बेग़म जान कहती हैं…

“बेग़म जान कहती हैं”…..मैं बेग़मजान में एक कहानी को देखना भी चाहती थी पर नहीं भी ….दो दिन पहले काफी कट के साथ देखी बेग़म जान और अभी तक एक सोच में हूँ.

बेग़म जान को मैं फ़िल्म जहां से शुरू हुई वहां से शुरू नहीं करूँगी. बेग़म जान वहां से जहां से बेग़म जान की औरत की कहानी शुरू होती है.

दृश्य है बेग़म जान (विद्या बालन) के कोठे पर, शबनम (मिष्टी) को सुजीत (पितोबश त्रिपाठी) लाता है, बेग़म जान का खास आदमी और ठेठ सामाजिक भाषा में बोलने वाला दलाल.

शबनम को उसके अपने ने ही छल कर बेग़म जान के कोठे तक छोड़ दिया. बेग़म जान खामोश शबनम की देखभाल का जिम्मा अम्मा(इला अरुण) को देती है. अम्मा, शबनम को ले जाने लगती है तभी उसे रोक बेग़म जान थप्पड़ों से कुरेद कर उसके अंदर का सारा दर्द निकालती है.

शबनम बिना शब्द के चीखती है बुरी तरह से चीख कर रोती है. हर वो औरत जो घुटी है जीते जी मरी है वो शबनम की तरह चीखना चाहती है और बेग़म जान मर रही औरत के इस दर्द को समझती है तभी उसे कुरेदती है.

बेग़म जान दृश्यों की कहानी है फिर भी बेग़म जान कुछ ऐसी है. बनारस की औरत (बाद में बेग़मजान से प्रसिद्ध विद्या बालन) को उसका पति छोड़ना चाहता है, तो छोड़ते-छोड़ते भी लाता है फायदा उठाता है. उसे बनारस में बेच दिया जाता है, जहाँ बेग़म जान जिंदा होती है.

बनारस, लखनऊ की प्रसिद्ध तवायफ होने के बाद एक राजा (नसरुद्दीन शाह ) के इश्क़ में बेग़म जान sakkergarh और Dorangla के बीच अपना कोठा चलाती है. आज़ादी के बाद विभाजन रेखा बेग़म जान की हवेली के बीच से जाएगी पर बेग़म जान को ये मंज़ूर नहीं न ही हवेली को छोड़ना.

सरकारी मुलाज़िम हरिप्रसाद (आशीष विद्यार्थी), इलयास खान (रजत कपूर) और इंस्पेक्टर श्याम सिंह (राजेश शर्मा) के सारे प्रयास असफल होते हैं. अंत में वो कसाई और पैसे लेके खून करने वाले कबीर (चंकी पांडेय) की मदद लेते हैं.

राजाजी, मास्टर (विवेक मुशरान) और गुलाबो (पल्लवी शारदा) से मिले धोखे के चलते कबीर एक रात बेग़म जान के कोठे पर हमला करता है. कोठे की हर औरत लड़ती है पर अंत बेग़म जान समेत 5 औरतें जलती हवेली में ख़ुद को बन्द कर मौत को अपनाती है और तीनों सरकारी अफसर अपना अंत तय करते हैं इस घटना से दुखी हो.

बेग़म जान जैसी फ़िल्म की बस एक कमी होती है ये मनोरंजन नहीं, कटु सत्य परोसती है. ऐसी फिल्में दिमाग को हिला देती है मजबूर करती है सोचिये पर कोई नहीं सोचना चाहता है. लोग स्त्री के बारे में तो सोचना नहीं चाहते फिर ये तो स्त्री नहीं वैश्या है. यह विभाजन के समय की सिर्फ एक घटना है जिसे वैश्या के जीवन से जोड़ दिखाया है, पर विभाजन तो इससे भी ज्यादा घटनाओं से भरा पड़ा था.

बेग़म जान डायरेक्टर श्रीजीत मुखर्जी की 2015 प्रदर्शित फ़िल्म “राजकहानी” का हिंदी संस्करण है पर बेग़म जान, राजकहानी से उन्नीस रही, वजह मुख्य किरदार. राजकहानी की जान है रितुपर्णा सेनगुप्ता.

फ़िल्म का एक गीत आशा जी की आवाज़ में “प्रेम में तोरे” और “वो सुबह कभी तो आएगी” का नवीन रूप “वो सुबह हमी से आएगी” अरिजीत और श्रेया घोषाल की आवाज़ में कर्णप्रिय है.

इला अरुण के द्वारा कोठे की स्त्रियों और बच्चियों को भारतीय इतिहास की वीरांगनाओं की कहानी सुनाना और उस रूप में बेग़म जान को दिखाना निर्देशक द्वारा इस बात को रखता है कि स्त्री सिर्फ सृष्टि की अद्भुत रचना है जिसे वेश्या, देवी, अबला पीड़िता हम बनाते हैं, वो अंदर से मज़बूत है, मज़बूत थी मज़बूत रहेगी.

बेग़म जान बौद्धिक स्तर पर उठ कर देखने वाली फिल्म है. फिर माँ के तौर पर एक सलाह बच्चियां न देखे. कुछ दृश्य और संवाद उन्हें व्यथित कर सकते हैं.

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