क्या आज के डिजिटल युग का मुकाबला कर सकती है हमारी अर्थव्यवस्था?

एक मित्र ने प्रश्न पूछा है कि क्या ऑटोमेशन के कारण विश्व बाज़ार आर्थिक अराजकता की ओर बढ़ रहा है?

वे लिखते है कि ऑटोमेशन के अपने ही खतरे हैं, एक तरफ लोग रोज़गार से जा रहे हैं दूसरी तरफ नौकरियां भी नहीं होंगी.

वे पूछते है कि अगर विक्रेता की आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने लगेगी तो ग्राहक की भी होगी और फिर नए ग्राहक आयेंगे कहाँ से?

केवल नौकरीपेशा लोगों के बल पर बिज़नेस चल सकता है? और जब बिज़नेस ही न रहेंगे तो नौकरियां रहेंगी क्या?

यह समय की आवश्यकता है कि हम सबको इन ज्वलंत विषयों पर विचार करना चाहिए. मैंने फेसबुक का हिंदी अकाउंट अपनी असली पहचान से इसीलिए खोला था.

आज की तकनीकी – इंटरनेट, सेल फ़ोन, कंप्यूटर – समय और दूरी को ध्वस्त करके 12000 किलोमीटर दूर बैठे हम दोनों को कनेक्ट करती है.

जैसा कि वे मित्र लिखते है – और जो सही भी है – रिटेल स्टोर, बड़े स्टोर, और छोटे बड़े मैन्युफैक्चरर संकट में है. तो फिर ऐसा क्यों है कि अमेरिका, जर्मनी, नेदरलैंड, स्विट्ज़रलैंड, जापान, कोरिया इत्यादि देश लगभग शत-प्रतिशत रोजगार के कगार पर है.

इन देशों में रोजगार उपलब्ध है, लेकिन कर्मचारी नहीं मिल रहे है? क्या वे सब के सब रोजगार केवल उद्योगों या आईटी में है?

नहीं. पुराने तरीके के रिटेल बंद हो रहे है और नए रिटेल, रेस्टोरेंट, सर्विस सेक्टर के उद्यम उनकी जगह ले रहे है.

लेकिन ऐसे कौन से नए रिटेल स्टोर है जो अभी भी चल रहे है तथा चलते रहेंगे?

अभी भी किराना, सब्जी, महिलाओं के कपड़े, असली और नकली गहने (फैशन एसेसरी), स्टेशनरी, जूते, मिठाई, चश्मे, दवाई, मकान बनाने का सामान इत्यादि वस्तुएं रिटेल में बिकेंगी क्योकि अगर बच्चे को पेंसिल या कॉपी चाहिए, आप के घर के लिए बल्ब चाहिए, तो आप अमेज़न से मंगाने का इंतज़ार नहीं कर सकते.

लेकिन सेल फ़ोन, टीवी, ब्रांडेड कंप्यूटर या लैपटॉप, ब्रांडेड जूते, पुस्तकें इत्यादि ऑनलाइन खरीदे जायेंगे और रिटेल बिक्री में कमी आएगी. लेकिन इसमें भी नए बिज़नस की संभावनाएं हैं.

देखते-देखते मेरे घर के पास वाली मॉल में हर सेल फ़ोन की दूकान में एक फोन रिपेयर वाला बैठने लगा है. रोज़ उसके पास भीड़ लगी रहती है और उसके द्वारा दुकानदार भी नए सेल फ़ोन बेच ले जाता है.

लेकिन इस युग से निपटने के लिए हमारी – हम भारतीयों की – क्या तैयारी है? क्या इस युग से हम पुरानी टैक्स व्यवस्था के द्वारा सामना कर सकते थे? या फिर कैश इकॉनमी के द्वारा? क्या सभी भारतीयों के पास बिना बैंक अकाउंट के हम उनसे बिज़नस कर सकते थे?

गर्मियों में हमारे स्थानीय किसान बाज़ार – जिसमें केवल किसान ही स्टाल लगा सकते है – में कुछ वर्ष पूर्व कई दुकानों में केवल कैश चलता था और हम उन्हें छोड़कर कहीं और या सुपरमार्केट चले जाते थे. आज सभी किसान डिजिटल पेमेंट लेते है और हमारे आलू, प्याज भी वहीं से आते हैं.

अगर आप अपनी रिटेल दुकान में ठीक से टैक्स नहीं देते, सड़क पर एनक्रोचमेंट कर रखा है, तो आपसे म्युनिसिपलिटी वाला, पुलिस वाला, टैक्स वाला इत्यादि सब घूस मांगेगे. उस घूस की भरपाई आप ग्राहक से महंगा सामान बेचकर वसूलेंगे.

इस दुष्चक्र से निकलने का और इस डिजिटल युग से निपटने का केवल एक ही उपाय है कि आप जीएसटी और कैशलेस इकॉनमी को अपनाइए और जो भी आप से घूस मांगने आए, उसको सीधे-सीधे ना बोलिए. प्रताड़ित करने पर Facebook पर लिखिए, प्रधानमंत्री जी को लिखिए.

