साम्प्रदायिक मतीय ध्रुवीकरण पर मायावती के करिश्मे का झूठा पर्दा डालने का दुष्प्रयास बन्द करे ‘आसमानी’ एडिटरों/ एंकरों/ पत्रकारों की तिकड़ी.

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