महाभारत में बच्चों के लिए क्या है?

महाभारत पर आयातित विचारधारा का आम आरोप रहा है कि ये तो सत्ता के लिए हुए संघर्ष कि कहानी है. ये पढ़ने कि मेहनत करने के बदले शोर्ट कट में टीवी देखकर महाभारत सीखने की कोशिश से होता है.

अक्सर टेलीविजन पर प्रसारण के लिए, या फिल्म की कहानी जैसा बनाने के लिए महाभारत के जो हिस्से काट दिए जाते हैं, वहीँ महाभारत की सबसे शिक्षाप्रद कहानियां हैं.

महाभारत के मुख्य माने जाने वाले चरित्रों का जिक्र शुरू होने से पहले और युद्ध के ख़त्म होने के बाद ही सबसे कम सुनी जाने वाली कहानियां होती हैं.

कई बार ऐसा भी होगा कि कहानी तो आपने सुनी होगी, लेकिन आप ये नहीं जानते होंगे कि ये महाभारत की ही कोई कहानी है.

जैसे युद्ध के बाद शांति पर्व में जब भीष्म के पास जाकर युधिष्ठिर राज्य व्यवस्था के बारे में सीख रहे होते हैं तो भीष्म सतयुग की एक कहानी सुनाते हैं.

ये कहानी एक ऊंट की थी जो अपने पूर्व जन्म में किये पुण्यों के कारण इस जन्म में भी धर्मात्मा था. जंगल में रहने वाले इस ऊंट के पास एक दिन ब्रह्मा पहुंचे और उसे वर देना चाहा.

ऊंट ने कहा कि भगवान मेरी गर्दन इतनी लम्बी कर दीजिये कि मैं सौ योजन दूर भी चर सकूँ. खाने की तलाश में भटकना ना पड़े तो मैं साधना पर और ध्यान दूं. ब्रह्मा ने कहा तथास्तु और ऊंट कि गर्दन लम्बी हो गई. गर्दन लम्बी होने से ऊंट को कहीं इधर उधर जाने कि जरूरत नहीं रही, जब चाहता गर्दन लम्बी करता और कुछ खा लेता.

इधर उधर भटकने की जरूरत ख़त्म होने से ऊंट आलसी हो गया और एक ही जगह पड़ा रहने लगा. एक दिन वो गर्दन लम्बी कर के इधर उधर खा ही रहा था कि इतने में आंधी आ गई. लम्बी गर्दन सिकोड़ने में समय लगता इसलिए बचने के लिए उसने गर्दन एक गुफा में घुसा ली.

जब वो आंधी रुकने का इन्तजार कर रहा था तो एक सियार और सियारनी ने भी उसी गुफा में आंधी से बचकर शरण ली. उन्होंने अपने सामने ही ऊंट कि गर्दन देखी तो फ़ौरन उस पर टूट पड़े! काटे जाने से बचने के लिए ऊंट ने गर्दन समेटने की कोशिश की, लेकिन जब तक वो पूरी गर्दन समेट पाता उतनी देर में तो सियार सियारनी ने मिलकर उसकी गर्दन ही काट ली !

आलसी ऊंट के मारे जाने की इस कहानी से भीष्म सिखाते हैं कि आलस्य उचित नहीं. अपने कर्मों का निर्वाह करते हुए ही, इन्द्रियों के निग्रह से, मन को इधर उधर भटकने से रोककर, सही दिशा में काम करने पर लगाना चाहिए.

अपने कर्तव्यों में से कुछ कम कर के किसी और चीज़ (जो पसंद हो, या करने की इच्छा हो), उसके लिए समय नहीं बचाया जा सकता. ये करीब करीब आत्मघाती तरीका है इस कहानी में भीष्म ने यही सिखाया था.

ये इकलौता ऐसा किस्सा हो जो बच्चों को नैतिक शिक्षा देने में काम आ जाए ऐसा भी नहीं है. जैसे पंचतंत्र में मैत्री और नीति की कहानियां हैं वैसी भी कई कहानियां महाभारत के शांति पर्व में मिल जायेंगी.

बच्चों के लायक एक कहानी एक चूहे और बिल्ली की भी है. कहानी ज्यादा रोचक इसलिए है क्योंकि कहानी में जो पांच पात्र हैं, सभी का नाम भी है. चूहे ने एक बरगद की जड़ में अपना घर बना रखा था और वहीँ डालियों में एक बिल्ली भी रहती थी. पेड़ पर आने वाले पक्षियों के शिकार से बिल्ली का गुजारा होता.

वहीँ पास में एक शिकारी भी रहता था जो रोज रात जाल लगा जाता और सुबह फंसे जीवों को बेचने-खाने से अपना गुजारा चलाता. एक रोज शिकारी जब जाल लगाकर गया तो रात में बिल्ली बेचारी उस जाल में फंस गई. बिल्ली को फंसा देखकर चूहा आराम से निकला और बिल्ली को चिढ़ाता, जाल में जो चारा शिकारी ने लगाया था उसे खाने लगा.

बिल्ली के फंस जाने से इलाके पर कब्ज़ा जमाने दूसरे शिकारी जीव आने लगे. मौके पर एक नेवला और एक उल्लू साथ ही पहुंचे और सामने उनके चूहा ही शिकार के रूप में दिखा. ऊपर उल्लू और नीचे नेवले को जब चूहे ने घात लगाए देखा तो वो फंसी हुई बिल्ली के सामने गिड़गिड़ाने लगा.

अभी तक वो जिस बिल्ली को चिढ़ा रहा था, फंसा जानकार छेड़ रहा था, उसी से मदद की गुहार लगाईं. चूहे ने कहा कि अगर अभी वो उसे अपने नीचे छुपा ले तो वो जाल काटकर बिल्ली की बचने में मदद करेगा. बिल्ली तो पहले ही फंसी हुई थी तो शर्त मानने के अलावा कोई विकल्प तो उसके पास था ही नहीं. चुनांचे बिल्ली ने अपने नीचे चूहे को छिपा लिया और चूहा भी जाल कुतरने लगा.

थोड़ी ही देर में जब चूहे का शिकार कर पाने में असमर्थ होकर जब उल्लू और नेवला इधर उधर हुए तो बिल्ली का भी ध्यान गया कि चूहा तो बहुत धीमे धीमे जाल कुतर रहा है. वो चूहे से बोली लगता है अब जान बच जाने पर तुम अपना वादा भूल गए हो!

चूहा बोला भाई मैं तेज काम नहीं करने वाला, कोई भी काम समय पर ना किया जाए तो सही फल नहीं देता. अगर मैंने तुम्हें अभी छुड़ा दिया तो तुम फ़ौरन मेरा ही शिकार करोगे इसलिए मैं सवेरे शिकारी के नजर आने पर तुम्हें मुक्त करूँगा. उस समय तुम्हें जब अपनी जान बचा के भागना होगा, तभी मुझे भी बचने का मौका मिल जाएगा.

बिल्ली ने इमानदारी और नैतिकता की दुहाई दी, कहा दोस्त तो ऐसे तरीके से वादा पूरा नहीं करते! चूहा बोला भय जहाँ हो वहां मैत्री नहीं होती, जहाँ कोई डर हो वहां तो संपेरे जैसा हाथ बचा कर ही सांप को नचाया जाता है.

ऐसे ही तर्क-वितर्क चलता रहा, चूहा धीमी गति से जाल काटता रहा और जैसे ही शिकारी नजर आने लगा उसने अपनी रफ़्तार बढ़ा कर पक्का शिकारी के नजदीक आने पर जाल काटा.

शिकारी जाल में फंसी बिल्ली को पकड़ने झपटा लेकिन जाल कट चुका था तो बिल्ली बचकर भागने में कामयाब ह गई. चूहा छोटा सा था, वो भी दुबक कर अपने बिल तक पहुँच गया.