हमारा प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या हमारी अर्थव्यवस्था आज के डिजिटल युग का मुकाबला कर सकती है? अगर नहीं तो उसके लिए क्या व्यवस्था करनी चाहिए? तभी प्रधानमंत्री मोदी राजनैतिक खतरा मोलकर कैशलेस इकॉनमी, GST, आधार, जन-धन अकाउंट, दिवालिया कानून इत्यादि लेकर आये है.

हमें यह भी पूछना चाहिए कि क्या हम ऐसी रिटेल दुकान में जाने को तैयार हैं जहां पार्किंग की जगह नहीं मिलती; बेतरतीब सी व्यवस्था रहती है; मक्खियां भिनभिनाती रहती हैं; पास में साफ़ सुथरे टॉयलेट की फैसिलिटी नहीं है.

क्यों महिलाएं उस उस शॉपिंग कॉम्पलेक्स में जायेंगी? अगर आप को इस युग में ग्राहक चाहिए, तो न केवल आपको बेहतर उत्पाद रखना होगा, बेहतर सर्विस देनी होगी, बल्कि आसपास का माहौल भी साफ सुथरा रखना होगा.

इसके अलावा अगर मुझे कोई वस्तु पसंद आ गई और मेरे पास कैश नहीं है तो मैं क्रेडिट कार्ड से पेमेंट करके उसे तुरंत खरीदना चाहूंगा. अगर आप क्रेडिट कार्ड से पेमेंट नहीं लेते हैं कि यह आपका ही नुकसान है.

आप याद कीजिये कि जब कंप्यूटर लाने की बात हुई तो रेलवे, बैंक इत्यादि क्षेत्रों में लंबी हड़ताल चली थी कि लोगो की नौकरियां चली जाएगी. आज क्या स्थिति है?

इसी प्रकार से अनगिनत उदाहरण मैं आपको दे सकता हूँ जब रजवाड़े और उद्यम चले गए और नए उद्यम और अवसर उभर के आये.

मैंने पहले भी लिखा था, फिर भी नए मित्रो के लिए दोहरा रहा हूँ. हम द्वितीय मशीन युग में रह रहे है. मशीनों और कृत्रिम बुद्धि इतनी विकसित हो गयी है कि सॉफ्टवेयर से संचालित मशीने – जिन्हे हमने बनाया है – अब हमारा स्थान ले सकती हैं और हमारे बिना काम कर सकती हैं, यहाँ तक कि हमसे बढ़िया निर्णय ले सकती हैं.

प्रथम मशीन युग स्टीम इंजन के अविष्कार के साथ 18वीं सदी के आखिरी सालों से शुरू हुआ, जब मशीनी ताकत ने मनुष्यों की शारीरिक क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया.

मशीनों ने मांसपेशियों की सीमाओं को पार करना संभव किया और कारखानों में बड़े पैमाने पर उत्पादन और जन परिवहन के लिए रेलवे का विकास किया.

बाद के अविष्कार मनुष्य की शारीरिक क्षमता बढ़ाते गए. लेकिन, गौरतलब बात यह है कि इन औद्योगिक गतिविधियों और शारीरिक श्रम को मनुष्य ही नियंत्रित करते थे.

लेकिन द्वितीय मशीन युग में डिजिटल प्रगति हर डेढ़ वर्ष में हमारी मानसिक क्षमताओं को दुगना कर रही है, इस हद तक कि कुछ वर्षों में कई गतिविधियों के लिए मानवीय श्रम की ज़रूरत ही नहीं रहेगी.

उदहारण के लिए बिना ड्राइवर के कार और ट्रक चलेंगे, फैक्ट्री को इंटेलीजेंट रोबोट्स चलाएँगे, एकाउंटिंग और फाइनेंशियल डील कंप्यूटर करेंगे, रूटीन खबरें और विश्लेषण कंप्यूटर लिखेंगे, इत्यादि.

जैसा कि मैं लिखता आया हूँ, यह समय रचनात्मक विनाश का युग है. बिना पुरानी व्यवस्था को बदले नयी व्यवस्था, नए उद्यम और रोज़गार का सृजन नहीं हो सकता.

और प्रधानमंत्री जी यह बात बखूबी समझ रहे हैं कि यह युग रचनात्मक विनाश का है. इस से निपटने के लिए वह भी रचनात्मक विनाश कर रहे हैं – भारत के अभिजात्य वर्ग का; सड़ी गली व्यवस्था का.

प्रथम मशीन युग ने मानवीय रिश्तों को बदल दिया, महिलाओं को स्वतंत्रता मिली, फैशन बदल दिया. द्वितीय मशीन युग का हमारी जिंदगी और रिश्तों पर क्या असर होगा?

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