अच्छा हुआ कि खुल गई मुट्ठी : भाग-1

गोरखपुर और फूलपुर के लोकसभा उपचुनाव का परिणाम आ चुका है. सपा बसपा गठबंधन ने दोनों उपचुनाव जीत भी लिए हैं.

23 वर्षों बाद हुए इस गठबंधन को मिली सफलता का डंका भी मीडिया में, विशेषकर न्यूज़ चैनलों में ज़ोर-शोर से बज रहा है तथा 2019 के आम चुनाव में भाजपा की जीत की संभावनाओं की श्रद्धांजलियां अभी से लिखी जा रही हैं.

गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में इस गठबंधन की मुट्ठी का खुलना सबसे महत्वपूर्ण है.

आइए जानिए कि उपरोक्त गठबंधन के दम पर लिखी जा रही 2019 में भाजपा की जीत की श्रद्धांजलियों में कितना दम है.

पहले बात फूलपुर की क्योंकि यह भाजपा के लिए सर्वाधिक कठोर तथा सपा-बसपा के लिए सर्वाधिक सरल कसौटी वाली सीट है.

आज़ादी के बाद पहली बार 2017 में ही भाजपा इस सीट पर विजयी हुई थी. 2009 में मात्र 44 हज़ार 828 वोट पाकर पांचवें नम्बर पर थी और उसकी जमानत जब्त हुई थी.

2014 तक फूलपुर में हुए 16 लोकसभा चुनावों में से 15 में भाजपा की ज़मानत जब्त हुई थी. प्रचण्ड रामलहर और अटल लहर में भी इस सीट पर सपा का ही सिक्का चलता रहा था.

2014 में जब 51% वोटिंग हुई थी तब सपा और बसपा अलग अलग लड़े थे, अर्थात अपनी पूरी ताकत से. तब दोनों के प्रत्याशियों को मिलाकर कुल 3 लाख 58 हज़ार 966 वोट ही मिले थे.

आज आये परिणामों में दोनों के गठबंधन को 3,42,756 वोट मिले हैं. अर्थात उनके गठबंधन में कोई कमी नहीं रही. उसे पिछली बार से केवल 16 हज़ार वोट कम मिले हैं.

इस बार अतीक और कांग्रेस को मिलाकर कुल 62 हज़ार वोट और हैं. तो पिछली बार कांग्रेसी उम्मीदवार कैफ भी 58 हज़ार वोट पाया था. यदि इन वोटों को भी जोड़ दिया जाए तो गठबंधन की लीड लगभग 1 लाख 20 हज़ार की हो जाएगी.

पिछली बार की तुलना में इस उपचुनाव में लगभग सवा 2 लाख वोट कम पड़ा है. भाजपा समर्थक कहे जाने वाले शहरी इलाकों में मतदान 20 से 25% ही रहा.

और सबसे बड़ा अन्तर यह है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा के सबसे बड़े ब्रह्मास्त्र नरेन्द्र मोदी का इन चुनावों से तथा अमित शाह का इन चुनावों के प्रबंधन से कोई लेना देना ही नहीं था.

आज आये चुनाव परिणाम के बाद मैं आश्वस्त हूं कि 2019 में फूलपुर लोकसभा में भाजपा की विजय सुनिश्चित है.

अब बात गोरखपुर की.

1989 में महंत अवैद्यनाथ की विजय के साथ इस सीट पर शुरू हुआ भाजपाई विजय का सिलसिला भले ही 29 वर्ष बाद आज टूटा हो. लेकिन गोरखपुर भाजपा का गढ़ कभी नहीं रहा. 2017 से पहले यहां विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत का आंकड़ा 1-2 सीटों तक ही सीमित रहता था.

महंत अवैद्यनाथ भी कभी एक लाख से अधिक वोटों से नहीं जीत सके. उनकी जीत आंकड़ा हमेशा एक लाख से कम ही रहा.

स्वयं योगी ही इस सीट पर…

1998 में पहली बार 26 हज़ार 206 मतों से जीते, उन्हें मत मिले थे 2 लाख 68 हज़ार 428.

