अब भी सच्चाई नहीं स्वीकारी तो इतिहास बन जाएंगी मायावती

दुनिया बदल रही है. देश बदल रहा है. समाज बदल रहा है. लेकिन अगर कोई नहीं बदल रहा है तो वह हैं मायावती.

कांशीराम के आन्दोलन से निकली मायावती ने तत्कालीन समाज को एक नयी दिशा दी थी. समाज उनके पीछे चला भी.

तभी वह कभी भाजपा के साथ गठबंधन करके तो कभी अपने बल बूते उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने और चलाने में कामयाब रहीं. नब्बे के दशक से शुरू हुई उनकी राजनैतिक पारी ने उन्हें फर्श से अर्श तक पंहुचाया.

साल 2007 में जब वह बहुमत की सरकार के साथ उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुईं तो उनके चुनाव जीतने के फार्मूले को रणनीतिकारों ने एक नाम दिया था ‘सोशल इंजिनियरिंग.’

मतलब जातिगत समीकरणों के आधार पर टिकटों का बटवांरा जिसमें आवश्यकतानुसार अगड़ी जातियों के उम्मीदवार भी बहुतायत से मैदान में उतारे गये.

प्रयोग सफल रहा और उन उम्मीदवारों ने बसपा के बेस वोट के साथ अपनी जाति के वोटों के कॉकटेल से चुनाव जीतने में सफलता हासिल की.

लेकिन एक ही ढर्रा बहुत दिनों तक कायम नहीं रह सकता. वह भी तब जब आप बहुमत की सरकार बनाकर भी कुछ बेहतर डिलिवर करने में नाकाम रहें हों.

लिहाजा 2012 के चुनाव में सत्ता विरोधी लहर के कारण उन्हे मुंह की खानी पड़ी और यूपी की बागडोर समाजवादी पार्टी के हाथों में आ गयी.

जैसे कि हर चुनाव अपने आप में अलग और यूनिक होते हैं उसी तरह 2012 में सपा के सत्ता में आने के कारण भी कुछ अलग प्रकार के थे.

अभी फिलहाल सिर्फ मायावती की बात कर रहा हूं इसलिये दो हजार बारह के चुनावों की चर्चा फिर कभी.

बहरहाल दो हजार सात के चुनावों में सोशल इंजिनियरिंग के नाम पर दलित और ब्राह्मण का जो गठजोड़ बना था वह अपने आप में अलबेला था.

ऐतिहासिक रूप से दो विरोधी ध्रुवों को एक साथ लाने में मायावती कामयाब हुई थीं. लेकिन यह कामयाबी बहुत दिनों तक स्थायी नहीं रहनी थी. क्योंकि परंपरागत रूप से दो विरोधी ध्रुव एक साथ तभी संभव थे जब दोनों को न्यूट्रिलाइज़ अवस्था में रखा जाय.

लेकिन सत्ता में रहते हुये यह कर पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी था. और वही हुआ. ये दोनों विरोधी धड़े सत्ता में एकसाथ रहते हुये भी एक नहीं हो सके.

इसका कारण भी बहुत हद तक मायावती ही थीं. दलितों का मोह वह छोड़ नहीं सकती थीं और ब्राह्मणों की महत्वाकांक्षा रोक पाना उनके बस का नहीं था.

नतीजा यह हुआ कि आगामी चुनावों तक उनके अधिकांश ब्राह्मण चेहरे उनसे पीछा छुड़ा चुके थे. एक दो जो बचे थे उनमें वह ताकत नहीं थी कि बाकी को रोक सकें.

विशेषकर वोटों के रूप में आने वाले ब्राह्मण समर्थन को बटोरने में तो वह एकदम से नाकाम थे. नतीजा, उन्हें दो हजार बारह में सत्ता गंवानी पड़ी.

दो हजार बारह में सत्ता से दूर होने पर भी अगर वह चेत जातीं तो संभव था कुछ बच जाता. लेकिन एक बार सोशल इंजिनियरिंग फार्मूले के सफल प्रयोग से उत्साहित वह बार बार उसे ही आजमाना चाहती थीं.

दो हजार चौदह के आम चुनावों में उन्होंने दोबारा इस फार्मूले का उपयोग किया. इस बार वह ब्राह्मणों के साथ मुसलमानों पर भी दांव लगा बैठीं.

लेकिन वह यह भूल गयीं थी कि इस बार चुनाव में उनके सामने मोदी जैसा व्यक्तित्व खड़ा था. जो ऐसे किसी भी फार्मूले की काट पहले से ही तलाश चुका था. नतीजा उन्हें चुनाव में शून्य तक ले गया.

