खजुराहो : तथ्य और परिकल्पना – 1

खजुराहो के मंदिर दर्शकों को विस्मित करते हैं. मंदिरों के संबंध में मन में कई प्रश्न उठते हैं. मंदिरों के रहस्य को समझने के लिये भारतीय अध्यात्म के रहस्यवादी पक्ष को जानना होगा. योग तंत्र के ग्र॔थों में कई सूत्र मिलते हैं, जिनसे खजुराहो के मंदिरों के रहस्य को जाना जा सकता है.

खजुराहो के मंदिर चंदेल राजाओं बनवाए थे. चंदेलों के कुल गुरू थे गुरू अमरा(गुरू अमरनाथ). गुरू अमरा नाथ संप्रदाय की रहस्यवादी शाखा से संबंधित थे. खजुराहो भारतीय अध्यात्म के रहस्यवादी शिक्षण का केन्द्र था.

वहाँ शैवों और शाक्तों की प्रधानता तो थी साथ ही बौद्ध, जैन, वैष्णवों को भी स्थान दिया गया था. मंदिर यथार्थ में गुरूकुल थे.

खजुराहो के मंदिर रहस्यमार्गी साधना के शोध और शिक्षण के केन्द्र रहे. चूंकि रहस्यमार्गी साधना गुह्य श्रेणी में रही है. अतः संभव है कि वे मंदिर भी गोपनीय रहे हों. क्योंकि तत्कालीन साहित्य इतिहास में इन मंदिरों का विशेष वर्णन नहीं मिलता. शक्ति ऊर्जा से संबंधित शोध संस्थानों के संबंध में आज भी गोपनीयता का पालन होता ही है.

योग में वज्रौली साधना का वर्णन है. जिसमें विशेष प्रक्रिया से शरीर को इस योग्य बनाया जाता था, कि गुप्त इंन्द्रिय द्वारा जल को बाहर से भीतर की तरफ ऊपर की ओर खींचने का अभ्यास किया जाता है.

इस साधना का उद्देश्य क्षुब्ध पतन की ओर अग्रसर वीर्य रज को स्खलित होने से रोक कर, ऊर्ध्वरेता बना लिया जाये. इस साधना के सिद्ध होने पर देह दिव्य हो जाती है. तथा साधक मौत को जीत लेता है. अनंत काल तक अमरता पा लेता है, ऐसा कहना शास्त्र सम्मत शायद न हो. भीष्म की तरह इच्छा मृत्यु का अधिकारी हो जाता है. कहना ठीक होगा.

योग में कहा गया है कि बिंदु रक्षण से जीवन, बिंदु पतन से मृत्यु. वीर्यपात से मृत्यु हुई हो, ऐसा देखने सुनने में नहीं आता. कोई अमरता पाया व्यक्ति भी नहीं दिखता.

बिंदु रक्षण के सूत्र किस परिस्थिति के लिए कहे गये होंगे, सहज समझ में नहीं आते. उसके लिये योग और तंत्र की विशेष जानकारी और समझ चाहिये.

तंत्र में चक्र अनुष्ठान का वर्णन मिलता है. जिसमें विशेष योग्यता पाये साधक और साधिकाओं को संभोग के द्वारा सिद्धत्व पाने का वर्णन मिलता है. पुरुष साधक इस प्रक्रिया में सफल होने पर सिद्ध, भैरव की उपाधि पाते थे. और स्त्रियां योगिनी, भैरवी की उपाधि पाती थीं.

प्राचीन काल में छह वर्ष की आयु के बालकों को ग्राम या नगर के निकट की पाठशालाओं में प्राथमिक शिक्षा के लिये भेजा जाता था. बारह वर्ष की आयु में प्राथमिक शिक्षा के बाद बालकों का मूल्यांकन, परीक्षण, और वर्गीकरण किया जाता था.

बालक की रुचि भविष्य में वह किस क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त करेगा, ऐसी संभावनाओं का विचार उसके अनुकूल विषय से संबंधित गुरूकुल में भेजा जाता था. इस प्रक्रिया में शिष्य गुरू या गुरूकुल का चयन नहीं करता था. बल्कि गुरू या गुरूकुल शिष्यों का चुनाव करता था.

रहस्यमार्गी साधना शिक्षण अत्यंत दुर्गम जोखिम से भरी होती है. अतः इस क्षेत्र में विशेष क्षमतावान छात्रों का चयन होता था. छात्रों की क्षमता संभावनाओं को जानने के लिये सामुद्रिक शास्त्र, ग्रह ज्योतिष आदि का आश्रय लिया जाता था. स्त्रियों के लिये विशेष शिक्षण के लिये अलग व्यवस्था होती थी.
क्रमशः

– शत्रुघ्न सिंह

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