HIV की तरह अब यह भी लाइलाज नहीं

हम तो अब तक यही जानते थे कि एचआईवी का कोई इलाज नहीं, पर अभी कुछ दिन पहले ही Quora पर पढ़ा कि इसका तो इलाज है. बस एक ही बड़ी परेशानी है और वो यह है कि अगर आपकी उम्र 120 साल तक होगी तो ही आप एचआईवी के विषाणु को पूरी तरह ख़त्म कर सकते हैं कुछ दवाइयों के माध्यम से.

बात को थोड़ा विस्तार देता हूँ, वर्तमान में वैज्ञानिकों ने एचआईवी के उपचार के लिए इस्तेमाल की जाने वाली बहुत सारी दवाइयाँ बना ली हैं. ये दवाइयाँ विभिन्न तरीकों से काम करते हैं, कुछ विषाणु को सेल (cell) में प्रवेश करने से रोकती है, कुछ मल्टिप्लाई होने से और कुछ को हमारे सेल के डीएनए के साथ जुड़ने से रोकती हैं.

इन सभी तरीक़ों से एक ही लक्ष्य प्राप्त होता है और वो ये कि ये एचआईवी विषाणु के जीवन चक्र को बाधित करते हैं ताकि वह अन्य कोशिकाओं को पुन: उत्पन्न और संक्रमित नहीं कर सके. फिर हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली अपना दमख़म दिखाती है और उन उफनते विषाणुओं को कुचल देती है.

मने हमारी इन वर्तमान दवाइयों के साथ, हम वास्तव में एचआईवी विषाणु को मार सकते हैं, तो फिर क्यों यह अभी भी असाध्य है?

इसका कारण यह है कि पहले कुछ हफ्तों के दौरान जब एक व्यक्ति एचआईवी से संक्रमित होता है, तो बहुत से विषाणु शरीर में कई अलग-अलग कोशिकाओं में छिप जाते हैं. इसे संक्रमण जलाशय कहा जाता है.

समस्या तब होती है जब विषाणु छुप जाता है और हमारी दवाएं उसे ढूँढ नहीं पाती. कहने का अर्थ यह है कि ये विषाणु हमसे गौरिल्ला युद्ध करते हैं, ये छुप कर वार करते हैं, इसलिए भले ही हमारे द्वारा ली गई दवाएं खून में तैर रहे विषाणु को ख़त्म कर दे, पर मौक़ा मिलते ही ये विषाणु संक्रमण को ज़िंदा रखने के लिए उनके छुपे स्थान से फिर निकल आएंगे.

कह लीजिए ये एक तरह से स्लीपर सेल होते हैं, जो चुपचाप संक्रमण को ज़िंदा रखने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते हैं. स्लीपर सेल तो समझते हैं ना आप……

अच्छा कुछ मेरे जैसे बहुत ही चतुर गणितज्ञों ने गणना की है कि अगर कोई व्यक्ति एचआईवी से संक्रमित हो जाता है और 30 साल का होने पर दवाइयाँ लेनी शुरू कर देता है, तो सभी विषाणुओं को उनके बिल से निकाल कर उनका ‘झींगा लाला टिल डेथ’ करने में तक़रीबन 120 साल की उम्र तक पहुँचने जितना समय लगेगा. मने जब वह 120 साल का होगा तो पूर्णतः स्वस्थ होगा.

दूसरा तरीक़ा है, जैसे भई एचआईवी विषाणु को मारना तो हम जानते हैं, पर समस्या यह है कि उसे उसके छुपे हुए बिल से बाहर निकलने के लिए कैसे ललचाएँ?

डॉक्टरी भाषा में, इसे “किक एंड किल” दृष्टिकोण कहा जाता है, हमें विषाणु को उसके छिपने के स्थानों से निकालना होगा और फिर…… ढिस्क्याऊं.

मने इन विषाणुओं के स्लीपिंग सेल को बाहर निकाल कर कैसे पेले (यहाँ पेले का अर्थ पेलने/छेतने से है, इसे महान फ़ुट्बॉलर पेले उर्फ़ ब्लैक पर्ल ना समझा जाए)

अच्छा स्लीपिंग सेल से याद आया, कुछ लोगों के साथ आप वर्षों से रह रहे होते हैं और अचानक आपको पता चलता है अरे साला यह तो वामी निकला. मने जो आपके चारों तरफ़ अत्यंत व्यवहार कुशलता के साथ सालों से शुगर कोटेड शब्दों का जाल बिछा रहा था, जो आपके आस पड़ोस में ही बैठ कर लोगों को समझाता था कि सदियों से आपका धर्म, संस्कृति व सभ्यता आपसे क्या-क्या छीनते आ रहे हैं.

आपके संस्कार व सामाजिक मूल्य कैसे आपकी व्यक्तिगत आज़ादी का ह्रास कर रहे हैं. यह सब वह बहुत ही तार्किक रूप से विभिन्न प्रकार के उदाहरणों के द्वारा आपको ऐसे समझाता है कि आप बुरा लगते हुए भी लिहाज़ में कुछ कह नहीं पाते.

आपको यह किंचित भी भान ही नहीं होता था कि आपके सामने वाला नास्तिकता से होते हुए कब राष्ट्रद्रोह के पायदान पर क़दम रख चुका है. पर वह यह सब इतना शातिराना तरीक़े से करता है कि आपको कुछ पता नहीं चलता और जब पता चलता है तो आप भौचक…..

बताओ अच्छा भला लौंडा वामी हो गया…. सच में हाल ही में मुझे भी ऐसे ही शॉक लगा जानकार. सुसरे सुरसुली से पड़े रहते हैं आपके पास चुपचाप अत्यंत सभ्य से बन कर और आपको लगता है बहुत बढ़िया व तगड़ा बुद्धिजीवी आदमी है.

सुनो भाई इन्हें बाहर निकालने के लिए वायब्रेशन जनरेट करना पड़ता है, तभी यह अपनी स्लीपिंग सेल से बाहर निकलेगा…… तो साहब इन्हें बाहर निकालने के लिए you have to lure them with a vibrator in hand and words, you know what I mean….

– सुकेत राजपाल त्यागी

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