बड़ी संख्या में ‘वोटर विद प्रिंसिपल्स’ हों तो ही टिक सकती है ‘पार्टी विद अ डिफरंस’

कुछ देर पहले लिखा था कि “यदि आप बड़ी संख्या में ‘वोटर विद प्रिंसिपल्स’ बन सकते तो ही ‘पार्टी विद अ डिफरंस’ टिक सकती है. वोटर जब उपभोक्ता बन जाता है तो यह असंभव है. विश्लेषण आ रहा है, जुड़े रहिए.”

तो यह रहा विश्लेषण.

कुछ साल पहले की बात है; एक परिचित के पिताजी का देहांत हुआ. उसके बाद, रीति के अनुसार उनसे मिलने गया था.

बात बात में पता चला कि कागज़ी कार्यवाही पूरी करने में उनके जेब से काफी हरे और लाल कागज चले गए थे.

वे इस बात से बहुत क्षुब्ध थे कि उन लोगों ने एक भूतपूर्व सरकारी कर्मचारी (मृतक) तथा एक सेवारत सरकारी कर्मचारी (वे स्वयं) का भी लिहाज नहीं किया.

बक़ौल उनके, उक्त सरकारी विभाग के कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारियों के बीच भाईचारे का प्रदर्शन करते हुए… मन्तव्य तो समझ गए ही होंगे आप.

वैसे हमारे परिचित ने इस विभाग में जो भ्रष्टाचार का नंगा नाच देखा उससे बहुत ही क्षुब्ध थे, इतना कहना पर्याप्त है, उनके शब्द लिखने योग्य नहीं.

और हाँ, उनके स्व. पिताश्री तथा उनके काबिलियत के प्रमाण उनके घर में गर्व से मौजूद थे जिनका ज्ञात उत्पन्न के स्रोतों से मेल बिठाना ज़रा मुश्किल काम था. फिर भी वे इस सरकारी विभाग में चलते भ्रष्टाचार को लेकर काफी कुपित थे.

मेरे लिए कोई प्रतिक्रिया न देना थोड़ा कठिन था, लेकिन जैसे तैसे खुद पर कंट्रोल रखा और हाँ में सिर हिलाता रहा.

भाजपा का खुद को पार्टी विद अ डिफरंस घोषित करना ऐसा ही लग रहा है. जिन्होने उन्हें वोट दिया उनकी प्रतिक्रियाएँ मुझे मेरे उक्त परिचित की याद कराती है.

कई ऐसे मिले हैं जिन्हें शिकायत है कि उनके काम नहीं होते, और ऊपर से यह भी शिकायत है कि आज के विरोधी जब सत्ता में थे तो इनके काम कर देते थे, यह जानते हुए भी कि ये भाजपा समर्थक हैं. व्यवहार कोई अलग नहीं होता था, सब के लिए एक ही दस्तूर होता था.

ये भाजपा वाले अपने कार्यकर्ताओं के काम नहीं कराते, उनको सरकारी खर्चे से ओब्लाइज़ नहीं करते, कैसे चलेगा?

बेटी का विवाह करने निकला व्यक्ति, जैसा चाहिए वैसा जमाई खरीद नहीं सकता तो समाज की अधोगति पर लेक्चर देता है, लेकिन अगर खुद का बेटा बाबू बन जाये तो भाषा के साथ तेवर भी बदलते हैं, वैसा ही कुछ होता है.

वैसे तनि ई बतावा भईये, आप की नज़र में पार्टी विद अ डिफरंस की व्याख्या क्या है और वह कितनी practical है? क्या डिफरंस होना चाहिए?

‘उपभोक्तावाद’ याने consumerism का नाम तो आप ने सुना ही होगा. मेरा करियर एडवर्टाइजिंग में ही बीता है तो उपभोक्तावाद से भली भांति परिचित हूँ.

जो भी ads आप देखते हैं, उन्हें वर्तमान समय का प्रतिबिंब कहा जाता है. समय गतिमान होता है यह एक अप्रत्याशित सत्य माना जाता है और हमेशा quote किया जाता है. लेकिन यह नहीं बताया जाता कि उस गति को दिशा कौन सी दी जाती है और वह दिशा देने का काम कौन करता है.

‘नेरेटिव सेट करना’ यह वाक्य आजकल काफी सुनाई देता है. यहाँ भी वही काम होता है, जिसका परिणाम बहुत व्यापक होता है और एक शरीफ आदमी के सोच से परे घातक होता है, हुआ भी है.

वैसे हम मानते हैं कि एडवर्टाइजिंग पूंजीवाद को लाभ पहुंचाती है, लेकिन यह मान्यता कम्युनिस्टों की सफलता है क्योंकि एडवर्टाइजिंग के द्वारा, पूंजीवादियों के खर्चे से, उन्होंने ऐसे नेरेटिव सेट किए हैं जिनको रिवर्स करना असंभव है. अराजकता की ओर कई कदम बढ़ाए हैं, यही उनका असली लाभ है.

उन्होने कैंसर की वो अवस्था ला रखी है जहां आप रोगमुक्त तो अब भी हो सकते हैं लेकिन रोग ने जो नुकसान कर रखे हैं उनके साथ ही एडजस्ट कर के जीना पड़ेगा. जिंदगी रोगमुक्त होनी और निरोग होनी, दो अलग अवस्थाएँ होती हैं, रोगमुक्त व्यक्ति को पथ्य के बंधन और औषधियों के सहारे ही जीना पड़ता है.

