सबसे अधिक महसूस होता है अपनों का दिया दर्द

एक बार किसी ने संघ शिक्षा वर्ग में खाने के दौरान जली हुई रोटी मिलने की शिकायत की और नाराजगी दिखाई.

वर्गाधिकारी ने भोजन प्रमुख के ध्यान में तो ये बात लाई पर साथ ही स्वयंसेवकों से कहा कि एक बार इस देश के एक बड़े राजनैतिक संगठन के सेवा-दल का दिल्ली में एक अधिवेशन रखा गया था. युवाओं को रिझाने के लिये वहां शराब, शबाब और कबाब सबका इंतजाम था. पर अधिवेशन भी असफल हुआ और वो सेवा-दल भी काल-कवलित हो गया.

जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्वयंसेवकों को पिछले अस्सी सालों से यही जली हुई रोटी और सूखी सब्जी खिलाकर यहाँ तक पहुँचा है और समाज और राष्ट्र जीवन के लगभग हरेक क्षेत्र में स्वयं को ऊँचाइयों पर स्थापित किया है.

संघ के साथ जो बंधता है उसे हिंदुत्व का आदर्श संघ से जोड़ता है इसलिये हरेक स्वयंसेवक खुद को संघ विचार-परिवार के हर अनुषंगी संगठन के साथ खुद को जोड़ लेता है.

“एक ध्येय के पथिक विविध हम, एक दिशा में हों प्रयासरत” का भाव लिया वो स्वयंसेवक, ‘विचार-परिवार’ के हर अनुषंगी संगठन और उसके लोगों से भी वही अपेक्षा रखता है जो उसे बचपन से संघ की शाखाओं में सिखाया गया.

वो कल्पना ही नहीं कर सकता कि उसके इस बड़े परिवार का कोई संगठन या सदस्य कभी राष्ट्र-हित या हिन्दू-हित के विपरीत भी जायेगा.

पांचजन्य और ऑर्गेनाइजर के अंकों को पढ़िए कि कैसे उसमें भाजपा को हिंदुत्व की राजनैतिक अभिव्यक्ति के रूप में चित्रित किया जाता रहा है.

“राम-राज्य की कल्पना भाजपा के सत्तासीन होने से ही पूर्ण होगी” इस उम्मीद में स्वयंसेवकों की पीढ़ियाँ जवान हुई है.

देवेन्द्र स्वरुप जैसे बुजुर्ग चिंतक ने अटल जी के प्रथम राज्याभिषेक को राम के राज्याभिषेक से जोड़ कर देखा था और पांचजन्य के “मंथन” स्तंभ में उसे हज़ारों-लाखों स्वयंसेवकों ने पढ़ा.

हर स्वयंसेवक यही समझता है कि हमारा एक स्वयंसेवक भले राजनीति करने गया है पर वहां वो केवल नट की भूमिका में है जहाँ उसे अपना किरदार निभाना है और वापस आ जाना है. राजनीति की गंदगी, सत्ता की रंगत, वैभव और ताकत का रौब उसे अपनी प्रतिज्ञा विस्मृत करने नहीं देगी.

पर ये सब उम्मीदें जब कुम्हलाने लगती है तो उसका आक्रोश प्रकट होता है जिसे आप नरेश अग्रवाल प्रकरण समेत अनेक अवसरों पर देख चुके हैं.

आप पूछ्ते हैं न कि बाकी पार्टी के समर्थक तो अपने पार्टी के निर्णयों पर हल्ला नहीं मचाते तो ये भाजपा समर्थक खेमा क्यों अपने पार्टी के निर्णयों के खिलाफ ऐसा करने लगते हैं?

इस प्रश्न का उत्तर इस लेख में है. वो उधम इसलिये मचाने लगता है क्योंकि उसे लगता है कि उधर अभिनय करने गया किरदार अब उसमें रम गया है.

वो उधम इसलिये मचाता है क्योंकि उसे लगता है कि प्रयोग तक तो तो ठीक है पर शंका इनकी नीयत पर है.

वो उधम इसलिये मचाता है क्योंकि उसे प्रतिज्ञित स्वयंसेवकों द्वारा अपने मूल लक्ष्य के विस्मरण की बात कचोटती है.

वो उधम इसलिये मचाता है क्योंकि उसे लगता है कि केरल से लेकर कश्मीर और नागालैंड से लेकर कच्छ के रन तक और फिर मणिपुर, त्रिपुरा, झारखंड और छतीसगढ़ के बीहड़ों से लेकर कश्मीर और केरल तक के राष्ट्रविरोधी इलाकों में अपना जीवन होम करते दधीचि बने संघ और उसके अनुषंगी संगठनों के प्रचारकों ने विचार-परिवार को स्थापित करने के लिये इसलिये अपनी अस्थि नहीं गलाई थी कि उन हड्डियों से असुरों का विनाश न कर उनका पोषण किया जाये.

गुरूजी गोलवलकर कहा करते थे कि अगर हिन्दू ही हिंदुत्व और राष्ट्र के हितों के विरुद्ध कार्य करने लग जायेगा तो फिर उसमें मेरी क्या रूचि रह जायेगी. यही इस मूल प्रश्न का जवाब है.

सार-संक्षेपण ये है कि अगर आपकी रूचि उसमें नहीं है जिसके लिये स्वर्ग में बैठे पूज्य डॉक्टर हेडगेवार, पूज्य गुरूजी, पूज्य देवरस और श्यामाप्रसाद मुख़र्जी आपकी ओर देखते थे तो फिर हमारी शिकायत आपसे रहेंगी ही.

हमारे शास्त्रों ने कहा है “अपनों का दिया दर्द सबसे अधिक महसूस होता है”… बाकी देश तो अपना चल ही रहा है…

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