संभव था कि इतनी नाकामियों के बाद वह कुछ सबक सीखें और अपनी राजनीति में कुछ बदलाव लायें. लेकिन इस बार के विधानसभा चुनावों में उन्होंने सोशल इंजिनियरिंग के तहत दलितों के साथ मुसलमानों को फिट करने की कोशिश की.

वह भी तब जबकि दो हजार चौदह में ही उनके दलित और जाटव वोटों में सेंधमारी हो चुकी थी. मुसलमानों को फ्रंट लाइन पर रखकर उन्होंने सभी वह कार्ड खेले जो एक परंपरागत राजनेता द्वारा खेले जाते रहे हैं.

लेकिन कुछ साल पहले से ही उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक हिस्सों में हो रहे सामाजिक और राजनैतिक बदलावों को वह पढ़ने में नाकाम रहीं.

इस नाकामी के कारण ही वह टिकट बंटवारे वाले दिन से ही मुसलमानों को टिकट दिये जाने की बात बार बार बतातीं रहीं. मुसलमान नेताओं और मौलवियों से फतवे हासिल किये गये.

चुनाव प्रचार के दौरान ही मुसलमान शब्द इतनी ज़्यादा बार दोहरा दिया गया कि वह सोशल इंजिनियरिंग कम तुष्टिकरण ज्यादा प्रतीत होने लगा.

उपर से सामने घाघ की तरह नज़र लगाये अमित शाह की मंडली बैठी थी. जो विरोधियों के बल को भी उनकी कमजोरी साबित करने का माद्दा रखती थी.

अपने फार्मूले के तहत मायावती ने सौ से अधिक मुस्लिम उम्मीदवार उतारे. विशेषकर मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर अनिवार्य रूप से मुसलमानों को टिकट दिया गया.

इस बात को नजरंदाज करते हुये कि वहां सपा भी मुसलमान को चेहरा बना सकती है. ऐसी दर्जनों सीटे थीं जहां सपा और बसपा दोनों ने मुसलमानों पर अपने दांव खेले. जबकि भाजपा ने एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया.

नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर भी वोटों के बंटवारे के कारण दोनों को मुंह की खानी पड़ी और भाजपा के उम्मीदवार जीतने में कामयाब रहे.

इसके अलावा पूरे चुनाव प्रचार के दौरान वह नकारात्मकता से भरी रहीं. मंचों से अपनी अच्छाईयां बताने के बजाय मोदी की बुराईयां बतायी गयीं. भविष्य में विकास का कोई प्लान बताने के बजाय उन सभी घिसेपिटे मुद्दों को हवा दी गयी जिन्हें जनता पहले ही नकार चुकी थी.

ऊपर से पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सिर्फ दलितों और मुसलमानों की बात दोहराई गयी. इससे अन्य जातियों में बसपा से दुराव हुआ. दलित पहले से ही छिटक रहे थे. मुसलमान बंट चुके थे.और अन्य जातियों को जोड़ने का कोई प्रयास ही नहीं किया गया.

नतीजा, आज मायावती की हालत ऐसी हो गयी है कि उन्हें अपनी हार का कोई वाजिब कारण भी नहीं सूझ रहा है. शायद तभी ईवीएम में छेड़छाड़ जैसी बेतुकी बातों को हवा देने की कोशिश में लगी रहीं. लेकिन इससे वह अपने कुछ समर्थकों को मूर्ख बना सकती हैं. आम जनता को नहीं.

अब नये राजनैतिक समीकरण में एक अदद राज्यसभा की सीट के लिये तीन दलों को मिलाकर नाव बना रही हैं. साथ ही फूलपुर तथा गोरखपुर उपचुनावों के आधार पर 2019 में सपा-बसपा गठबंधन की हवा भी तैरायी जा रही है.

ऐसे में भविष्य में अगर यह गठबंधन होता है तो इसका लाभ सपा और भाजपा को मिल सकता है, जबकि बसपा गठबंधन करके भी नुकसान ही उठायेगी.

इसका कारण यूपी के जातीय समीकरण तथा कमरे के अंदर बैठकर बनाये गये फार्मूले का धरातल पर उलट प्रदर्शन है. जैसा कि सभी जानते हैं कि राजनीति में दो और दो जोड़कर चार नहीं बनता उसी तरह मायावती को यह गठबंधन भी गर्त में ही ले जायेगा.

अगर वह इन बेबुनियाद बातों की बजाय सच्चाई को स्वीकार कर अब भी बदलाव को स्वीकार करते हुये अपनी राजनीति को बदलने की कोशिश करें तो संभव है कि उनके पैर कहीं राजनीति में बचे रहें. नहीं तो सामाजिक आन्दोलन के नाम पर राजनीति करके अपनी पहचान कायम करने वाली मायावती कब इतिहास बन जायेंगी किसी को पता भी नहीं चलेगा.

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