1999 में दूसरी बार योगी केवल 7 हज़ार 339 मतों से जीते, उन्हें मत मिले थे 2 लाख 67 हज़ार 382.

2004 में तीसरी बार योगी 1 लाख 42 हज़ार 309 मतों से जीते, उन्हें मत मिले थे 3 लाख 53 हज़ार 647.

2009 में चौथी बार 2 लाख 20 हज़ार 271 मतों से जीते. उन्हें मत मिले थे 4 लाख 03 हज़ार 156.

पांचवीं बार यानी 2014 अर्थात मोदी लहर में योगी का आंकड़ा पहली बार 3 लाख के पार पहुंचा था और वो 3 लाख 12 हज़ार 783 मतों से जीते. उन्ह मिले मतों का आंकड़ा भी पहली बार 5 लाख के पार पहुंचा था. उन्हें मत मिले थे 5 लाख 39 हज़ार 127.

2014 में गोरखपुर में जब 54% वोटिंग हुई थी तब सपा और बसपा अलग अलग लड़े थे, अर्थात अपनी पूरी ताकत से. तब दोनों के प्रत्याशियों को मिलाकर कुल 4 लाख 02 हज़ार 756 वोट ही मिले थे.

आज आये परिणामों में दोनों के गठबंधन को 4 लाख 56 हज़ार 437 वोट मिले हैं. अर्थात उनके गठबंधन में कोई कमी नहीं रही. उसे पिछली बार से 54 हज़ार वोट ज्यादा ही मिले हैं.

पिछली बार कांग्रेस के 45 हज़ार और AAP के 11 हज़ार वोट को मिलाकर लगभग 56 हज़ार वोट अलग पड़े थे.

इस बार AAP मैदान में ही नहीं थी और कांग्रेस को वोट मिले हैं लगभग 18 हज़ार अर्थात इस बार गठबंधन को मिले 54 हज़ार वोटों में भाजपा विरोधी वो 38 हज़ार वोट भी शामिल हैं.

इन सबके अलावा पीस पार्टी, निषाद पार्टी, भारतीय लोकदल, फलाने ढिकाने, ना जाने कौन-कौन से मोदी विरोधी छोटे-मोटे अनेक दल भी इस गठबंधन के लिए अपनी पूरी ताकत झोंके थे.

तब भी विजय मिली कुल 21 हज़ार 881 वोटों से. वह भी तब जबकि गोरखपुर में भी भाजपा समर्थक शहरी क्षेत्रों में मतदान 30% से अधिक कहीं नहीं हुआ और पिछली बार से लगभग 1 लाख 07 हज़ार वोट कम पड़े.

फूलपुर की ही तरह गोरखपुर में भी सबसे बड़ा अन्तर वही है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा के सबसे बड़े ब्रह्मास्त्र नरेन्द्र मोदी का इन चुनावों से तथा अमित शाह का इन चुनावों के प्रबंधन से कोई लेना देना ही नहीं था.

आज आये चुनाव परिणाम के बाद मैं आश्वस्त हूं कि 2019 में फूलपुर लोकसभा में भाजपा की विजय सुनिश्चित है.

क्योंकि चाहे फूलपुर हो या गोरखपुर, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी जब मैदान में उतरेगी तब नज़ारा कुछ और ही होगा.

गठबंधन की मुट्ठी और सारे पत्ते आज इस चुनाव में खुल गए हैं. लेकिन ना तो भाजपा ने अपना तुरुप का पत्ता नरेन्द्र मोदी फेंका है, ना ही अमित शाह ने अपनी मुट्ठी अभी खोली है.

इसीलिए 4 मार्च को मैंने लिखा था कि… 25 साल बाद ही सही लेकिन इस बन्द मुट्ठी का खुलना बहुत जरूरी है, जिसकी विस्तृत व्याख्या फूलपुर और गोरखपुर उपचुनाव के परिणाम वाले दिन करूंगा. इसलिए न्यूज़ चैनली प्रपंच का आनंद लीजिये और निश्चिन्त रहिये.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY