क्या ‘रेत माफिया’ के आगे सरकार ने घुटने टेक दिए?

9 मार्च 2011 को जब एक आईपीएस पुलिस अधिकारी की रेत-माफिया द्वारा हत्या कर दी, तब से लेकर पिछले तीन सालों में “रेत माफिया” और सरकारी कर्मचारियों में अनेक झड़पों के मामले सामने आए हैं.

पन्ना जिले में पुलिस अफसर, छतरपुर में डिप्टी कलेक्टर, चम्बल नदी में पुलिस का सिपाही अपनी जान से हाथ धो बैठे और कुछ गंभीर रूप से घायल हो गए.

22 जून 2015 को तो रेत माफिया के आतंक ने सभ्य समाज की सभी मान्यताओं, संविधान और कानून को धता बताकर 40 वर्षीय एक पत्रकार पर तो इतना अमानवीय जुल्म ढ़हाया, कि उसे दौड़ा दौड़ा कर मार डाला तथा उसे जिन्दा जला दिया.

रेत माफिया के ज्यादातर मामलों में सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के स्थानीय नेताओं का सीधा हाथ होने की आम खबरें हैं. पर बताया जाता है इन सभी मामलों में शंका का लाभ या अपर्याप्त सबूतों के आधार पर अधिकांश अपराधी अदालतों से बरी हो गए.

रेत के व्यवसायियों के अनुसार, पिछले कई सालों से रेत माफिया और सरकारी अफसरों की साझेदारी में खुलेआम रेत का खनन पूरे मध्यप्रदेश में बहुत आराम से चल रहा था.

न कहीं कोई शिकायत होती थी न कोई पकड़ा धकड़ी होती थी. विगत कुछ सालों से जब से जेवीसी मशीन और दूसरे भारीभरकम यंत्रों से रेत का खनन होने लगा, प्रदेश में रेत के भण्डारों में अप्रत्याशित कमी आने लगी.

इस पर तुर्रा यह कि सरकारी अफसरों ने सरकारी रोक के बाद भी अवैध खनन जारी रखने के लिये अपनी रिश्वत की दरें बढ़ा दी. बस तब से ही झगड़े फसाद शुरू हो गए.

एक तरफ सरकारी अफसरों ने चालान और कानूनी कार्यवाही का ड़न्डा, ज्यादा रिश्वत लेने के लिये चलाया, तो दूसरी तरफ रेत माफिया ने स्थानीय दबंगो और राजनेताओं की शरण ले ली. अब क्या था खुलेआम सरकारी नियम कायदों की धज्जियॉ उड़ने लगी और खुल्लमखुल्ला गुंड़ागर्दी, दादागिरी और दबंगों के साये में रेत माफिया काम करने लगा.

सरकारी जानकारी के मुताबिक मध्यप्रदेश में इस समय कुल 1266 चिन्हित रेत की खदानें हैं. इनमें 106 खदानें नर्मदा नदी के बेसिन में हैं. दूसरी नदियों में छोटी बड़ी कुल 1106 रेत की खदाने हैं.

राज्य सरकार ने रेत माफिया के आतंक को समाप्त करने के लिये नवम्वर 2017 में एक रेत खनन नीति को बनाया. इस नई नीति के अनुसार रेत की व्यवसायिक हारवेस्टिंग करने के लिये नियम कायदे बना दिये गए. इन नए नियमों के अनुसार मप्र खनिज नियम 1996 के नियम 5 के अन्तर्गत सस्टेनेबल सैंड माईनिंग गाइडलाईन 2016 के अनुसार इन स्थानों से रेत का खनन नहीं किया जा सकता है.

100 मीटर के दायरे में…… किसी पुल, पुलिया, राष्ट्रीय या राज्यमार्ग, रेल मार्ग, सार्वजनिक भवन, या श्मसान के आसपास कोई भी रेत का खनन नहीं कर सकेगा.
50 मीटर के दायरे में……. पक्की सड़क के दोनों ओर रेत का खनन हीं किया जा सकता है.
10 मीटर के दायरे में…… ग्रामीण कच्चे रास्ते के इर्द गिर्द रेत कनन नहीं किया जा सकता है.
जल संसाधन स्कीम के अप स्ट्रीम में और डाऊन स्ट्रीम में 200 मीटर के दायरे में रेत खनन वर्जित है.
संवेदनशील स्थान, प्रतिरक्षा संस्थान, रेडियो स्टेशन, हवाईअड्डा, आदि से 300 मीटर की दूरी तक किसी तरह की रेत नहीं उठाई जा सकती है.

अन्य चिन्हित स्थानों से रेत खनन की व्यवस्था कानूनी तौर पर इस शर्त के साथ निश्चित की गई है कि रेत खनन करने वाले व्यापारी, या ठेकेदार रेत उठाने के लिये 25 रुपये प्रति घन मीटर रेत की दर से राज्य खनिज निगम को प्रशासकीय व्यय के लिये धन राशि नियमानुसार जमा करायेगा.