हताश शिकारी भी अपना टूटा जाल समेट कर उसे ठीक करने चला गया. अब ऊँची डाल पर बैठी बिल्ली ने चूहे से फिर से दोस्ती गांठने की कोशिश की. दोस्ती कितनी अच्छी, कितनी महत्वपूर्ण होती है ये समझाने लगी. चूहे ने कई तर्कों का हवाला देकर उसकी दोस्ती को ठुकराया. यहाँ आपको कई महत्वपूर्ण तर्क सिर्फ बच्चों के सीखने के लिए ही नहीं अपने लिए भी मिल जायेंगे.

चूहा समझाता है कि दुनिया में दोस्त और दुश्मन कुछ नहीं होता, केवल परिस्थितियां होती हैं जिनके वश में हुआ आदमी अपने फायदे नुकसान को तौलता दोस्त या दुश्मन बनता है. दोस्त को दुश्मन, या दुश्मनों को दोस्त होते कई बार देखा गया. हर कोई अपने लाभ के चक्कर में होता है, फायदे के लालच के बिना सम्बन्ध नहीं बनते.

चूहा बिल्ली को ये भी सिखाता है कि दोनों के पास कारण था इसलिए हम दोस्त बने, लेकिन उस परिस्थिति का अंत होते ही हममें दोस्ती का कोई कारण अब बचा नहीं है. अब जो तुम्हें मुझसे दोस्ती की सूझ रही है वो तुम्हारे रात भर भूखे रहने के कारण है, मुझमें तुम्हें आहार दिख रहा है!

जिन परिस्थितियों में संधि या युद्ध होते हैं वो परिस्थितियां जैसे ही बदलती हैं, संधि या आक्रमण बेमानी हो जाते हैं. बिल्ली उसी दिन चूहे की शत्रु थी, हालात बदले तो दोस्त बनी, और फिर हालत बदलते ही दोबारा दुश्मन हो चुकी थी.

आँख मूंदकर दोस्त पर भरोसा या सिर्फ शत्रु है इसलिए उस पर अविश्वास करने वाले मूर्ख होते हैं. समझदार लोग धन-बल के अहंकार में रहने वालों के आस पास ना रहने की भी सलाह देते हैं.

संधि के ये सिद्धांत उतने पुराने और बेकार भी नहीं जितना शायद आप सोच रहे हैं. भारतीय कानून अभी भी कॉन्ट्रैक्ट एक्ट में करीब करीब इसे मानता है. जैसे अभी मैं प्रधानमंत्री के साथ किसी समझौते पर हस्ताक्षर कर के कल पलट सकता हूँ.

भारतीय कानूनों पर भरोसा रखिये, मुझे थोड़ी परेशानी जरूर हो सकती है, लेकिन अदालत से मुझे सजा तो हरगिज़ नहीं होगी जी. सैद्धांतिक तौर पर समझौते या कॉन्ट्रैक्ट पर दो समान स्तर के लोग हस्ताक्षर करते हैं जी. एक व्यक्ति प्रधानमंत्री जितना बड़ा आदमी हो और दूसरा मेरे जैसा आम आदमी तो उनके बीच कॉन्ट्रैक्ट या समझौता नहीं हो सकता जी.

मैं भी किसी आधे राज्य के प्रधान का बिलकुल उल्टा, यानी काम नहीं करने देते जी के बदले काम करवाना चाहता है जी तो कह ही सकता हूँ जी. प्रधानमंत्री जी मेरे साथ जबरन समझौता नहीं कर सकते जी! कोशिश कर के देखिये, ये जो मामूली सी बच्चों के लायक कहानी है वही मौजूदा कानून है.

कौन सी कहानी आपको बच्चों के लायक कहानी सुनाते सुनाते बड़ों के लायक नीतिनिर्देश दे रही है, ये तय कर के कहानियों को बच्चों और बड़ों के बीच छांटना भी महाभारत में संभव नहीं. आपको जो समझाना मुश्किल लगता हो उसे पहले खुद और बाद में दूसरों को समझाने के लिए भी महाभारत का शांति पर्व पढ़ने पर विचार किया जा सकता है. बाकी ये जो बच्चों को सिखा जाती है सो तो हैइये है!

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