आपको करना है यह चुनाव

वैसे तो हर राजनैतिक दल की एक ही मंज़िल होती है और वह होता है चुनाव में जीत कर सत्ता में आना और अपने कथानक को विधि व संविधान की ओट में फलीभूत करना.

1947 के बाद से ही कांग्रेस और उसके साथ जुड़े वामपंथियों और सेक्युलर दलों ने अपनी ही चलाई है और सात दशकों में अपनी विचारधारा, जिसमें राष्ट्रवाद व हिंदुत्व दोनो ही नेपथ्य में थे, कई पीढ़ियों से मज़बूती दी है.

आज भाजपा भी इस मज़बूत कथानक को छिन्न भिन्न करने के लिये फिर से सत्ता में आना चाहती है.

उसे 2019 में by hook by crook सत्ता में वापिस आना है क्योंकि यह केवल उसके अस्तित्व का प्रश्न नहीं है बल्कि यह उसके विरोधियों के अस्तित्व का प्रश्न है. यह कोई साधारण चुनाव नहीं है, यह युद्ध है, महायुद्ध है.

आज बात इसकी है ही नहीं कि कौन कितना निकृष्ट आता है, बात इसकी है किसको, किस वक्त और किन परिणामों की अपेक्षा लिये लाया जा रहा है.

यह जो सारी उठा पठक हो रही है वह उन निकृष्टों के चरित्र में आये बदलाव को लेकर नहीं हो रही है. यह मालूम है कि निकृष्ट है लेकिन यह भी मालूम है कि जनता, जो वोट देती है उसमें भी सभी साधु और ज्ञानी नहीं हैं.

ये निकृष्ट लोग वर्षो से राजनीति के क्षत्रप इसी लिये बने रहे हैं क्योंकि जनता के एक वर्ग को यही निकृष्ट पसन्द है.

यह सर्वविदित है कि जनता का बड़ा वर्ग आज भी जाति, क्षेत्र और निजी स्वार्थ के लिये वोट देता है. उसको न राष्ट्र से मतलब होता है और न हिन्दू से ही मतलब होता है.

यह ठीक उसी तरह से कि भारत मे जितने भी आक्रांता आये और उन्होंने यहां राज किया था, वे यहीं के हिन्दू राजाओं के सहयोग और सन्धियों के सहारे ही यहां पैठ बना पाए थे. यह हिन्दू पहले भी थे और आज भी है.

यह जो आज दिख रहा है, वो इस विश्वास पर किया जा रहा है कि 2019 का चुनाव भाजपा बनाम विपक्षी गठबंधन से होगा और ऐसा हुआ तो भाजपा सबसे ज्यादा वोट शेयर लेकर भी 150 के नीचे सिमट जाएगी.

अब यह हमारी शुचिता, सिद्धान्तों और आदर्शों को तय करना है कि वो सत्य बन कर चिरकाल तक अश्वत्थामा बनकर, इसाईस्लाम के संयुक्त शासन के जंगल मे भटकते घूमते रहना है या फिर अपने पर दाग लगा कर, अपने शत्रुओं का समूल नष्ट करते हुये राष्ट्रवादी व हिंदुत्वादी लक्ष्यों को पूर्ण रूप से प्राप्त करना है.

यह चुनाव आपको करना है.

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