कानूनी तौर पर रेत खनन को चोरी से मुक्त कराने के लिये सरकार ने 14 नवम्बर 2017 से लागू रेत खनन की नई नीति में पारदर्शिता लाने के लिये खनिज विभाग की वेबसाईट पर एक विशेष ”सैंड पोर्टल” इन्टरनेट पर चालू कर दिया है. इतना ही नहीं रेत से भरे वाहनों ट्रक और भारीभरकम ट्रालरों पर अनिवार्य रूप से “जीपीएस“ ट्रेकर लगाने को जरूरी कर दिया है.

यद्यपि इस आदेश को लागू हुए चार महीने हो गए, पर किसी एक भी रेत वाहन पर किसी भी तरह का कोई “जीपीएस ट्रेकर“ अभी तक नहीं लग सका है. लगता है सिर्फ कागज का पेट भरने के लिये इस ‘जीपीएस ट्रेकर‘ के नाम का उपयोग किया गया है.

एक पुरानी कहावत है कि जब कोई मुसीबत में उलझ जाता है और उसके उलझन से निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता है, तो वह कहता है, “मरता क्या न करता”, या यों समझिये कि राज्य सरकार की हालत रेत माफिया की गुंडागर्दी की वजह से “इधर कुआं उधर खाई” जैसी हो गई थी.

क्योंकि रेत माफिया पर कानूनी प्रहार से सत्तारूढ़ और विरोधी दोनों दलों के राजनेता तथा कार्यकर्ता घायल हो रहे थे. अगर कुर्सी पर चिपके रहने के लिये वोट बैंक के पुजारियों को बचाने की कोशिश की जाती है, तो मीडिया और आम लोगों मे उसकी छवि धूमिल होने का डर है. हकीकत में सरकार की हालत “सांप छछूंदर” जैसी हो गई थी. इस कारण नई रेत खनन नीति 2017 को अमल में लाया गया पर……
पर……..
पर……. सरकार के नियम रचनाकारों ने इतनी चतुराई से रेत नीति बनाई जिसमें सब कुछ अच्छा करने के बाद, आखिरी में एक ऐसा नियम बना दिया कि सब “गुड़ गोबर” हो गया.

और अब सरकार ने रेत माफिया को खुली छूट दे दी कि किसी भी ग्राम के सरपंच को पटा लो, फिर जितनी चाहो उतनी रेत खोदो, बंटोरो, और छद्म नाम से जहाँ चाहो वहां महंगे दामों में बेचो.

नई रेत नीति से रेत खनन के भ्रष्टाचार और स्मगलिंग को कानूनी चादर में लपेट कर, “नई रेत खनन नीति के गंगाजल“ को छिड़क कर पवित्र कर दिया गया है. अब कोई रोक टोक नहीं है “रेत माफिया के डकैत… अब तुम भी खाओ और दूसरे सबको जो तुम अवैध खनन को कानूनी बुर्का पहना रहे हैं उनको भी जम कर खिलाओ.”

सरकार की ‘नई रेत खनन नीति‘ के अन्त में प्रावधान है कि “ग्रामीण क्षेत्र में कृषि कार्य के लिये ट्रेक्टरों को रेत परिवहन के लिये छूट दी जाती है. “इसी प्रकार “ऐसे स्थानों पर जहाँ मौसमी बहाव से रेत इकट्ठी होती है, उस घोषित और अघोषित रेत खदानों का व्यवसायिक दोहन सम्भव नहीं है, वहां पर मुफ्त में बिना किसी भुगतान के ग्राम पंचायत रेत दोहन की अनुमति दे सकती है.”

किसी खदान से रेत निकाली जा सकती है या नहीं, इसका निर्णय भी अब पूरी तरह ग्राम पंचायतों पर छोड़ दिया गया है.

यही कारण है कि संलग्न वीडियो में एक ऐसे चित्र का प्रमाण है, जिसमें सात फुट तक पूरी रेत भरकर, ट्रक को चारों तरफ से तिरपाल से ढ़क कर लाया गया है. यह रेत नर्मदा के खलघाट से चोरी छुपे अवैध खनन से लाई गई. इसके लिये न तो कोई अनुमति दी गई न किसी प्रकार की परिवहन की इजाजत? ड्रायवर से चर्चा करने पर पता चला कि इस ट्रक में ट्रक की क्षमता से तीन गुना ज्यादा रेत भर कर लाई गई है. ड्राइवर ने बताया “साहब यहाँ से वहां तक सब जगह गुलाबी नोट बाँटते चलो, जितनी रेत जहाँ से उठाना है उठाकर ले आओ.

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