फिर भी, यातनाओं से कराहते मौत की ओर बढ़ने से रोगमुक्त ही सही, जिंदगी अच्छी होती है. आप के परिवार को आप की आवश्यकता है और अगली पीढ़ी को आप रोग के परिणाम आप से अच्छा कौन बता पाएगा ?

उपभोक्तावाद ने क्या बदलाव किए उसके कुछ उदाहरण देता हूँ. महंगी चीजों के दाम बढ़ तो गए, उनमें फीचर्स भी बढ़ गए लेकिन उनकी लाइफ कम हो गयी.

फ्रिज पहले भी स्टेटस था लेकिन सालों साल चलता था और लोग गर्व से बताते भी थे. फिर फीचर्स आ गए, उनकी ही बात होने लगी. लाइफ स्टाइल से जोड़े गए, अभिनेता और सेलेब्रिटी जोड़े गए, दाम बढ़ गए और फ्रिज की लाइफ कम हो गयी.

पुराना फ्रिज कितना भी सही काम दे रहा हो, उसे रखना शर्म की बात हो गयी. फिजूलखर्ची की क्षमता स्टेटस का नया मानक हो गयी और बेसब्री को नए युग का श्रेष्ठ गुण प्रचारित किया गया.

पैमाना यही रहा कि आप के पास जो देने की क्षमता है उसके लिए कई लोग लालायित हैं और एक से एक बढ़कर आकर्षक ऑफर देंगे. यह आप का हक़ ही है.

कभी कभार हम में से हर किसी पर ‘कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन’ की धुन सवार हो जाती है, मगर यह संख्या काफी नहीं होती. हम ही खुद को समझा लेते हैं कि ज़माना बदल गया है, अब वही कंपनियाँ भी पीढ़ियों तक चलने वाले उत्पाद नहीं बनाएँगी.

अध्यात्म में भी उपभोक्तावाद आ गया. There is a buddha in everyone का फैलाव हुआ और हर किसी के अंदर बैठे बुद्धू को बुद्धत्व का जामा पहनाकर Emperor’s new clothes की कहानी दोहराई गयी.

यहाँ cognitive dissonance की भी भूमिका है क्योंकि कोई यह नहीं मानेगा कि उसको उल्लू बनाया गया. खैर, वह विषय अलग है लेकिन बस उपभोक्तावाद की व्याप्ति बताने के लिए दिया है, इस पर कमेंट्स में चर्चा नहीं करूंगा.

एक जमाने में क़र्ज़ लेना गलत माना जाता था. आज EMI का अर्थ लगभग अनपढ़ व्यक्ति भी जानता है और उसे उपलब्धि मानता है.

लेकिन हम यह नहीं समझते कि इन सभी बातों के परिणाम पॉलिटिकल होते हैं और पॉलिटिक्स भी चींटी की मेहनत से टिड्डे को खिलाने की कवायद बन जाता है. हर कोई टिड्डा बन जाना स्मार्ट होने का पैमाना मानता है और चींटियाँ खत्म हो जाती हैं या फिर कहीं और पलायन कर जाती हैं.

अब मूल मुद्दे पर आते हैं, भाजपा, पार्टी विद अ डिफरंस का नारा, उसकी व्यवहारिकता आदि आदि.

क्या आप को आज की तारीख में यह व्यवहारिक दिख रहा है? क्या आप की प्रतिबद्धता उतनी है और उससे भी अधिक, क्या आप की संख्या उतनी है जिसका नेतृत्व पर दबाव पड़े?

नोकिया 1100 को बेहिसाब लोग चाहते थे क्योंकि ‘जब तक हथौड़ा लेकर न तोड़ो, साला इसे कुछ होता ही नहीं!’ – लेकिन वे सभी आज कोई स्मार्टफोन ही प्रयोग कर रहे हैं ना?

ऐसे स्मार्टफोन जो नोकिया 1100 से कई गुना महंगे हैं और कई गुना भंगुर, बच्चों से भी ज्यादा संभालने पड़ते हैं? तो फिर क्यों छोड़ा आप ने नोकिया? या आज भी वैसे सस्ते फीचर फोन हैं, लेकिन आप उसे नहीं खरीदेंगे, क्यों नहीं यह आप जानते हैं.

यहाँ भाजपा का समर्थन नहीं, हम हिन्दू मतदाताओं की प्रतिबद्धता की बात कर रहा हूँ. हमारा अंतर-बाह्य उपभोक्ताकरण ही हमें इस मोड पे ले आया है कि भाजपा को अस्तित्व टिकाने के लिए सभी मुद्दों को छोड़ना पड़ रहा है. बाकी भी कई सारी बुराइयाँ आ गयी हैं.

फिर भी, कोसने से क्या हासिल? फिलहाल एक ही मुद्दा लिए चलते हैं कि जो दिख रहा है वो विकल्प स्वीकार्य नहीं है, भयावह है इसलिए अगले पाँच साल का समय, 2019 में मोदी जी को वोट दे कर खरीदना होगा.

ठोस और व्यवहारिक आर्थिक और रणनीतिक विकल्प की सोचें जो समाज पर निर्भर हो. इस्लाम से यह सीखना चाहिए, काम की चीज शत्रुओं से भी सीखने में कोई बुराई नहीं.

इन्होने जो नहीं किया उसके लिए उनको त्यागने का समय अभी आया नहीं है क्योंकि हमारी उतनी तैयारी नहीं है. और बिना ठीक से पंख फूटे, गरुड़ के बच्चे भी शिखर से हवा में छलांग नहीं लगाते.

Icarus न बनें, यही सदिच्छा है. वह भी एक बढ़िया बोधकथा है, लिखेंगे इसपर भी.

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